Tuesday, February 28, 2012

शेहला मसूद हत्याकांड का पर्दाफाश, जाहिदा परवेज गिरफ्तार


भोपाल 28 फरवरी 2012। भोपाल। राजधानी का बहुचर्चित शेहला मसूद हत्याकांड का पर्दाफाश कर लिया गया है। इस हत्याकांड के सिलसिले में सीबीआई ने जाहिदा परवेज नाम की एक महिला को गिरफ्तार भी कर लिया गया है। यह महिला कारोबारी है। सीबीआई अधिकारी थोड़ी देर में खुलासा करने वाले हैं। सीबीआई की हिरासत में रहते हुए जाहिदा ने सबकुछ उगल दिया है। शेहला मसूद की हत्या करने के मामले में जिस जाहिदा परवेज को सीबीआई ने हिरासत में लिया है, वह इंटीरियर डिजाइनर है। जाहिदा का एमपी नगर में चित्तौड़ कॉम्पेक्स में दफ्तर है। सीबीआई अधिकारी जाहिदा को लेकर उस दफ्तर में जाने वाले हैं।
सूत्रों की माने तो शेहला की हत्या करने के लिए सुपारी दी गई थी और हत्यारे कानपुर से आए थे।
शेहला की हत्या पिछले साल 16 अगस्त को उस समय हुई थी जब वह अण्णा हजारे के आंदोलन में शामिल होने बोट क्लब जाने के लिए घर से निकली थीं। घर से निकलकर शेहला कार में बैठी ही थी कि हत्यारे ने नजदीक से उन्हें गोली मारी थी। राजधानी पुलिस के लिए रहस्य बन गए इस हत्याकांड के कुछ ही दिन बाद मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने मामला सीबीआई को सौंपे जाने की बात कही थी। कांग्रेस ने भी साबीआई से जांच की मांग को उस समय तेज कर दिया था, जब भाजपा के सांसद तरूण विजय का नाम इस हत्याकांड से जुड़ा।

Monday, February 13, 2012

Tujhe Yaad Na Meri Aayee

कशी नेशाद्राज पैर आत्याचार न्यू एर्स gift

राम सजेवन duba

प्रियंका की फिसली जुबान, मध्य प्रदेश की तारीफ की


रायबरेली। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी की जुबान सोमवार को उस समय फिसल गई। उन्होंने प्रतिद्वंद्वी भाजपा शासित राज्य मध्य प्रदेश को तेजी से विकास करने वाले राज्यों में से एक बता दिया। हालांकि, प्रियंका ने तुरंत अपनी यह गलती सुधार ली।

प्रियंका ने विकास की कमी के लिए उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि राज्य ने गत 22 वर्षों से विकास नहीं किया है।

उन्होंने कहा कि आप सभी ने मध्यप्रदेश, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र को देखा है। ये सभी राज्य प्रगति कर रहे हैं जबकि उत्तर प्रदेश विकास नहीं कर रहा है।

प्रियंका ने जैसे ही मध्य प्रदेश का नाम लिया, उन्हें अपनी उस गलती का अहसास हो गया। उन्होंने मुस्कराते हुए स्पष्ट किया कि मध्य प्रदेश में उतनी अच्छी सरकार नहीं है। यह जुबान फिसलने के चलते हुई गलती थी। मैं कांग्रेस शासित राज्यों की बात कर रही थी। मैं महाराष्ट्र का नाम लेना चाहती थी, लेकिन गलती से मध्य प्रदेश का नाम ले लिया। विकास तो कांग्रेस शासित राज्यों में हो रहा है। प्रियंका ने उत्तर प्रदेश में बिजली और सिंचाई सुविधाओं की कमी की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया।

वे पत्रकार वास्तव में सत्ता के दलाल है

Tuesday, February 7, 2012

मुसीबतों में घिरा देश का सबसे खूबसूरत प्रेस क्लब


मुसीबतों में घिरा देश का सबसे खूबसूरत प्रेस क्लब


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संभव है जब आप पहली अप्रैल को इस देश के सबसे खूबसूरत प्रेस क्लब, चंडीगढ़ में जाएँ तो आपको वहां दारु न मिले. क्लब के गम इतने ज़्यादा बढ़ गए हैं कि गम गलत करने वाली ‘बार’ आपको वहां हमेशा हमेशा के लिए बंद मिल सकती है. क्लब की बार का लायसेंस रिन्यू होने की संभावना न के बराबर है और इसकी वजह है क्लब के पास इस जगह की कोई लीज़ या किसी तरह की कोई किराएदारी न होना. अलबत्ता ये पहले भी कभी न होने के बावजूद लायसेंस का नवीनीकरण हो जाता रहा है. मगर इस बार बात कुछ अलग है.

इस बार हाईकोर्ट में एक याचिका है. जिसमे कहा गया है कि क्लब के पास करीब सौ करोड़ रूपये बाजारी मूल्य की इस सरकारी ज़मीन पे होने का कोई अधिकार नहीं है. न किरायेनामा, न कोई लीज़. हाई कोर्ट से अब तक मिले तीन मौकों के बावजूद क्लब ऐसा कोई दस्तावेज़ दिखा नहीं सका है. जबकि प्रशासन एक आरटीआई के जवाब में मान चुका है कि उस के पास ज़रूर ऐसा कोई रिकार्ड नहीं है जिस से माना जा सके कि ये ज़मीन कभी चंडीगढ़ प्रेस क्लब को लीज़ या किराए पे कभी दी गयी थी. जहां तक अदालत में याचिका का सवाल है तो क्लब को अब 15 मार्च तक अपनी स्थिति स्पष्ट कर देनी होगी. लेकिन इस बीच एक तो आबकारी विभाग मलकीयत या किरायेदारी का सबूत लेने की शर्त पूरी हुए बिना क्लब को लायसेंस देने की गलती दोहराने के मूड में नहीं है. दूसरे, नगर निगम ने क्लब से वो एक मोटा टैक्स भी वसूल लिया है जिस से क्लब अभी तक बचा या बचता आ रहा था.

