Monday, March 25, 2013

शिवराज ''शौचालय'' से ''सचिवालय'' तक


शिवराज ''शौचालय'' से ''सचिवालय'' तक



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 रामगोपाल शर्मा




...मुख्यमंत्री निवास - सूर्य की किरणें आलोकित होने को हैं और देश के हृदय प्रदेश का मुख्यमंत्री जाग्रत अवस्था में आते ही... फोन पर..

वंदे मातरम्...। जयहिंद...। गुडमार्निंग... कुछ समझ में नहीं आ रहा - शयनकक्ष में मोहन भागवत जी का फोन - जी शिवराज बोल रहा हूं। भाई साब... प्रणाम करता हूं।

बातचीत बताना असंभव क्योंकि सूत्र संचालक के 'संकेत'' शिवराज ही समझ सकते हैं। बात खत्म होते ही ताम्रपत्र का जल पिया और थोड़ा सा टहले - प्रेशर बन गया, जाने को उद्यत - पर यह क्या... आज तो सेवक के स्थान पर साधनाजी स्वयं चाय के साथ। मुख्यमंत्री ''प्रेशर'' के बावजूद रुक गये। एक कहावत है, किसी भी सफलता के पीछे किसी न किसी महिला का हाथ होता है, यह विश्व का आठवां आश्चर्य है (नजर न लगे) साधनाजी के 'चरण'' शिवराज जी के घर में पड़ते ही - ''जैत'' की ''जुताई'' छोड़कर 'सत्ता' की 'वनरोपिणी'तैयार कर रहे हैं। पूरा देश जानता है - भैय्या का दाम्पत्य जीवन सुखी है। टचवुड

खैर, चाय की तरफ सी.एम. ने ऐसे देखा जैसे बकरा कसाई को और म.प्र. का नौकरशाह आम आदमी को देखता है - चाय किसी तरह पी ही थी, सी.एम. बाथरूम की तरफ बढ़े ही थे कि हरकारा आ पहुंचा ''आई.जी.इंटेलीजेंस आई हैं'' - नीचे उतरना पड़ा - पेट में गुड़-गुड़, पूरे प्रदेश की रिपोर्ट ली (बताना संभव नहीं) - बदमाश कांग्रेसी ले भगेंगे - अपन क्यों भाजपा की बद्दुआ लें। आई.जी. गईं - साहब ऊपर आ गये एक पैर अंदर एक बाहर (बाथरूम) प्रेशर बढ़ चुका था।

दरवाजे पर 'हरकारा' भाई साब आये हैं - झल्ला कर सी.एम. बोल पड़े (वैसे सी.एम. कभी नाराज नहीं होते) कौन भाई साब? हम आपको बता दें कि ये भाई साब वो भाई साब हैं जिनकी भूमिका दूसरी बार सत्ता सौंपने में प्रमुख रही है वैसे  शिवराज जी के भाई साबों की कमी नहीं है, वे जिससे एक बार दिल से भाई साब बोल दें तो आदमी ''बाबूलाल गौर'' और बहन जी बोल दें तो ''उमा भारती'' की तरह शेष जीवन जीने को मजबूर हो जाता है - एक को दिल से भाई साब बोला था तो पुन: प्रदेशाध्यक्ष के सपने देखते देखते मैहर के दर्शन को मजबूर हो गये। फिर पूछा कौन से भाई साब -

उसने आव देखा न ताव, तपाक से बोल पड़ा - आपके ''आंख कान'' । वे समझ गये थे भाई साब और कोई नहीं वे भाई साब हैं जो छवि बनाने के विभाग के सर्वे सर्वा थे, अब अगली सरकार बनाने के लिये योजनाओं पर योजनायें तैयार कर रहे हैं।

उनका वश चले तो उनकी भी पंचायत बुलवा सकते हैं जो न 'पौरुष' के प्रतीक हैं न 'शक्ति' के। इन लोगों की हालत भी हम जैसे कलम घसीटों की तरह है जिनकी इज्जत दो कौड़ी की करके रख दी गई है - जो चापलूस किस्म के हैं वे चांदी चीर रहे हैं उनकी पत्नियां जब कुम्हार से 'मटका' खरीदती हैं तो कार से नहीं उतरतीं - और हमारी एक अदद बीबी बुधनी से बस में दो मटके लेकर आ रही थीं। बेचारी को क्या पता था उस दिन कक्का जी का किसान आंदोलन है - वे आए और प्रणाम करके हमारी धरम पत्नी से दोनों मटके झटक के ले गये।

अब तक हरीश आ चुके थे - उन्होंने बता ही दिया, सर प्रिंसीपल सेक्रेटरी टू सी.एम. श्रद्धेय, आदरणीय, पूज्यनीय मनोज जी आये हैं - एक बात बता दें अधिनस्थ स्टाफ वही सफल होता है अपने बॉस का नाम तो दूर पद सम्बोधन तक न करे।
वे समझ गये मध्यप्रदेश में छोटे कद का बड़ा आदमी आया है - प्रणाम करके बैठ गये - बातचीत शुरू...
मुख्यमंत्री, बोलिये भाई साब...
(चेहरा पेट की खलबली से तमतमा रहा है लेकिन गोपनीयता भंग कैसे करें?) भाई साहब ने बोलना शुरू किया।
मनोज जी - ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ + &  : । 
(यहां मनोज जी की बातचीत प्रकाशित नहीं की जा रही है अन्यथा कांग्रेसी ले भगेंगे।)
सी.एम. फिर इसका विकल्प क्या है?

मनोज जी - ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ + &  : । 
सी.एम. - हमें केवल विकास चाहिये, उसमें जो भी रोड़ा हो हटा दीजिये।
मनोज जी - ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ + &  : । 
सी.एम. - आपने पिछले चुनाव में तो पचौरी जी वाले मामले में विजय श्री प्राप्त कर ली थी - आप पर पूरी कार्य योजना रहती थी - आपने कमाल कर दिया था - आपने हमें पुन: सत्ता सौंपी थी - अब क्या परेशानी हो रही है? क्या आपके अब उन सज्जन से सम्बन्ध समाप्त हो गये जो एक साथ दो-दो राजनैतिक दलों का चुनाव संचालन करना जानते हैं। कहां हैं वो आजकल...?

मनोज जी - ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ + &  : । 
(इसी बीच सुषमाजी का फोन - हां हां जानता हूं उदयपुर (देहरा) नहीं... हां हां तो मैं बात कर लूंगा जी, मैं फोन लगवाता हूं। पटवा जी से भी बात कर लूंगा... प्रेशर बढ़ चुका, पेट में भारी खलबली, अचानक तेजी में उठकर ऊपर चले गये और कहा कोई भी आये तो मना कर देना -

प्रेशर बढ़ चुका था... हरीश को पता नहीं था, वो दौड़ते हुए ऊपर आ गये और बोले .... सर... गुजरात से मोदी जी का फोन है...
सी.एम. - हां, बात करायें...
मोदी जी - अरे भाई.. मध्यप्रदेश में आजकल ये क्या छप रहा है, अभी तक तो केवल गुजरात का विकास ही छाया हुआ था, अब ये हो क्या रहा है?