क्लब को निगम से मिले एक नोटिस के बाद निगम के दफ्तर में छ: लाख साढ़े छियासठ हज़ार रूपये जमा कराने पड़े हैं. प्रापर्टी टैक्स और उस पे अब तक के जुर्माने के रूप में. प्रापर्टी टैक्स चंडीगढ़ में दिसम्बर, 2004 से लागू हुआ. क्लब को लेट फीस तब से ही देनी पड़ी. क्लब के पास पैसे नहीं थे. क्लब प्रबंधन ने बैंक में पड़ी एफडी तुड़वा कर ये रकम जमा कराई. इतनी बड़ी रकम खर्च करने से पहले न तो क्लब पदाधिकारियों ने सदस्यों से पूछा, न उनको बताया ही. इस बारे कोई मेल तक जारी नहीं की गयी.

इस बीच खबर है कि निगम क्लब से वो करीब एक एकड़ ज़मीन भी वापिस ले लेने फिराक में है जो क्लब को पड़ोस के कम्युनिटी सेंटर से मिली थी. मिली जानकारी के मुताबिक़ निगम इस पर गंभीरता से विचार कर रहा है. इसके पीछे एक कानूनी दलील भी है. सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम् फैसले में कहा है कि जो सरकारी ज़मीन किसी ख़ास मकसद से किसी संस्था को किसी ख़ास उद्देश्य के लिए दी जाए वो उस से लेकर किसी और को किसी अन्य कार्य के लिए नहीं दी जा सकती. किसी तरह की व्यावसायिक गतिविधि के लिए तो बिलकुल नहीं. सुप्रीम कोर्ट का वो अहम् फैसला फरीदाबाद क्रिकेट स्टेडियम वाली ज़मीन के सन्दर्भ में आया. सरकार ने वो ज़मीन लेकर जिसे दी वो वहां पे खानपान का काम और उसके लिए टेंट भी लगाते थे. खानपान का काम और टेंट कम्युनिटी सेंटर से ली गयी इस ज़मीन पे भी होता है. निगम कम्युनिटी सेंटर की ज़मीन उसको इसलिए लौटाना चाहता है. क्लब का स्विमिंग पूल, टेनिस कोर्ट, बैडमिन्टन कोर्ट और पूरी की पूरी पार्किंग उसी ज़मीन पर है. यहाँ तक कि क्लब का मेन गेट भी उसी ज़मीन पर है.ये ज़मीन जब क्लब ने ली तो रेज़ीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन ने इसका विरोध किया था. ये करीब एक एकड़ ज़मीन छिन जाने के बाद कम्युनिटी सेंटर समारोहों के आयोजन के लिए बहुत छोटा पड़ गया. इस से आम लोगों में असंतोष है. निगम की सोच है कि क्लब के नीचे आई ज़मीन कम्युनिटी सेंटर को वापिस दे देना सुप्रीम कोर्ट की राय के अनुरूप होगा.

हालांकि ये संभव है कि निगम और प्रशासन ये ज़मीन क्लब से वापिस लेने से पहले माननीय हाई कोर्ट में चल रहे मामले के निबटने का इंतज़ार करें जिसमे दरअसल क्लब की सारी की सारी ही ज़मीन क्लब से वापिस ले लेने की मांग की गयी है. इस आधार पे कि न तो क्लब के पास कोई लीज़ है और वो इस ज़मीन पे व्यापारिक गतिविधियाँ भी करता आ रहा है.

इस बीच, जानकारी ये भी है कि क्लब के मौजूदा पदाधिकारी हमेशा की तरह मार्च में नए चुनावों के ज़रिये ये सारे झंझट किन्हीं औरों के लिए छोड़ कर खुद पतली गली से निकल लेना चाहते हैं. सदस्यों में एक आम धारणा है कि मुकदमों, जुर्मानों और उनसे उपजी परिस्थितियों से उन्हें अनजान इसलिए रखा जा रहा है.

जिन्हें मालूम न हो बता दें कि कभी देश के सब से अमीर और आज भी सब से खूबसूरत इस प्रेस क्लब के पतन की शुरुआत उन कुछ निर्माण कार्यों से हुई जो कथित रूप से ‘रिश्तेदारों’ को ठेके दे कर कराये गए. इन पे ज़रूरत से बहुत ज्यादा धनराशि खर्च हुई बताई गयी. कुछ सदस्यों ने इस पे सवाल खड़े किये तो उन्हें सस्पेंड कर दिया गया. उन ने जगह जगह आरटीआई डाल दी. पंजाब, हरियाणा की सरकारों से पूछा क्लब को पैसे कितने दिए? यूटीलाइज़ेशन सर्टिफिकेट कितने का मिला? चंडीगढ़ प्रशासन से पूछा क्या कोई लीज़ है इस करीब सौ करोड़ रूपये मूल्य की ज़मीन की प्रेस क्लब को? हरियाणा सरकार ने माना करीब एक करोड़ रूपये दिए. खबर है कि मायावती भी अपने तीस लाख रुपयों का यूटीलाइज़ेशन सर्टिफिकेट मांग रही हैं. चंडीगढ़ प्रशासन ने मान लिया कि प्रेस क्लब किसी लीज़ या किरायेदारी के बिना काबिज़ है इस ज़मीन पर. एक और आरटीआई आबकारी विभाग को गयी. इसमें पूछा कि क्या बार का लायसेंस देने के लिए मलकीयत, लीज़ या किरायेदारी का सबूत ज़रूरी होता है और अगर हाँ तो क्या वो क्लब से कभी लिया गया? इसके बाद आबकारी विभाग की सिट्टी पिट्टी गुम है. पहले पिछले पैसों का ही कोई हिसाब किताब न मिलने के बाद सरकारों ने भी पैसे देने कब के बंद कर दिए हैं. ऐसे में क्लब के पदाधिकारी भारी मुश्किल में हैं.