''भाई साब आप तो जानते हैं मैंने भी आपका एक गुर तो सीख ही लिया है कि मध्यप्रदेश में विकास की ही बात करता हूं - एक बार एक पत्रकार के पुत्र को प्रथम पुत्र की प्राप्ति हुई, मैं अस्पताल में था तो मीडिया वालों ने प्रतिक्रिया जानना चाही तो मैंने कहा मैं तो केवल विकास की बात करता हूं। इस घटना से हमारे प्रदेश में विकास के रास्ते खुलेंगे और पत्रकारों के मनोबल में वृद्धि होगी। पत्रकार वृद्ध थे, वे दादा बने थे, लड़का भी पत्रकार था, उस दिन का दिन है कि आज का दिन है पता नहीं, राकेश का हाथ है या लाजपत का सारा मीडिया चिल्ला रहा है - आपकी जगह मैं भी प्रधानमंत्री हो सकता हूं।

हालांकि हमारे खबर छपाऊ विभाग ने उस पत्रकार को न तो माखनलाल में जगह दी, न संदेश का प्रधान सम्पादक बनाया, न ही अपने लोगों की तरह ''माध्यम'' का रास्ता दिखाया और तो और उस बेचारे को साल भर से विज्ञापन तक के लिये मोहताज कर दिया। वह आज भी मेरे प्रशस्ति गान में लगा हुआ है। अब मैं क्या कर सकता हूं...

अब भाई साब आप मान लें अगर मीडिया शिवराज को चाहता है तो मेरी गलती नहीं है - मैं तो मिलता भी नहीं हूं..., मुझे अच्छी तरह याद है कि मैं उन पत्रकारों को तो याद नहीं करता जो मेरी छबि बनाने में लगे हैं। हां ये मुंह लगे पत्रकार ही हैं जो जबरिया मिलते रहते हैं।

हमारे यहां मीडिया के अनेक पत्रकार संगठन हमारे खबरिया विभाग के कारण बन गये हैं - इसलिये जो प्रमुख संगठन हैं उनकी दादागिरी नहीं चल पाती - हमारे लिये तो ''विकास'' ही सब कुछ है -
भाई साब, दरअसल आज आडवाणी जी आ रहे हैं - मैं रात को लगाऊं तो कैसा रहेगा? हां हां पटवा जी से भी बात कर लूंगा। (प्रेशर बढ़ चुका था, वे बाथरूम की तरफ बढ़े ही थे और बाथरूम में जाने ही वाले थे कि कार लग गई।)
साब... आडवाणी जी की अगवानी करने चलना है - चलो। वही पजामा, वही कुर्ता - हवाई अड्डे अपने नेता के स्वागत में एक ''भरे पेट'' का मुख्यमंत्री हाथ जोड़ प्लास्टिक मुस्कान के साथ आडवाणी जी के सामने खड़ा था, जो पूरे प्रदेश का पेट भरता है वह हवाई अड्डे के स्टेट हैंगर पर भी अपना पेट खाली नहीं कर पाया। यहां सोचा ही था कि यहीं निपट लें, लेकिन मनोज जी का फोन....

भाई सा. वो मोदी जी का कनवरशेसन अड़वाणी जी को जरूर बता दें - मुख्यमंत्री तपाक से बोले, भाई आपको कैसे पता चला कि हमारी और मोदी जी की क्या बात हुई। भाई सा. सुबह के ही अखबारों की हैडलाइन में मध्यप्रदेश, गुजरात से आगे जाने की होड़ में खड़ा है - अब अकेले मोदी नहीं हैं प्रधानमंत्री की दौड़ में... आप भी हैं... गुजरात के पी.एस. का मुझे फोन आया था - मुझे विश्वास था मोदी जी आपको फोन करेंगे, आज मौका अच्छा है - आडवाणी जी नाराज चल ही रहे हैं। लगे हाथ ''अटल ज्योति'' की भी बात कर लें और लक्ष्मीकांत जी से विदिशा लोकसभा की रिपोर्ट भी मंगवा लें, सम्भावना देख लें, लक्ष्मीकांत जी को कह जरूर दें। आडवाणी जी के वापस जाने के पूर्व यह रिपोर्ट बताना जरूरी है।
जी...
गाड़ी सरपट दौड़ रही है - 11.40 हो चुका है - वल्लभ भवन में मंत्री मंडल के सदस्य प्रतीक्षा कर रहे हैं अपने नेता की जरूरी बैठक है - चीफ सेकेट्री का फोन...
Sir - We are waiting for you.
C.M. - But I want only 5 minut for my personal problum
C.S. - Sir some one candidate in our cabinet, He cring where is Shivraj Ji ....
C.M. - I know, O.K. I am coming  (उन्होंने सोचा अब मंत्रिमंडल की बैठक के बाद ही निपट लेंगे...)

...और काफिला वल्लभ भवन पहुंच गया। मंत्रिमंडल की बैठक की बातें होली के मौके पर भी बताईं तो सीक्रेट एक्ट लगा के हमारी दुर्गति कर सकते हैं तो अपन अंदर की बातें क्यों बतायें? हमें न तो कांतिलाल कुछ दे देंगे, न राहुल भैया।

अभी कम से कम दो अदद बच्चे और एक अदद पत्नी को पाल तो रहे हैं - अब तो बता रहे हैं लाईन में लगाकर श्रद्धानिधि भी देगी सरकार।

खैर, सी.एम. ने सोचा मंत्रिमंडल की बैठक के बाद निपट लेंगे - पेट अभी भी गुड़.. गुड़... बना हुआ था। गुडग़ुड़ाहट इतनी बढ़ गई थी जैसे कि सोनियाजी के बाद राहुल भैया को मध्यप्रदेश की चिंता सताने लगी है। नियमानुसार साधनाजी द्वारा तैयार ''ब्रेकफास्ट'' ज्यों का त्यों सचिवालय सी.एम. के कक्ष में आ चुका है - और जनसम्पर्क मंत्री लक्ष्मीकांत - अपना पहले से आसन लगाये बैठे हैं - सी.एम. बाथरूम जाना चाहते हैं, परंतु विदिशा की राजनैतिक स्थिति (सुषमाजी राघवजी सहित) जो आडवाणी जी को हवाई अड्डे पर देना है वह लक्ष्मीकांत जी के हाथ में है...
लक्ष्मीकांत - भाई साब एक नजर डाल लेते।

सी.एम. - लक्ष्मीकांत जी मुझे आप पर पूरा भरोसा है - । += ऽ&+ ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ + &  : । +=  आपकी पंगत की भी तो । += ऽ&+ ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ + &  : । += ऽ&+ ऽ  शिकायतें करवाई थीं... ये लोग कहते हैं..। += ऽ&+ ऽ +  पत्रकारों को आपकी दाढ़ी और माथे का चन्दन अच्छा लगता है - महामाई का आशीर्वाद बताते हैं, ये लोग यह भी कहते सुने गये हैं कि ऽ&+ ऽ +. आपकी हिम्मत की दाद देता हूं। लक्ष्मीकांत जी आपने कैसे कैसों को झेला है - आपके ही वश की बात है -
नहीं सर... आपकी बदौलत