इस बीच क्लब ने एक तीर और चलाया. उसने क्लब में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करने वालों को निकाल देने की धमकी दी. इनमे हाईकोर्ट में याचिका डालने वाले संजीव पाण्डेय भी थे. उन ने जब हाई कोर्ट को बताया कि क्लब उनपे याचिका वापिस लेने का दबाव बना रहा है तो माननीय हाईकोर्ट ने वो चिट्ठी भेजने वाले क्लब के महासचिव को अवमानना का नोटिस दे दिया. उसका भी जवाब अभी आना है.

सब से ताज़ी जानकारी ये है कि क्लब से हिसाब किताब उन साढ़े सात लाख रुपयों का भी पूछा जाने वाला है जो उसने स्थानीय सांसद (और केन्द्रीय संसदीय मंत्री) पवन बंसल के निधि कोष से लिए. पहली मंजिल पे लायब्रेरी बनाने के लिए. लायब्रेरी जो कभी कहीं बनी ही नहीं!

Date6-2-2012

Saturday, December 10, 2011

अवैध उत्खनन मामले में उच्च स्तरीय जांच की जरूरत- ज्योतिरादित्य


अवैध उत्खनन मामले में उच्च स्तरीय जांच की जरूरत- ज्योतिरादित्य
भोपाल 10 दिसंबर 2011। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग राज्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी प्रदेश में अवैध उत्खनन पर राज्य सरकार को निशाने पर लिया है। श्री सिंधिया ने प्रदेश में हो रहे अवैध उत्खनन मामले में उच्च स्तरीय जांच की जरूरत बताई है। वहीं श्री सिंधिया ने आज मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से भी मुलाकात की।
श्री सिंधिया ने करीब पंद्रह मिनट तक मुख्यमंत्री से बातचीत की। श्री सिंधिया ने मीडिया से चर्चा में कहाकि ग्वालियर में प्रस्तावित दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रीयल कोरीडोर के निर्माण में जमीन की तंगी आड़े आ रही है। इसके लिए जमीन राज्य सरकार को मुहैया कराना है। इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर मुख्यमंत्री ने चर्चा के दौरान गंभीरता दिखाई है। साथ ही जल्द ही जमीन संबंधी समस्या का निराकरण करने का भरोसा दिलाया। इसके अलावा केंद्र की विभिन्न योजनाओं पर भी श्री सिंधिया ने मुख्यमंत्री से चर्चा की। श्री सिंधिया ने विकास कार्यों से जुड़ी योजनाओं में राज्य शासन की ओर से आ रही समस्याओं की ओर मुख्यमंत्री का ध्यान आकर्षित किया है। श्री सिंधिया ने बताया कि लगभग सभी मुद्दों पर मुख्यमंत्री ने सकारात्मक रवैया दिखाया है। उम्मीद है कि विकास योजनाओं को जल्द ही गति मिलेगी।
हालांकि अवैध खुदाई को लेकर श्री सिंधिया ने तीखे तेवर दिखाए हैं। मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए श्री सिंधिया ने कहाकि यहां भी बेल्लारी से बड़ा खुदाई घोटाला चल रहा है। कई जिलों में अवैध उत्खनन हुआ है। इसकी उच्च स्तरीय जांच की जाना चाहिए। वहीं महंगाई पर श्री सिंधिया ने कहाकि यह अंतरराष्ट्रीय उथल-पुथल का नतीजा है। हालांकि हम इस पर काबू पाने का प्रयास कर रहे हैं। केंद्र शासन के प्रयासों के चलते महंगाई दर दस से घटकर करीब छह प्रतिशत पर आ गई है। इसके और नीचे आने की उम्मीद है।

भोपाल में दुनिया का सबसे बड़ा तब्लीगी इज्तिमा शुरू

भोपाल 10 दिसंबर 2011। सरजमीने भोपाल की पहचान यहां की मलिकाओं और मस्जिदों के बाद भोपाल के तब्लीगी इज्तेमा से है। 64 वर्ष पूर्व चंद अल्लाह के दीवानों ने दीन की गौर ओ फिक्र में भोपाल को चुना। उनके इखलास और नीयत की बदौलत आज पूरी दुनिया में दावत और दीन की हवाएं चल रही हैं। भोपाल की ताजुल मसाजिद के प्रांगण में 64 साल पूर्व एक जमात की कार्यकारिणी से आज पूरे विश्व में ताजुल मसाजिद के मीनारों की सदाएं गूंज रही हैं। इस जमात की विशेषता यह है कि इसके पास एक ऐसा फार्मूला है जिसकी बदौलत समाज में वो बदलाव आता है जो आज के संवैधानिक तौर-तरीकों से भी नामुमकिन है। दावत के जरिए बुजुर्गाने दीन के मुंह से निकली बात से बड़े-बड़े डाकू भी सब कुछ छोड़कर राहे दीन में उतर आए वहीं यूरोपीय और एशिया के अनेक मुल्कों में लोग ईमान से सरफराज हो गए और यह सिलसिला निरंतर जारी है। इस जमात की एक और विशेषता यह है कि इस जमात का हर कार्यकर्ता वही अहमियत रखता है जो कि आला जमाती रखता है। इसमें दिखावा और राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश तो बहुत दूर उसका छींटा भी नजर नहीं आता। पूरा कार्य नीयत और अमल पर है। इस्लामी देशों में सऊदी अरब, ईरान, इराक, इंडोनेशिया, मलेशिया जैसे मुल्क भी इस बात का लोहा मानते हैं कि भारत में भोपाल एक ऐसा शहर है जहां पर दीन का सरचश्मा बह रहा है।

Monday, December 5, 2011

संपादक हो गये सौमित्र जी


संपादक हो गये सौमित्र जीBy संजअनिल सौमित्र जब भी मुझे मिलते हैं मैं हमेशा उन्हें कहता हूं- अनिल जी के सौ मित्र, उसमें से एक मैं भी हूं. सौमित्र का संधि विच्छेद करके जो विशेषण निकलता है वे उस विशेषण के बिल्कुल अनुरूप हैं. सौम्य हैं. शांत हैं. और मित्र तो ऐसे बनाते हैं जैसे कोई चना चबैना हो. आसान सफर हो या मुश्किल डगर, जैसे चना चबैना सबसे सस्ता और सुमग होता है वैसे ही अपने अनिल सौमित्र सबके लिए सुगम हैं. यही अनिल सौमित्र अब संपादक हो गये हैं.

पिछले तीन चार सालों में विस्फोट ने जो कुनबा तैयार किया है उसमें अनिल सौमित्र का आगमन भी अपने आप ही होता है. ठीक ठीक याद नहीं कि कैसे संपर्क हुआ लेकिन शुरूआत फोन से हुई. अनिल सौमित्र वैसे तो रहते भोपाल में हैं लेकिन पढ़ाई लिखाई दिल्ली से की है. पढ़ाई भी कौन सी. वही पत्रकारिता वाली. दिल्ली के दक्खिन में जो देश का सबसे प्रतिष्ठित पत्रकारिता विद्यालय है उसी इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मास कम्युनिकेशन से अनिल सौमित्र ने भी पत्रकारिता पढ़ी है. पत्रकारिता पढ़े और दिल्ली में कुछ दिन दौड़े भी. कोशिश की कि डिग्री दीवार पर टांगने से अच्छा है किसी अखबार के दफ्तर में दिखा दी जाए और कुछ सैलेरी वैलरी वाली नौकरी कर ली जाए. लेकिन कोशिश कामयाब हो यह जरूरी तो नहीं होता है. पत्रकारिता में नौकरी होने के लिए ढेर सारे संयोगों का होना जरूरी होता है. इन समस्त संयोगों में नैतिकता का नाश, जी हुजुरी का विलास और स्वामिभक्ति का मोहपाश तो दिखना ही चाहिए. अनिल जी कुछ कच्चे थे इसलिए न नौकरी मिली न पत्रकारिता हुई.

तो, दिल्ली छोड़ भोपाल की ओर दौड़ गये. इधर अब जबकि मैं उनके सौ मित्रों में शामिल हूं तो एक दफा मैंने पूछा आप भोपाल क्यों गये तो कारण उन्होंने वह नहीं बताया जो हम आंकलन कर रहे हैं. उन्होंने जो कारण बताया वहीं से हम अनिल जी को समझने की कोशिश भी कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि दिल्ली बहुत बड़ा शहर है. यहां का भीमकाय रूप और भागभाग की जिन्दगी दोनों यहां से दूर जाने के लिए मजबूर करती हैं. बिहार से दिल्ली होते हुए अब वे पूरे भोपाली हो चले हैं. बातचीत में बार बार मालवा की बोली हौ हौ भी बोलते हैं जिससे लगता है कि हम सचमुच किसी भोपाली से ही बात कर रहे हैं. भोपाल में उन्होंने जाकर नौकरी कर ली हो ऐसी बात भी नहीं है. लेकिन पत्रकारिता और एक खास विचारधारा की पक्षधरता उन्होंने जारी रखी.
खास विचारधारा की पक्षधरता इसलिए कह रहे हैं क्योंकि आरएसएस जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कहते हैं उसकी शाखाओं से निकले पत्रकार अक्सर अपनी पहचान छुपाते हैं. ऐसा वे क्यों करते हैं पता नहीं. हो सकता है वे पत्रकारिता में छापामार बनकर काम करना चाहते हों या ये भी हो सकता है कि उन्हें अपनी ही विचारधारा पर अविश्वास हो इसलिए पहचान छुपाते हैं. अनिल सौमित्र ऐसे नहीं है. लंबे समय तक उन्होंने आरएसएस के पत्रकारिता विभाग विश्व संवाद केन्द्र के लिए काम किया और इसे अपनी पहचान भी बनाया. वे जानते थे कि इस पहचान के कारण तथाकथित मुख्य धारा की पत्रकारिता के आंगन में पेड़ लगाना मुश्किल होगा लेकिन मानों वे अपनी विचारधारा के गमले में ही खुश थे. उन्हें गमले से निकलकर विस्तार पाने की ऐसी छद्म लालसा कभी नहीं रही है जिसमें विचारधारा का संकट पैदा होता हो. उन्हें यह बताने में हमेशा खुशी होती है कि वे राष्ट्रवादी विचारधारा के पत्रकार हैं.

लेकिन इस राष्ट्रवादी विचारधारा के बीच भी कोई लकीर के फकीर नहीं हैं. वे अपने परिचय में हमेशा एक लाइन जोड़ते हैं कि वे मीडिया एक्टिविस्ट हैं. आरएसएस की विचारधारा के बीच रहते हुए मीडिया एक्टिविज्म को प्रासंगिक रख पाना उनके मुखर स्वभाव का ही परिणाम है. इसी एक्टिविज्म को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने भोपाल में सामाजिक और राजनीतिक संपर्कों की एक लंबी श्रृंखला निर्मित कर रखी है. अगर आप अनिल सौमित्र की इस श्रृंखला में प्रवेश करेंगे तो पायेंगे कि माला की तरह हर मनके के बाद सौमित्र जी सूत की तरह मौजूद रहते हैं. उनका सौम्य स्वभाव उनको प्रासंगिक बनाये रखता है और कई बार गधा, घोड़ा खच्चर भी बना देता है. जो आता है, चार काम लाद कर चला जाता है. लेकिन अनिल सौमित्र ने कभी किसी को ना नहीं किया. लिखने पढ़ने और परिवार में पूरा समय देने के बाद भी लोगों के लिए लगातार काम करते रहना उनकी खासियत है.