नहीं नहीं लक्ष्मीकांत जी आप अपनी मर्यादा में रहकर अपना कद बढ़ाते रहें, मुझे चिंता नहीं है...।
... छिपाता नहीं हूं एक दिन की बात है दुबारा मंत्री बनने पर आपने अपने निवास पर पत्रकारों को भोजन दिया था - याद है उसी दिन एक जगह (मंत्रीजी) के यहां भी ठीक उसी समय भोजन था, कौए उड़ रहे थे उधर... खैर, अपने अपने सम्बन्ध हैं, हमें भी सलाह मिलती है पर ये खबरिया विभाग वालों की काटा-पीटी से हम परेशान हैं, इसलिये हमने सलाह लेना ही बंद कर दी अब तो। हमारे एक ही सलाहकार हैं - हमारे भाई साब (मनोज जी)... उनने ही बनवाई थी अब वे बनवायेंगे।

लक्ष्मीकांत जी एक भीतर की बात बताता हूं, उस समय पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का एक पत्रकार के यहां फोन आया था, उन्होंने कहा था - अकेले 'मनोज जी को'' हमें दे दो हम 'भाजपा को धूल चटा देंगे'' - इसलिये हमने उन्हें खबरिया विभाग का ही मालिक बनाए रखा, सरकार दोबारा बन गई। हमें भरोसा है हम नहीं आए तो साधना जी सम्हालेंगी प्रदेश की कमान। रहेगी भाजपा ही।
इन्होंने ही हमें बताया था कि यह तो बांसुरी विभाग है जितनी हवा भरोगे उतनी बजेगी पर अभी का पता नहीं है।

हां पिछले साल एक नेतानुमा पत्रकार ने होली का विशाल कार्यक्रम रखा था, खबरिया विभाग के आला अफसरों को रंग गुलाल के साथ बांसुरी भी भेंट की थी - बस क्या था, उसकी बांसुरी में खबरिया विभाग ने ऐसी हवा भरी कि फट के गरदन में आ गई। अब तो बात आई गई हो गयी, मैं तो इन चीजों में उलझता भी नहीं हूं।
विदिशा की जो रिपोर्ट है वह अच्छी ही होगी - अपन को बहुत लम्बा चलना है। विदिशा, रायसेन के पत्रकारों को पकड़े रहो, अपन को तो उनसे ही ........ है। बाकी 'दिल्ली'' और 'लन्दन''  'चैनल'' 'सोसल मीडिया'' 'स्वतंत्र लेखकों'' और 'फीचर्स'' के लिये मनोज जी हैं ही।

....आप एक काम और कर दो, हमारी ये इमेज तो बन ही गई है कि हम सीधे सादे मुख्यमंत्री हैं हम जैसे अंदर हैं वैसे बाहर हैं, हमारे परिजनों पर रंग फेंकने के आरोप नहीं हैं - पर हमारे नाम पर लोग रंग गुलाल तो ठीक, कालिख पोतने से भी नहीं चूक रहे, उनके लिये क्या करें?
लक्ष्मीकांत - भाई सा. मुझसे भी अनुभवी लोग यहां हैं, कई लोगों के यहां तो आप खुद चले जाते हैं...
जैसे?
मा. .... जी मा. ....जी, और तो और आप जैसे लोगों से भी सलाह लेते हैं मैं अदना सा आदमी जिसकी सोच सिरोंज नटेरन और शमशाबाद से आगे नहीं है - हां आपने उच्च शिक्षा देकर स्थान दिया है, पर मैं अभी भी ''कलम घिस्सू'' लोगों से ही सीखता रहता हूं।

... अच्छा अंग्रेजी में संदेश की तरह जो निकाला था वह कैसा निकल रहा है?
- भाई सा. उसी से तो मोदी जी पीडि़त हुये हैं - पूरे देश में तहलका मचा दिया - खबरिया विभाग की यही फितरत है, जिस अधिकारी को सजाये बतौर कहीं पदस्थ कर दो तो वह ''कमाल'' कर देता है।
... अच्छा अच्छा ये माध्यम... भाई साहब - रहने दो - उनसे बात कर लेना, यहां तो सबके खूंटे हैं....
आपका....?
फिर प्रेशर आया.... काफिला रास्ते में, रात के 11 बज रहे हैं - समिधा चलो। (वहां भी संकोच में नहीं कह पाये) लगा कि ये लोग क्या सोचेंगे - मुख्यमंत्री जैसा आदमी 'समिधा'' में 'शौच'' की बात करता है, पूरा मध्यप्रदेश पड़ा है।
पहले एक कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे उन्होंने सर्वाधिक ध्यान विश्रामगृहों के शौचालयों पर ही दिया था दरअसल उनकी ''हाईट'' अधिक थी -
शिवराज जी तो एक ही चम्मच से नमकीन और मीठा दोनों खा लेते हैं, लेकिन उन मुख्यमंत्री के नमकीन भी अलग थे तो चम्मच भी अलग ही हुआ करते थे। अंतर देखिए...
कमाल की बात ये है कि शिवराज सिंह वो मुख्यमंत्री हैं जिसे ''कल्लु बुआ के टूटे चश्मे'' की याद भी रहती है और ''जुम्मन शेख की पंचर की दुकान किसने हटाई'' उसका भी ध्यान उन्हें रहता है। वह हाल ही विधवा हुई कमला की विधवा पेंशन के बारे में भी पूछता है, और जानकारी प्राप्त करते हुए यदि उसे पेंशन नहीं मिली तो सक्षम अधिकारी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर देता है।

लेकिन वाह रे लोकतंत्र... जो मुख्यमंत्री सबके पेट भरने की जिम्मेवारी का वहन कर रहा है वह अभी तक अपना पेट खाली नहीं कर पा रहा, वह अभी भी गुड़ गुड़ कर रहा है।

इतनी सज्जनता भी ठीक नहीं कि आप इतना संकोच करें कि अगर बात नहीं करूंगा तो अमुक आदमी बुरा मान जायेगा। अरे आपके मुंह लगे अधिकारियों से पूछो जो देखने के बाद भी आप ही से मीटिंग का बहाना लेकर ढीट बने रहते हैं और आम आदमी से कतराते हैं - इनके बंगलों से उत्तर मिलता है कि साहब बाथरूम में हैं। क्या विसंगति है मध्यप्रदेश के अफसरशाह बाथरूम में हैं और मुख्यमंत्री को शौचालय से सचिवालय तक की व्यस्तता में बाथरूम नसीब नहीं होता। आप इतना तो सीख ही सकते हैं कि नौकरशाह केवल आपको प्रसन्न रखते हैं और आप पूरे प्रदेश को -

हमारा रंग और गुलाल स्वीकारें,
मध्यप्रदेश को ऊंचाईयों पर पहुंचा कर
मोदी की राह दिल्ली पधारें....
आप बनो प्रधानमंत्री वे बनें राष्ट्रपति
हमारी पत्नी तो घर की मुर्गी है
हमें बना रहने दो उसका पति।.........

(म.प्र. समाचार सेवा, होली न्यूज)
बुरा न मानो होली है...


Wednesday, March 20, 2013

एकलव्य जैसे आदिवासी चरित्र को दलित की परिधि में नहीं लाया जा सकता. निःसंदेह वह खांटी आदिवासी है...


दलित कहने से न स्त्रियों का बोध होता है, न अल्पसंख्यकों का और न ही आदिवासी समुदायों का. दलित बुद्धिजीवी न बाबा साहेब के जमाने में स्वयं को आदिवासी मानते थे, न आज. एकलव्य जैसे आदिवासी चरित्र को दलित की परिधि में नहीं लाया जा सकता. निःसंदेह वह खांटी आदिवासी है...
अश्विनी कुमार पंकज
नाटककार बव कारंत, केएम पणिक्कर, हबीब तनवीर, रतन थियम, भानु भारती की परंपरा में हैं सत्यव्रत राउत. राउत जी ने मेटा 2013 का श्रेष्ठ निर्देशक का अवार्ड जीता है, ‘मत्ते एकलव्य’ उर्फ ‘एकलव्य उवाच’ के निर्देशन के लिए. ध्यान देने की बात यह है कि नाटककार और इसके मेटा विजेता निर्देशक ने इस नाट्य प्रस्तुति में एकलव्य को ‘शूद्र’ और ‘अछूत’ अर्थात् दलित बताया है. जबकि दुनिया जानती है कि महाभारत का एकलव्य भील आदिवासी समुदाय का एक वीर तीरंदाज था. जिसके आग्रह के बावजूद द्रोणाचार्य ने उसे धनुर्विद्या नहीं सिखायी और जब एकलव्य ने स्वाध्याय से तीरंदाजी में महारत हासिल कर ली तो अर्जुनमोहांध द्रोणाचार्य ने गुरुदक्षिणा में उसका अंगूठा काट दिया.
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सत्यव्रत राउत निर्देशित नाटक ‘एकलव्य उवाच’ का एक दृश्य
महाभारत की यह मिथकीय कथा और एकलव्य का सरल आदिवासी चरित्र भारतीय जनमानस में वैसे ही पॉपुलर है जैसे भगत सिंह. रामायण व महाभारतकालीन वर्गीय दमन और उसके खिलाफ प्रतिरोध की गाथा है यह मिथक, इसीलिए ‘एकलव्य’ को बार-बार साहित्य एवं विभिन्न कला रूपों में सृजनधर्मी लोग अपने-अपने नजरिए से चित्रित करते रहे हैं. परंतु अधिकांश सृजनधर्मियों ने एकलव्य की आदिवासी अस्मिता को नकारते हुए उसके चरित्र व इस मिथकीय कथा का सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त भेदभाव, भ्रष्टाचार (जैसे, शंकर शेष का ‘एक और द्रोणाचार्य’), आज्ञाकारी शिष्य और अधिक हुआ तो ‘अगड़ा बनाम पिछड़ा’ संघर्ष के संदर्भ में ही परिभाषित किया है. राउत ने भी अपने कुलदीप कुणाल लिखित अपने नाटक में यही रवैया रखा है. हद तो यह है कि इस पूर्वाग्रही नजरिए से एक कदम और आगे बढ़कर उसे ‘अछूत’ करार दिया है और उसकी आदिवासी अस्मिता, पहचान व संघर्ष को ही खारिज कर दिया है.
ऐसा नहीं है कि एकलव्य को ‘दलित’ मानने और सिद्ध करनेवाले वे अकेले हैं. हिंदी और अन्य सभी भारतीय भाषाओं में रचे गए कवित्त, साहित्य व नाटक में उसकी पुनर्रचना दलित अथवा शूद्र के रूप में ही की गई है. आधुनिक कन्नड़ रंगमंच के जनक माने जानेवाले टीपी कैलासम ने 1944 में एकलव्य की कहानी पर अंग्रेजी में ‘परपज’ नाटक लिखा था, जो बाद में कन्नड़ में ‘एकलव्य’ नाम से चर्चित हुआ. ‘परपज’ मराठी में भी अनुवादित व मंचित होकर लोकप्रिय हुआ जिसका अनुवाद के. नारायण काले ने किया था. केवी पुटप्पा (कुवेंपु) का ‘बेरळगे कोरळ’ (1947) भी एकलव्य के जीवन पर आधारित है. यह भी कन्नड़ में है. इन सभी नाटकों में एकलव्य को ‘निम्न जाति’ और दलित मानते हुए प्रस्तुत किया गया है.
इस सवाल के जवाब में अक्सर एक बात कही जाती है. दलित मतलब वे सभी जो व्यवस्था द्वारा सताए गए हैं, दबे-कुचले हैं. जिनका दमन हुआ व हो रहा है, जो दमित हैं, वे सब के सब दलित हैं. भारत की बहुस्तरीय सामाजिक संरचना और वृहत्तर वर्गीय अवधारणा की दृष्टि से निश्चित रूप से दलित शब्द के इस अर्थ से किसी की असहमति नहीं हो सकती है. पर सभी जानते हैं कि भारत के वंचित और उत्पीड़ित समुदायों में से ‘हरिजन’, ‘अछूत’ व शूद्र कहे जाने वाले जातियों ने अपने अस्मितावादी आंदोलन से इस शब्द को स्वयं के लिए स्वीकृत और स्थापित कर लिया है. इसलिए अब दलित से न स्त्रियों का बोध होता है, न अल्पसंख्यक और आदिवासी समुदायों का. वैसे भी दलित बुद्धिजीवी न बाबा साहेब के जमाने में स्वयं को आदिवासी मानते थे, न आज. स्पष्टतया एकलव्य जैसे आदिवासी चरित्र को दलित की परिधि में नहीं लाया जा सकता. निःसंदेह वह खांटी आदिवासी है.
राउत जैसे लोग जब यह कहते हैं कि वे एकलव्य के सिर्फ सेल्फ लर्निंग, संघर्ष, प्रकृति प्रेम से अभिभूत हैं और इसी वजह से उन्होंने एकलव्य को पुनर्सृजित किया है, तो उनकी मनुवादी चालाकियां नहीं छुप पातीं. मतलब, जब वे कहते हैं कि एकलव्य का चरित्र जाति और समुदाय से ऊपर है. वह सिर्फ एक ‘इंसान’ है जो व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करते हुए नए मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है. गर्व से यह भी जोड़ते हैं कि एकलव्य के माध्यम से वे महाभारत जैसे एपिक को ‘री-डिफाइंड’ कर रहे हैं, तो उनके नाटक का एकलव्य अपने पहले ही दृश्य के पहले परिचयात्मक संवाद में ‘मैं एक अछूत. ... मैं महाशूद्र एकलव्य’ कह कर उनकी असली मंशा उजागर कर देता है.
यह भी स्पष्ट हो जाता है कि उनका एकलव्य जातिविहीन, अस्मिताविहीन ‘इंसान’ नहीं है. फिर वह बार-बार और पूरे नाटक में खुद को तो शूद्र बोलता ही है, दूसरे सहयोगी पात्र भी उसे शूद्र ही कहते रहते हैं. अजीब विरोधाभास है कि एक ओर उन्हें अस्मिताविहीन, जातिहीन एकलव्य पसंद है तो दूसरी ओर एक आदिवासी चरित्र को शूद्र के तौर पर ‘री-डिफाइन’ कर रहे हैं. अगर आपको एकलव्य का अस्मिताविहीन चरित्र इतना ही पसंद था फिर उसे ‘अछूत’ और ‘शूद्र‘ क्यों सिद्ध कर रहे हैं? उसे आदिवासी नहीं कहना चाहते थे तो अछूत, शूद्र क्यों बना दिया? क्या मजबूरी या सोच है एक जातिविहीन आदिवासी को अछूत बनाने के पीछे? यह कैसी पुनर्व्याख्या है?
‘मत्ते एकलव्य’ बहुभाषी नाटक है. संवाद मुख्यतया हिंदी में, कहीं-कहीं संस्कृत और गीत कन्नड़ में हैं. चूंकि कर्नाटक के दलित-आदिवासियों के लोक तत्वों - गीत, संगीत, नृत्य - को लिया है तो जाहिर है कि ये सब कन्नड़ में हैं. प्राचीनता बताने के लिए संस्कृत और देशव्यापी लोकप्रियता के लिए हिंदी जरूरी थी. लेकिन नाटक में आदिवासी भाषा हो, एकलव्य और उसका समुदाय आदिवासी भाषा बोले, वह भी जब मेटा प्रदर्शन में शामिल डिंगरी नरेश यानी कि मुख्य अभिनेता और श्रेष्ठ अभिनेता का अवार्ड जीतने वाला आदिवासी हो, लेखक-निर्देशक को जरूरी नहीं लगा. कहानी, नाच, गान, संगीत, शैली सभी कुछ आदिवासी का लेंगे. लेकिन उनकी भाषा नहीं लेंगे. उनकी आदिवासी अस्मिता से परहेज करेंगे. क्यों? क्योंकि आदिवासी को बेचा जा सकता है. जैसा कि अभी तक बव कारंत, केएम पणिक्कर, हबीब तनवीर, रतन थियम, भानु भारती जैसे लोग करते रहे हैं. राउत इसी ‘आदिवासी हंट’ परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं.
इस विमर्श में कन्नड़ के ही एम गोविंद पै का नाटक ‘हेब्बेरळु’ (1946) की चर्चा प्रासंगिक है. ‘हेब्बेरळु’ में एकलव्य को भील आदिवासी मानते हुए ‘आर्य-अनार्य’ संघर्ष की कथा दृश्यांकित की है राष्ट्रकवि गोविंद पै ने. एकलव्य के जीवन संघर्ष पर संभवतः यह अकेला नाटक है जो उसकी आदिवासी अस्मिता और प्रतिरोध को ऐतिहासिक आर्य-अनार्य संघर्ष के परिप्रेक्ष्य में देखता है. क्योंकि गोविंद पै इस नाटक में जो टिप्पणी करते हैं वह बेहद महत्वपूर्ण है और राजनीतिक भी. उन्होंने लिखा है - ‘नोडलिदे नोडलिदे जलदिमीनिन काल’ (पानी में मछली के पाद चिन्ह देखने का समय आनेवाला है, पृ, 50). अर्थात् वे संकेत करते हैं कि भविष्य में भी अनार्य समाज का मुख्यधारा में आना उतना ही मुश्किल है, जितना पानी में मछली के पांवों के निशान पहचानना.
आज का आदिवासी भारत इस राजनीतिक टिप्पणी को सटीकता के साथ व्यक्त करता है. जल, जंगल, जमीन पर अधिकार व अपनी आदिवासी अस्मिता के लिए भारत की पुलिस-सेना से वह मुठभेड़ में है. वह अपने धार्मिक रूपांतरण, सांस्कृतिक कायांतरण और आंतरिक औपनिवेशिक लूट व दमन के खिलाफ निरंतर संघर्षरत है. मुख्यधारा की अवधारणा के खिलाफ है वह. ऐसे में उससे जुड़े मिथकीय चरित्र एकलव्य को जाति में समेट लेना, उसकी आदिवासी अस्मिता को नकारना असलियत में उसके संघर्ष को कमजोर करना है. आदिवासियों को मुख्यधारा में जबरन घसीट लेने की यह कोशिश उस दमन और अन्याय का समर्थन है, जिसे हमारी सरकारें ‘संस्कृतिकरण’ व ‘सलवा जुडूम’ कहती हैं.