यही अनिल सौमित्र अब संपादक हो गये हैं. मध्य प्रदेश में भाजपा की पत्रिका चरैवेति के. बताते हैं कि पत्रिका करीब पैंसठ हजार छपती है और भाजपा कैडर तथा कार्यकर्ताओं के वैचारिक स्तर पर संपर्क बनाये रखने का सशक्त माध्यम है. लेकिन जितना हम अनिल जी को जानते समझते हैं हम उम्मीद कर सकते हैं कि संपादक होने के बाद भी उनका एक्टिविज्म जारी रहेगा जिसका फायदा किसी को हो न हो कम से उस विचारधारा और उस पत्रिका को जरूर होगा जो अब उनका अगला काम है.
य तिवारी

Sunday, October 30, 2011

जनसंवेदना ने अध्यात्मिक साधिका का किया अपमान, भक्त करेगें मानहानी का दावा

जनसंवेदना ने अध्यात्मिक साधिका का किया अपमान, भक्त करेगें मानहानी का दावा
भोपाल 30 अक्टूबर 2011। भोपाल में अपने आप को समाज सेवा को समर्पित कही जानी वाली संस्था जनसंवेदना ने 10 अक्टूबर को भोपाल में अध्यात्मिक साधिका सुश्री तनुजा ठाकुर को भोपाल में दो दिन के लिए आमंत्रित किया और रविन्द्र भवन में उन के प्रवचन करवायें और इसी कार्यक्रम की आड़ में चंदा उगाही करी साधिका सुश्री तनुजा ठाकुर के भक्तों एवं उन के फेसबुक मित्रों के यहां जाकर जनसंवेदना के संचालक अघ्यक्ष ने जाकर जनसंवेदना के माध्यम से पैसे मांगे और इस हेतू सभी समाचार पत्रों में विज्ञापन और पत्रकारवार्ता बुला कर इसका उल्लेख करते हुए संस्था के लिए एक गाड़ी जरूरी है कह कर भी चंदा मांगा और उस प्रवचन में लोगों को बुलाने का इंतज़ाम तक नहीं किया गया। वहीं 'अतिथि देवों भवः' की परम्परा निभाते के नाम पर साधिका सुश्री तनुजा ठाकुर को उन्हें ऐसी जगह ठहराया गया जो अनके लोगों को पसंद नहीं आया जहां पानी तक का सही बंदोबस्त नहीं किया गया। प्रवचन के उपरांत दक्षिणा तो दूर जन संवेदना पत्रिका में उन्हें एक साधिका के स्थान पर अध्यात्मिक व्यवसायी लिख कर संबोधित किया गया। अब जब संस्था को गाड़ी मिल गई जो सुश्री तनुजा ठाकुर के हाथों की संस्था के अध्यक्ष ने ग्रहण की, यह 5.50 लाख की गाड़ी एक सांसद ने सांसद निधि से दी है। इस के बाद जैसे अपना उल्लू मानों सीधा हो गया फिर क्या था जनसंवेदना जैसे संवेदनहीन हो गई और सुश्री तनुजा ठाकुर को भोपाल में अपमानित करने के बाद फेस बुक पर भला बुरा कहना शुरू कर दिया। सुश्री तनुजा ठाकुर के फेसबुक मित्रों एवं भारतवर्ष में फैले उन के भक्तों ने जन संवेदना संस्था के अध्यक्ष सहित सभी पद अधिकारियों पर मानहानि का दांवा ठोकने का मन बना लिया है, उन का कहना है की भले ही हमारी दीदी तनुजा ठाकुर ने माफ कर दिया हो पर हम अपने गुरू का अपमान सहन नहीं करेगें। जनसंवेदना जैसी संस्था जो लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार के नाम पर चंदा उगाही कर संस्था की आड़ में जमीन, गाड़ीया और भवन निर्माण कर रही है ऐसे लोगों के खिलाफ कार्यवाही तो होनी चाहिए और उन का बेनकाब होना जरूरी है।

Saturday, October 29, 2011

Can our slain RTI activists ever get justice?


Shehla Masood, the RTI activist from Madhya Pradesh who was shot and killed recently, joined the unfortunate list of seventeen other known cases of RTI activists who have suffered the same fate over the last couple of years. According to a close associate of Shehla, she filed more than one thousand RTI applications in diverse areas ranging from the judiciary, the tendering process, the enforcement of Wildlife and Forest laws, heritage conservation, the lavish spending of public money, and human rights abuses. Quite understandably, she had accumulated a host of enemies across a broad range of departments until some vested interests decided it was time to snuff out this passionate and committed voice forever. Shehla Masood is not an isolated case. Such executions have been taking place every few months with almost predictable precision: Firebrand activist files several RTI applications, becomes a threat to those in power, gets killed by unknown assailants who are never traced.

How many more of our young men and women who have dedicated their lives to public service should we lose before we choose to take notice? Today, thanks to the Right to Information Act, citizens have the right to seek information from the government. But what use is it if those among us who care enough to file these applications are routinely targeted and eliminated by their enemies? “Great work! But do it at your own risk, good luck to you!” is the message we are sending to those with similar drive and motivation. Can’t we do better? Can we at least ensure that those who wish to reform the system or serve the country don’t have to fear for their lives?

The recent anti-corruption movement in India witnessed so many young people shed their apathy and come forward to join a mass movement. These young men and women stepped up to the plate not because they adored Anna. Team Anna was only a catalyst for action. The people who actively participated in the movement did it for themselves and for their future generations. They believed that by participating they could actually make a difference. The dream of a corruption-free India resonated with them, and inspired and motivated them to act. For the first time since Independence the youth of our country displayed that they could think beyond themselves and actively engage in critical civic discourse. As a nation, we need to nurture and build upon this momentum and ensure that this interest is sustained and does not turn out to be a one-time effort. We owe it to them and to future generations to implement tough laws that protect whistle blowers.

A good place to start would be to ensure that justice is served in the case of Shehla Masood and other similar victims. But is our political class capable of this? Without a truly independent investigative agency can justice be served? Given the track record of our past investigations, what confidence, if any, can one have that the CBI investigation will lead to anything at all?

It all circles back to our politics, our democracy and our elected representatives. We have a democratically elected Ruling Party which appears to be leaderless and an Opposition that is grappling to remain relevant. We have investigative agencies that are merely puppets at the beck and call of those in power. We have a judicial system that seems incapable of speedy delivery of justice. To top it all, we don’t have strong laws to nail the criminals.

Every time a murder of this kind occurs, it remains in the media eye for a couple of months and then vanishes almost completely from public attention. The family is left to deal with the irreparable loss and the criminals go scot-free.

If surveys are to be trusted, the Congress is on the decline and the BJP is on the ascent. But at the end of the day these two parties are no different from each other, while the rest are inconsequential. The reality is that RTI activists are at risk no matter which party is in power. Corruption is deeply ingrained in the DNA of all our parties. There are no easy answers to this predicament, but the sooner we realize that all our political options are equally horrific, the faster we will coalesce towards a solution. In the meantime tough laws (a.k.a Jan Lokpal bill) are our best bet and hope, and a baby step towards curtailing corruption and ensuring justice. Until such time, it is highly unlikely that the unfortunate victims among us will ever receive justice.

Author
Pran Kurup
(A blogger at Economic Times)
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About the Author



Mr. Pran Kurup
Pran Kurup graduated from IIT Kharagpur in 1989. He is Founder, President and CEO of Vitalect, an e-learning company, providing online training and learning solutions to create and manage online content. Pran is also actively involved in social activities. He co-founded the alumni Web site of IIT Kharagpur, is member of The Indus Entrepreneurs (TiE) and previously served as the Chairman of the Silicon Valley Indian Professionals Association (SIPA).

Tuesday, October 25, 2011

कीर आदिवासी समाज द्वारा दीपावली पर्व पर किया जाता है पितरों को तर्पण


राजेंद्र कश्यप, दीपक शर्मा द्वारा)
दीपावली पर्व सारे देश में विभिन्न मान्यताओं के साथ मनाया जाता है। कीर आदिवासी राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में बहुलता से निवासी करते हैं। कार्तिक अमावस्या के दिन प्रात:काल से समाज के स्त्री, पुरूष और बच्चे निवास के पास के नदी या तालाब के पास पहुंच कर स्नान कर नए रंगबिरंगे वस्त्र पहनते हैं, और उपवास रख़ते हुए नदी के किनारे ही शु़द्धतापूर्वक भोजन बनाकर सूर्य अस्त होने के पूर्व ही अपने पितरों को जल धूप नारियल प्रसाद अग्नि में अर्पित करते हैं। कीर आदिवासियों की मान्यता है कि केवल इस दिन ही हमारे पूर्वजों की आत्माएं पृथ्वी पर आकर होम ग्रहण करती है। शाम होने पर नदी किनारे और अपने घरों पर श्रद्धापूर्वक दिए जलाते है। जिसकी रोशनी देख पितरों की पवित्र आत्माएं पृथ्वी पर आकर उस होम को ग्रहण कर लें। पितरों के होम के पूर्व गोरा और महादेव की पूजा अर्चना कर गीत गाए जाते हैं।
कीर समाज की मुख्य भूमि राजस्थान है वहीं से मुगलों कर लड़ते -लड़ते उत्तर प्रदेश, राजस्थान गुजरात और मध्यप्रदेश की नदियों और तालाब के किनारे बसते गए। मध्य प्रदेश में भूपाल राज्य में मुख्यत: निवास करते रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति डा0 शंकर दयाल शर्मा ने भोजपुर मिंदर के पास कीर समाज के निवासियों के टीले के बीच एक स्तंभ का शिलान्यास वर्षों पूर्व किया था।
कीर समाज के बुजुर्गों की मान्यता है कि शिवशक्ति का केंद्र भोजपुर मंदिर की रक्षा करने के लिए हजारों वर्षों से हम इसके पास के गांवों में रहते रहे हैं। हमेशा भोजपुर की रक्षा करते रहेंगे।
कीर समाज के लोग किसी भी प्रदेश में रहे उनकी भाषा में आज भी राजस्थानी पुट रहता है। स्त्रियों की वेशभूषा राजस्थानी रहती है। कार्तिक अमावस्या को पितरों को होम देकर संकल्प करते हैं कि प्रत्येक परिस्थितियों में अपना गांव नदी तालाब के किनारे की जलीय खेती, तरबूज, खरबूज, सिंघाड़ा आदि सब्जियों का उत्पादन बढ़ाकर अपने व्यवस्था की रक्षा और समृद्धि करते हुए शिव मंदिरों की रक्षा करते रहेंगे।
इस अवसर पर कुल देवताओं और पितरों की मनौती पूरी करना और घर परिवार के साथ गांव क्षेत्र की खुशहाली तथा समृद्धि की तमन्ना के साथ ही अपने पशुओं की रक्षा की प्राथना होती है। अपनी अनूठी परंपरानुसार दीपावली पर्व पितरों के होम तर्पण के रूप में पूर्ण श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन सांडनी की पूजा विशेष रूप से की जाती है, जिस पर बैठकर ही कीर समाज का दूल्हा बारात लेकर जाता है। कई वर्षों पूर्व भोजपुर के पास कीर नगर नामक गांव इसी आदिवासी समाज द्वारा बसाया गया है।