Sunday, March 17, 2013

श्रवण गर्ग समिति का विस्तार किया जस्टिस काटजू ने


नई दिल्ली। प्रेस काउंसिल ऑफ इण्डिया के चेयरमैन जस्टिस मार्कण्डेय काटजूने कल पत्रकारिता के पेशे में योग्यता का मापदण्ड तय करने के लिये वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के संयोजकत्व में जिस कमेटी का गठन किया था उस पर उंगलियाँ उठने के बाद इस कमेटी के सदस्यों में इजाफा करते हुये समिति के कार्यक्षेत्र में भी थोड़ा परिवर्तन किया है।
आज यहाँ जस्टिस काटजू ने कहा कि प्रेस काउंसिल एक्ट की धारा 13 के अंतर्गत प्रेस काउंसिल ऑफ इण्डिया का यह कर्तव्य है कि वह पत्रकारिता के मानदण्डों का उन्नयन और संरक्षण करे। उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है कि देश में पत्रकारिता के संस्थानों की निगरानी एवं पत्रकारों के विभागों के रेगुलेशन का कार्य करने की शक्तियाँ भी काउंसिल के पास होनी चाहिये।
कल बनी समिति में सदस्यों के अलावा प्रेस काउंसिल के सदस्य राजीव रंजन नाग एवं गुरिंदर सिंह तथा आईआईएमसी के महानिदेशक सुनीत टण्डनको भी शामिल किया गया है। जबकि श्री गर्ग को य शक्तियाँ दी गयी हैं कि वे जिन्हें जरूरी समझें समिति में शामिल कर सकते हैं।

मी लॉर्ड … तो पत्रकारिता प्रोफेशन है, मिशन नहीं ?


अमलेन्दु उपाध्याय
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन जस्टिस मार्कण्डेय काटजू चाहते हैं कि जिस तरह वकालत के पेशे में आने के लिये एलएलबी की डिग्री और बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन और डॉक्टर बनने के लिये एमबीबीएस डिग्री और मेडिकल काउंसिल में रजिस्ट्रेशन या टीचर बनने के लिये कुछ कोर्स/ डिग्री अनिवार्य है इसी तरह पत्रकारिता के प्रोफेशन में उतरने के लिये भी कुछ कानूनी योग्यता होना अनिवार्य हो।
इस बावत जस्टिस काटजू ने वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के संयोजकत्व में एक समिति गठित कर दी है जो जल्द से जल्द अपनी रिपोर्ट देगी कि इसके लिये क्या न्यूनतम योग्यतायें निर्धारित की जायें। समिति में प्रेस काउंसिल के सदस्य राजीव सबादे और पुणे विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग में एसोसेएट प्रोफेसर डॉ. उज्जवला बार्वे शामिल हैं। बाद में इस समिति में प्रेस काउंसिल के सदस्य राजीव रंजन नाग एवं गुरिंदर सिंह तथा आईआईएमसी के महानिदेशक सुनीत टण्डन को भी शामिल किया गया। जबकि श्री गर्ग को यह शक्तियाँ दी गयी हैं कि वे जिन्हें जरूरी समझें समिति में शामिल कर सकते हैं।
जब पत्रकारिता की दशा और दिशा को लेकर रोज़ बहस हो रही हो कि पत्रकारिता को बाजार के हवाले करने के कारण उसके मूल्यों में ह्रास हो रहा है और पत्रकारिता की पढ़ाई कराने वाले संस्थान तकनीक तो सिखा रहे हैं लेकिन पत्रकारिता को रोज़ मार रहे हैं ऐसे में जस्टिस काटजू के इस आइडिया का विरोध होना तय माना जा रहा है क्योंकि पत्रकारिता के मूल्यों की रक्षा की बात करने वाले लोग इस तथ्य को हमेशा रेखाँकित करते रहे हैं कि पत्रकारिता धंधा नहीं है, मिशन है। ऐसे में पत्रकारिता क्या है और खबरों का धंधा क्या है दोनों में अन्तर रेखांकित करने की जरूरत है।
सवाल है कि आप पत्रकारिता को व्यापार और एक उत्पाद के रूप में परिभाषित कर रहे हैं तब तो प्रेस काउंसिल की पहल सही लगती है लेकिन अगर पत्रकारिता का जनता से वास्ता है, पत्रकारिता धंधा और उत्पाद नहीं है तो उसके धंधे वाले उसूल भी नहीं हो सकते।
जब आप पत्रकारिता में प्रोफेशनलिज्म की बात कर रहे हैं फिर तो पत्रकारिता को पेशा ही बनाना चाहते हैं। जब पत्रकारिता प्रोफेशन है तो पत्रकारीय मूल्यों की आशा करना बेमानी है। जाहिर है जब आपने पत्रकारिता को धंधा मान ही लिया तो उसूल कैसे? व्यापार में क्या उसूल होते हैं? प्रोडक्ट को बेचना ही एकमात्र उसूल है चाहे जैसे बिके।
उदंत मार्तण्ड निकला तो पत्रकारिता की डिग्री नहीं थी। लेकिन वकालत के लिये तब भी डिग्रियाँ थीं और डॉक्टरी के लिये भी डिग्रियाँ थीं। पत्रकारिता के क्षेत्र में जिन लोगों ने भी कुछ उसूल कायम किये और पत्रकारिता को जनता से जोड़ा उनमें से किसी के भी पास कोई डिग्री या रजिस्ट्रेशन नहीं था। जबकि पत्रकारिता को कलंकित करने वाले जितने भी प्रकरण सामने आये हैं उनमें सभी प्रोफेशनल डिग्रियाँ वालों ने ही कलंक लगाया है। आज भी पत्रकारिता के उच्च मानदण्डों का जो पालन कर रहे हैं वे छोटे और गैर प्रोफेशनल पत्रकार ही हैं वरना प्रोफेशनल तो पेड न्यूज़ का कारोबार कर रहे हैं।
ऐसे में कैसे कहा जा सकता है कि डिग्री ले लेने से पत्रकारिता में उच्च मूल्य स्थापित हो जायेंगे ? वैसे भी जनसंचार की पढ़ाई कराने वाले संस्थान गली गली में खुल गये हैं। ये संस्थान तकनीक तो सिखा रहे हैं, खबरों का उत्पादन और प्रस्तुतिकरण और खबरों से खेलना तो सिखा रहे हैं लेकिन पत्रकारिता के मूल्यों से इनका क्या वास्ता है ?
इसे कुछ इस तरह भी समझा जा सकता है। देश की तमाम निर्णायक संस्थाओं पर आईआईटी/ आईआईएम से निकले प्रोफेशनल्स का कब्जा है। सिविल सेवा में आने वाले अधिकारी उच्च स्तरीय प्रोफेशनल भी होते हैं और उन्हें प्रशिक्षण भी मिलता है। लेकिन भ्रष्टाचार की गंगोत्री भी इन्हीं प्रोफेशनल्स के चरणों से निकलती है और आम जनता पर जुल्म ढाने के उपाय भी यही तैयार करते हैं।
जस्टिस काटजू के इस नुस्खे में एक और बेसिक खोट है। वह पत्रकारिता को वकालत या डॉक्टरी की तरह देख रहे हैं। ईमानदारी की बात कही जाये तो वकालत और डॉक्टरी में कौन से उसूलों का पालन किया जा रहा है ? क्या बार काउंसिल और मेडिकल काउंसिल नैतिकता का पाठ पढ़ाकर उन पर अमल भी करा पाती हैं ? जब सर्वोच्च न्यायालय के किसी काबिल प्रोफेशनल वकील की एक दिन की फीस 25 से 50 लाख रुपये हो ऐसे में यह काबिल प्रोफेशनल उस बेगुनाह मुल्जिम के किस काम का है जिसकी जेब में एक पेशी पर देने के लिये 25-50 लाख रुपये नहीं हैं।
सवाल तो यह भी है कि जब पत्रकारिता प्रोफेशन है तब सरकार से सुविधाएं किसलिये, पीआईबी मान्यता क्यों, प्रिंटिंग प्रेस पर छूट क्यों ? लोकतंत्र का चौथा खम्भा होने का फर्जी नारा क्यों ? कोई प्रोफेशन लोकतंत्र का खम्भा कैसे हो सकता है ? असल सवाल यही है कि मीडिया में जो पूँजी लग रही है उसका चरित्र क्या है? मीडिया का एजेण्डा यही पूँजी तय कर रही है न कि पत्रकार तय कर रहे हैं।