Date: 25-10-2011

program

Monday, October 24, 2011

कीर आदिवासी समाज द्वारा दीपावली पर्व पर पितरों को तर्पण किया जाता है।

कीर आदिवासी समाज द्वारा दीपावली पर्व पर पितरों को तर्पण किया जाता है।
(राजेंद्र कश्यप,दीपक शर्मा द्वारा)


दीपावली पर्व सारे देश में विभिन्न मान्यताओं के साथ मनाया जाता है। कीर आदिवासी राजस्थान, गुजरात ,उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में बहुलता से निवासी करते हैं। कार्तिक अमावस्या के दिन प्रात:काल से समाज के स्त्री ,पुरूष और बच्चे निवास के पास के नदी या तालाब के पास पहुंच कर स्नान कर नए रंगबिरंगे वस्त्र पहनते हैं,और उपवास रख़ते हुए नदी के किनारे ही शु़द्धतापूर्वक भोजन बनाकर सूर्य अस्त होने के पूर्व ही अपने पितरों को जल धूप नारियल प्रसाद अग्नि में अर्पित करते हैं। कीर आदिवासियों की मान्यता है कि केवल इस दिन ही हमारे पूर्वजों की आत्माएं पृथ्वी पर आकर होम ग्रहण करती है। शाम होने पर नदी किनारे और अपने घरों पर श्रद्धापूर्वक दिए जलाते है। जिसकी रोशनी देख पितरों की पवित्र आत्माएं पृथ्वी पर आकर उस होम को ग्रहण कर लें। पितरों के होम के पूर्व गोरा और महादेव की पूजा अर्चना कर गीत गाए जाते हैं।

कीर समाज की मुख्य भूमि राजस्थान है वहीं से मुगलों कर लड़ते -लड़ते उत्तर प्रदेश,राजस्थान गुजरात और मध्यप्रदेश की नदियों और तालाब के किनारे बसते गए। मध्य प्रदेश में भूपाल राज्य में मुख्यत: निवास करते रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति डा0 शंकर दयाल शर्मा ने भोजपुर मिंदर के पास कीर समाज के निवासियों के टीले के बीच एक स्तंभ का शिलान्यास वषाzें पूर्व किया था। कीर समाज के बुजुर्गों की मान्यता है कि शिवशक्ति का केंद्र भोजपुर मंदिर की रक्षा करने के लिए हजारों वषोzं से हम इसके पास के गांवों में रहते रहे हैं। हमेशा भोजपुूर की रक्षा करते रहेंगे।

कीर समाज के लोग किसी भी प्रदेश में रहे उनकी भाषा में आज भी राजस्थानी पुट रहता है। स्त्रियों की वेशभूषा राजस्थानी रहती है। कार्तिक अमावस्या को पितरों को होम देकर संकल्प करते हैं कि प्रत्येक परिस्थितियों में अपना गांव नदी तालाब के किनारे की जलीय खेती, तरबूज,खरबूज,सिंघाड़ा आदि सब्जियों का उत्पादन बढ़ाकर अपने व्यवस्था की रक्षा और समृद्धि करते हुए शिव मंदिरों की रक्षा करते रहेंगे।

इस अवसर पर कुल देवताओं और पितरों की मनौती पूरी करना और घर परिवार के साथ गांव क्षेत्र की खुशहाली तथा समृद्धि की तमन्ना के साथ ही अपने पशुओं की रक्षा की प्राथना होती है। अपनी अनूठी परंपरानुसार दीपावली पर्व पितरों के होम तर्पण के रूप में पूर्ण श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन सांडनी की पूजा विशेष रूप से की जाती है, जिस पर बैठकर ही कीर समाज का दूल्हा बारात लेकर जाता है। कई वषोzं पूर्व भोजपुर के पास कीर नगर नामक गांव इसी आदिवासी समाज द्वारा बसाया गया है।
www.eklavyashakti@gmail.com

Wednesday, October 5, 2011

Tuesday, August 23, 2011

कश्मीर हिन्दूओं का मेरा नहीं ?

कश्मीर हिन्दूओं का मेरा नहीं ?

राष्ट्रीय एकता समिति के तत्वावधान में 'कश्मीर : समस्या और समाधान' विषय पर आयोजित संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए सेवानिवृत्त

Helena Paparizou

Monday, August 22, 2011

पत्रकार निर्मल पचौरी 23 अगस्त से जनसंपर्क संचालनालय के सामने अनिश्चितकालीन धरने पर बैठेंगे।