यह षडयंत्र भी हो सकता है ताकि कम पूँजी और जनोन्मुखी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति पत्रकारिता की चौहद्दी में घुस ही न सके। किसी थके से थके संस्थान से भी पत्रकारिता की डिग्री लेने में कम से कम 5 लाख रुपये का खर्च आता है। जाहिर है शोषित वंचित तबके का आदमी इसे नहीं खरीद सकता न 150 करोड़ लगाकर अखबार निकाल सकता है। और जो 5 लाख खर्च करके प्रोफेशन में उतरेगा वह किन उसूलों पर काम करेगा ? अपना पेट पालेगा, 5 लाख वसूलेगा, अपने आनी वाली पीढ़ी के 5 लाख का इंतजाम करेगा या उसूलों को ओढ़ेगा, बिछायेगा ? जाहिर है इस सोच में बेसिक खोट है। चूँकि अब मीडिया से बाजार का रिश्ता कायम हो रहा है इसीलिये अब आम आदमी की खबरें पन्नों से गायब हो रही हैं। जहाँ पूँजी आती है वहाँ मुनाफे की बात भी आती है और जब मुनाफे की बात आती है तो एकमात्र उसूल भी मुनाफा ही होता है।
इस नुस्खे को साधारण चिन्ता समझकर टालना बहुत खतरनाक हो सकता है। बहुत संभव है इस चिन्ता के पीछे मीडिया मफियाओं का दबाव हो। अधिकाँश मीडिया घराने जनसंचार और पत्रकारिता के स्कूल भी चला रहे हैं। यह देखने वाली बात है कि इनमें से अधिकाँश स्कूलों से निकले प्रोफेशनल पत्रकारों को नौकरियाँ नहीं मिलती हैं और इन नवोदित तथाकथित प्रोफेशनल पत्रकारों को यह संस्थान अपने मीडिया हाउस में ही बतौर ट्रेनी जर्नलिस्ट छह महीने काम कराने के बाद बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। चूँकि अब यह गोरखधंधा समझ में आने लगा है। इसलिये अधिकाँश मीडया स्कूलों में सीटें ठीक उसी तरह खाली रह रही हैं जिस तरह कुकुरमुत्तों की तरह उगे निजी इंनियरिंग क़ॉलेजों में सीटें खाली रह रही हैं। साफ है कि जब कोई डिग्री प्रोफेशन में आने के लिये जरूरी कर दी जायेगी तो डूबते हुये मीडिया स्कूलों में नई जान आ जायेगी। प्रोफेशन से रोजी रोटी मिले या न मिले लेकिन मीडिया की इन दुकानों का कारोबार खूब चमक उठेगा और आने वाले एक-डेढ़ दशक तक इनका कारोबार खूब फलेगा-फूलेगा।
प्रेस काउंसिल की जो चिन्ता है उसके पीछे इन मीडिया हाउस का दबाव साफ देखा जा सकता है। वरना काउंसिल की चिन्ता पत्रकारों के प्रोफेशनलिज्म की न होकर मीडिया में निवेश होने वाली पूँजी की पड़ताल होना चाहिये था। क्या काउंसिल कोई ऐसा प्रस्ताव भी लाने का प्रयास करेगी कि मीडिया के कारोबार में जो पूँजी घराना उतरेगा वह चिट फण्ड, माइक्रोलेवल मार्केटिंग, बिल्डर- प्रोमोटर, ड्रग्स-केसीनो, डिस्टलरी, पॉवर सेक्टर, खनन जैसे व्यापार नहीं करेगा। मीडिया में पूँजी निवेश करने वाला प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति में हिस्सेदारी नहीं करेगा। क्या प्रेस काउंसिल यह माँग भी करेगी कि मीडिया घरानों में श्रम कानूनों का पालन हो, काम के घण्टे निर्धारित हो, जॉब सिक्योरिटी हो। शायद यह काउंसिल की चिंताओं में शामिल नहीं है।
पिछले वर्ष अप्रैल माह की दो या तीन तारीख को वरिष्ठ पत्रकार और जस्टिस काटजू द्वारा बनाई गई इस समिति के संयोजक श्रवण गर्ग जी से एक कार्यक्रम में संवाद करने का पुण्य लाभ प्राप्त हुआ। वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया जी मीडिया में शोध पर अच्छा काम कर रहे हैं और मास मीडिया व जनमीडिया के नाम से हिन्दी व अंग्रेजी में पत्रकारिता पर शोध पत्रिकाएं प्रकाशित कर रहे हैं। उसी पत्रिका द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी में अधिवक्ता प्रशांत भूषण और मीडिया आलोचक आनंद प्रधान ने मीडिया के कृत्यों पर विस्तार से रोशनी डाली और किस तरह से मीडिया पर पूँजी के दबाव में पत्रकारिता की हत्या की जा रही है उस पर अपनी बात रखी। 
जब श्रवण गर्ग जी का विचार रखने का अवसर आया तो वह उखड़ गये। उनका कहना था अखबार निकालने के लिये 150 करोड़ चाहिये, जिसे मीडिया से दिक्कत हो अपना अखबार निकाल ले। अखबार की कीमत 10 रुपये है आपको चार रुपये में मिलता है। जब सवाल जवाब का दौर चला तो मैंने उनसे कहा- पूँजीपति 10 रुपये का अखबार चार रुपये में देने का एहसान क्यों करता है? सर्कुलेशन की दौड़ में क्यों पड़ता है? जाहिर है उसके निजी स्वार्थ हैं, इसीलिये, वरना 10 की चीज़ 4 में क्यों दे रहा है? 10 रु. का अखबार 4 में इसलिये देता है ताकि 10 रु. की असल कीमत पर अखबार निकालने वाला टिक ही न पाये और वह खबरों को धंधे में तब्दील कर दे।
इस पर श्रवण जी बोले कि आपको दिक्कत है तो आप तय कर लीजिये कि आप मीडिया का इस्तेमाल नहीं करेंगे।
मैंने फिर कहा कि दाऊद इस धंधे में आया तो क्या होगा ? वह तो 10रुपये का अखबार एक रुपये में देगा और अपना एजेण्डा चलायेगा। इस पर श्रवण जी का तर्क था कि फिल्मों में उसका पैसा लगता है आपको कब मालूम पड़ता है। एक और बड़े पते की बात कही उन्होंने। बोले कि रिपोर्टर अगर तथ्यों की पड़ताल करके रिपोर्ट लिखेगा तो अखबार एक साल में निकलेगा।
इतने पर ही नहीं रुके गर्ग साहब। बोले- जस्टिस काटजू को हम प्रेस काउंसिल में रोज झेल रहे हैं। मक्खी मारने के लिये भालू के हाथ में तलवार दे दी है।
अब यही श्रवण गर्ग जी जिस समिति के संयोजक हैं वह समिति जल्द से जल्द अपनी रिपोर्ट देगी जो प्रेस काउंसिल में पारित हो जायेगी तो सरकार के पास जायेगी और सरकार इस पर कानून भी बना देगी। हमें दूर से दिख रहा है समिति क्या निष्कर्ष निकालेगी। बहरहाल श्रवण जी का दर्द कुछ कम हुआ होगा कि मक्खी मारने के लिये भालू के हाथ में तलवार नहीं है।