भोपाल। पत्रकारों की समस्याओं को लेकर पत्रकार निर्मल पचौरी 23 अगस्त से जनसंपर्क संचालनालय के सामने अनिश्चितकालीन धरने पर बैठेंगे। राजधानी में आयोजित एक पत्रकार वार्ता में निर्मल पचौरी ने बताया कि पत्रकारों की अनेकों समस्याएं हैं। उन्होंने प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों एवं प्रेस फोटोग्राफर, कैमरामेनों से अपील की है कि 23 अगस्त की प्रात: 10 बजे से 3 बजे तक प्रतिदिन होने वाले अनिश्चितकालीन धरना स्थल पर आकर वहां रखे रजिस्टर में अपनी समस्याएं लिखे, इन समस्याओं के समाधान के लिए एक समिति द्वारा निर्णय करने के बाद उसको मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान तथा जनसंपर्क मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा को ज्ञापन के रूप में सौंपा जाएगा। श्री पचौरी ने बताया कि लगभग 16 साल पहले पत्रकारों ने जन संपर्क संचालनालय के सामने धरना दिया था। उन्होंने पत्रकारों से संबंधित संगठनों के पदाधिकारियों से अपील की है कि सभी पत्रकारों के हित में एकत्र होकर सहयोग एवं समर्थन दे। इस अवसर पर उपस्थित जनसंवेदना पत्रिका के संपादक आर.एस. अग्रवाल ने बताया कि धरना दे रहे पत्रकार साथियों के लिए प्रतिदिन दोपहर एक बजे जनसंवेदना की ओर से भोजन व्यवस्था की गई है। पत्रकारों को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार आदित्य नारायण उपाध्याय ने कहा कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एवं जनसंपर्क मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा द्वारा पत्रकारों के हित में किए जा रहे प्रयासों को धता बताकर जनसपंर्क संचालनालय के अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा पत्रकार विरोधी कार्य किए जा रहे हैं। जनसंपर्क विभाग भ्रष्टाचार का मुख्य अड्डा बन गया है। जहां चेहरे देखकर और कमीशन लेकर विज्ञापन आर्डर जारी किए जाते हैं। वहीं विज्ञापन देने, अधिमान्यता तथा मेडिकल सहायता देने में भी भेदभाव किया जा रहा है। श्री उपाध्याय ने कहा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने निवास पर अन्य पंचायतों की तर्ज पर पत्रकार पंचायत का आयोजन करें, ताकि पत्रकार अपनी समस्याओं से उन्हें अवगत करा सकें।
पत्रकारों एवं फोटोग्राफरों की प्रमुख मांगें
़़1-मुख्यमंत्री और जन संपर्क मंत्री के निर्देशों एवं आदेशों का अवहेलना करने वाले जन संपर्क विभाग के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
2-पत्रकारों की हत्या और कातिलाना हमला करने वालों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई होना चाहिए तथा पत्रकारों की जानमाल की सुरक्षा के लिए कड़ा कानून बनाना चाहिए।
3-जन संपर्क विभाग द्वारा समाचार पत्र-पत्रिकाओं तथा न्यूज चैनलों को जारी होने वाले विज्ञापनों की सूची प्रतिदिन डिस्प्ले होना चाहिए।
4-समाचार पत्र-पत्रिकाओं को दिए जाने वाले विज्ञापनों में एकरूपता होनी चाहिए।
5-भ्रष्टाचार का गढ़ बन चुके जनसंपर्क संचालनालय मेें भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
6-पत्रकारों के लिए पेंशन योजना शीघ्र लागू की जाए तथा आर्थिक सहायता तत्काल उपलब्ध कराई जाए।
7-अधिमान्यता समिति, आर्थिक सहायता समिति, विधानसभा में पत्रकार दीर्घा समिति के सदस्यों का प्रतिवर्ष पुनर्गठन होना चाहिए।
8- जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा अपनी पत्नी व बच्चों के नाम से निकाली जा रही पत्र-पत्रिकाओं के लिए दिए जाने वाले विज्ञापन तत्काल बंद किए जाए।
9-आपराधिक छवि के तथा सजायाफ्ता पत्रकारों की अधिमान्यता रद्द की जाए।
10-कवरेज के दौरान प्रेस फोटोग्राफरों तथा कैमरामेनों के कैमरे के साथ हुई क्षति का तत्काल मुआवजा दिया जाए।
11-बीस-पच्चीस कॉपी छाप कर पत्रकार बनने वाले लोगों के विज्ञापन पर रोक लगाई जाए। ऑल्टर अखबारों के विज्ञापन बंद किए जाए।
12-प्रसार संख्या के लिए सीए प्रमाण पत्र के साथ समाचार प्रिटिंग प्रेस का बिल लगाना अनिवार्य किया जाए। सीए प्रमाण पत्र तथा प्रिटिंग प्रेस की छपाई के बिल में अंतर होने पर धारा 420 के तहत प्रकरण दर्ज कराया जाए।
13-आठ पृष्ठ के समाचार पत्र में अंतिम पृष्ठ पर कलर विज्ञापन, कलर फोटो कॉपी से तथा सात पृष्ठ ब्लेक एंड व्हाइट छपवाने वाले अखबारों के विज्ञापन बंद किए जाए तथा उनके खिलाफ धोखाधड़ी का प्रकरण दर्ज कराया जाए।
14-समाचार पत्र-पत्रिका छापने वाले प्रिंटिग संस्थानों की मशीनों की प्रिंटिग क्षमताओं का प्रमाण पत्र लिया जाए। उनके संस्थानों में छपने वाले पत्र-पत्रिकाओं की सूची प्रतिमाह ली जाए।
15-पत्रकारों के नाम पर बनी गृह निर्माण समितियों के क्रियाकलापों की जांच की जाए। पत्रकारों के नाम पर गैर पत्रकारों को प्लॉट आवंटन एवं सदस्य बनाने की जांच कर उसकी सदस्यता निरस्त की जाए।
16-गृह निर्माण समितियों में धोखाधड़ी करने वाले पदाधिकारियों तथा शपथ पत्र में गलत जानकारी देने वाले सदस्यों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण कायम किए जाए।
17-वास्तविक पत्रकारों को गृह निर्माण समिति का सदस्य बनाया जाए और पत्रकार गृह निर्माण समितियों का व्यावसायीकरण बंद किया जाए।
18-जिन पत्रकारों के भोपाल अथवा अन्य शहरों में स्वयं के निजी मकान है, उनसे शासकीय आवास खाली कराए जाए।
19-पत्रकारों के नाम पर कथित लोगों को आवंटित शासकीय आवास खाली कराए जाए।
20-पत्रकार और उनके परिजनों द्वारा शासकीय आवास में चलाई जा रही व्यापारिक गतिविधियों पर रोक लगाई जाए। व्यापारिक गतिविधियां चलाने वाले पत्रकारों के शासकीय आवास खाली कराए जाए।
21-मुख्यमंत्री निवास पर प्रति वर्ष एक बार पत्रकार पंचायत बुलाई जाए।