पत्रकारिता में भावना बनाम तर्कबुद्धि


ललित सुरजन
मेरा हमेशा से मानना रहा है कि वंचित समाज के प्रति संवेदना रखे बिना कोई भी व्यक्ति अच्छा तो क्या, बुरा पत्रकार भी नहीं बन सकता। यहाँ अच्छे पत्रकार से मेरा आशय मोटे तौर पर उस व्यक्ति से है जो अपने पत्रकार जीवन के प्रारम्भ काल में सीखे हुए पाठ को कभी नहीं भूलता और जिसकी कलम की प्रतिबद्धता अन्त तक शोषित, वंचित, पीड़ितजन के साथ बनी रहती है। बुरे पत्रकार की परिभाषा भी मैं कुछ स्पष्ट कर दूँ – वह एक अच्छा मिलनसार, व्यवहारकुशल व्यक्ति हो सकता है, जिसके पास शायद खबरों का खजाना भी हो, लेकिन जिसकी कलम ने शायद निजी लाभ की दिशा पकड़ ली हो! यह मानना गलत नहीं होगा कि पत्रकारिता के पेशे में अमूमन वही व्यक्ति प्रवेश करता है, जो अपनी कलम से समाज और व्यवस्था में व्याप्त बुराइयों और विसंगतियों को दूर करना चाहता है।
अपने बावन साल के पत्रकार के जीवन में मुझे हर तरह के पत्रकारों से मिलने और उनमें से बहुतों के साथ काम करने का मौका मिला है। मैंने यह पाया कि शुरुआती दौर में जो जज्बा और जोश होता है वह धीरे-धीरे ठंडा पड़ने लगता है। ज्यादातर के सामने घर-परिवार को सम्भालने की बात होती है, लेकिन ऐसे भी कम नहीं है, जो नेता, अफसर, ठेकेदार के त्रिगुट में फँस जाते हैं और कई बार तो उस तिकड़ी के एजेन्ट ही बन जाते हैं। जो ज्यादा समझदार हैं वे अपनी उपलब्धि और ख्याति को बेहतर तरीके से भुनाने की कोशिश करते हैं। एक बड़ी संख्या उनकी भी है, जिनके लिये पत्रकारिता पूर्णकालिक व्यवसाय नहीं है। ये किसी छोटे से गाँव में अखबार के विक्रेता और पत्रकार दोनों एक साथ हो सकते हैं। सम्भव है कि इनमें ऐसे लोग भी हों जो अपने छोटे-मोटे व्यापार या राजनीति को चलाने के लिये पत्रकार का रुतबा हासिल कर लेते हैं। इस सबके बावजूद कुछेक अपवादों को छोड़कर पत्रकार के कान हमेशा जमीन से लगे होते हैं और उसके आसपास क्या घटित हो रहा है, उसकी सही जानकारी उसे होती है।
ललित सुरजन, लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक हैं। देशबंधु के प्रधान संपादक हैं ।
इसीलिए पत्रकार से यह अपेक्षा हर वक्त की जाती है कि वह जनता की आवाज को उठायेगा और आम आदमी के जीवन में जो मुश्किलात हैं उन्हें हल करने में सहायक बनेगा। पत्रकार के पास प्रकाशन के जो माध्यम हैं यानी अखबार या टीवी- वे सब इस धारणा पर ही चलते हैं। देश में जनतान्त्रिक व्यवस्था के चलते जिस राजनीतिक चेतना का विकास हुआ है उसमें पत्रकार और उसके पास उपलब्ध माध्यम, दोनों का काम कई गुना बढ़ गया है। गाँव-गाँव से निकलने वाले अखबार, बड़े अखबारों के प्रादेशिक या जिला संस्करण, टीवी के प्रादेशिक चैनल, स्थानीय केबल समाचार इत्यादि उसके प्रमाण हैं। क्या इसके बावजूद यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि पत्रकारिता देश की जनांकाक्षाओं पर खरी उतरी हैकम से कम मेरा उत्तर नहीं में है।
मेरे ध्यान में यह बात आती है कि हमारी पत्रकार बिरादरी में सामाजिक मुद्दों की जानकारी तो है, लेकिन उनका उपचार करने में जिस कौशल का परिचय दिया जाना चाहिये, वह अकसर नहीं दिया जाता और जरूरी बात अंजाम तक पहुँचने के पहले ही दम तोड़ देती है। मेरा कहना है कि अधिकतर समय पत्रकार पवित्र भावनाओं से प्रेरित होते हैं, लेकिन उन्हें ठोस रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश नहीं होती, जिसके चलते शासन-प्रशासन में बैठे लोग अपनी जिम्मेदारियों से बच निकलते हैं। उन्हें उल्टे यह कहने का मौका मिल जाता है कि आप तो हवा में बात करते हैं। मैं रोजमर्रे की ही बातों से एक-दो उदाहरण देकर अपनी बात स्पष्ट करने की कोशिश करूँगा।
यह सब जानते हैं कि देश में नहीं सारे विश्व में जल संकट की अभूतपूर्व स्थिति है। आजकल यह भी अक्सर कहा जाता है कि अगर तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ा तो वह पानी के लिए छिड़ेगा। शहरों और गाँवों में जल सकंट को लेकर आये दिन खबरें छपती ही हैं, लेकिन लगभग सारी की सारी खबरें समस्या का वर्णन करने से ज्यादा कुछ नहीं बतातीं। इस तरह यथास्थिति का वर्णन छपने से प्रभावित लोगों को भले ही थोड़ी तसल्ली मिल जाये या पत्रकार स्वयं अपनी पीठ थपथपा ले, नगरपालिका या जलप्रदाय विभाग के सम्बंधित लोगों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता क्योंकि वस्तुस्थिति को वे पहले से ही जानते हैं।
ऐसे में हमें करना क्या चाहिये? मेरी राय में जिस भी पत्रकार की दिलचस्पी पानी के मसले में हो, उसे राष्ट्रीय जलनीति और यदि प्रदेश की जलनीति हो तो उसका भी अध्ययन करना चाहिये। तभी उसे मालूम होगा कि जलसंकट के विभिन्न आयाम क्या हैं और मूल कारण क्या हैं। जल के आवर्धन, संरक्षण, वितरण और स्वच्छता-इन चारों पहलुओं के बारे में अपनी जानकारी बढ़ाने में उसे तत्पर रहना चाहिये। एक पत्रकार जहाँ भी पदस्थ है वहाँ जलस्रोत क्या हैं, वर्षा जल की क्या स्थिति है, जल संरक्षण की पारम्परिक विधियाँ क्या हैं, नई तकनीक का इस्तेमाल किस रूप में हो रहा है, उसकी लागत नागरिक की जेब पर भारी है या उचित, जलस्रोत प्रदूषित कैसे हो रहे हैं, स्थानीय निकायों की क्या भूमिका है, जलप्रदाय के लिए आर्थिक प्रावधान क्या हैं, श्रमशक्ति का कैसा इंतजाम है- इन सबको जान-समझकर जब रिपोर्ट बनेगी तब ही उस पर समुचित व प्रभावी कार्रवाई होने की सम्भावना बन सकती है। इसी सिलसिले में एक पुराना उदाहरण याद आता है। सन् 1970-71 में रायपुर का मास्टर प्लान पहली बार बना, उसकी बहुत तारीफ हुयी, लेकिन किसी भी पत्रकार ने ध्यान नहीं दिया कि नगर की जल आपूर्ति को लेकर इस भारी-भरकम दस्तावेज में महज पाँच पंक्तियों का एक पैराग्राफ था। यानी नीतिगत स्तर पर ही खामी थी, लेकिन उस पर हमने ध्यान नहीं दिया।
इसी तरह स्वच्छता अभियान या सेनीटेशन का मामला है। एक अभियान बड़े जोर-शोर से चला कि सबको साबुन से हाथ धोना चाहिये। इसे लेकर किसी ने भी यह नहीं पूछा कि यह साबुन बनाने वाली बहुराष्ट्रीय रासायनिक कंपनियों द्वारा प्रेरित अभियान है या इसमें सचमुच कोई सार है। अब बहुत से डॉक्टर भी कह रहे हैं कि दिन में कई बार साबुन से हाथ धोने से त्वचा संवेदनहीन हो सकती है। लेकिन इस पहलू पर पत्रकारों को ध्यान गया ही नहीं। स्वच्छता से जुड़े ऐसे और भी बिन्दु हैं। इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुये स्कूल व अस्पतालों की दशा, बिजली, सड़क आदि के बारे में प्रश्न उठाये जा सकते हैं और उठाये जाना चाहियें।
आशय यह है कि एक पत्रकार को अपनी भावनाओं से समझौता किये बिना, बल्कि उन्हें जीवित रखते हुए एक तर्कप्रणाली विकसित करना चाहिये। किसी भी सामाजिक समस्या से जुड़ी हुयी घटना से तात्कालिक रिपोर्टिंग करना एक बात है, लेकिन उसके निराकरण के लिए कार्य-कारण पद्धति विकसित करना बिल्कुल दूसरी। आजकल कुछ ऐसा चलन हो गया है कि जनता को मूर्ख बनाने के लिये या उसे भ्रम में डालने के लिये लुभावने आँकड़ों को समाचार की शक्ल में परोस दिया जाता है। जिनके निहित स्वार्थ हैं वे तो यह करेंगे ही, लेकिन पत्रकार क्यों उनके झाँसे में आयें! यह योजना दस करोड़ की, वही योजना छह सौ करोड़ की, तो कोई योजना एक हजार करोड़ की- इस सबका अंतत: क्या मतलब है? हम और कुछ न करें, इतना तो कर ही सकते हैं कि जब सौ रुपये की कोई योजना सामने आये तो उसे हम अपने शीर्षक में पन्द्रह रुपये ही लिखें, क्योंकि सबको पता है कि जनता के पास तो अंतत: पन्द्रह पैसे ही पहुँचते हैं!
देशबंधु में 14 मार्च 2013 को प्रकाशित