सफेद हाथी साबित हो रहा है प्रदूषण मंडल
प्रदेश में 248 उद्योग जलवायु को कर रहा प्रदूषित
भोपाल। मध्यप्रदेश सरकार ने भले ही प्रदेश की जनता की चिंता करते हुए राज्य प्रदूषण मंडल की स्थापना की हो। लेकिन ऐसा नहीं लग रहा है कि यह मंडल की जनता के हितों की रक्षा करने में अपने कर्त्तव्यओ का निर्वाहन कर रहा है। राज्य में स्थापित उद्योगों और प्रदूषण मंडल के अधिकारियों की सांठ-गांठ के चलते राज्य में उद्योगों द्वारा प्रदूषण फैलाया जा रहा हैं। लेकिन यह सिवाय कागजी खाना पूर्ति के कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर पा रहा है। लगता है कि प्रदेश शासन और यह प्रदूषण मंडल तभी जागेगा जब राज्य में एक और यूनियन कार्बाइट जैसी घटना घटित हो जाए।
जहां तक राज्य प्रदूषण मंडल बोर्ड का सवाल है इसके बारे यदि कांग्रेसी मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के शासन काल में सोम डिस्टलरी के बारे में प्रस्तुत एक याचिका का प्रतिवेदन देते हुए याचिका समिति ने अपने तीसवां प्रतिवेदन (भाग-दो) बेतवा नदी में प्रदूषण संबंधी फरवरी-मार्च 1997 सत्र में प्रस्तुत याचिका क्रमांक 2644 जो कि एक मई 1998 को विधानसभा में प्रस्तुत की गई थी। उक्त समिति ने अपने प्रतिवेदन में प्रदूषण मंडल के अध्यक्ष से लेकर छोटे कर्मचारी तक जो टिप्पणी थी लगता है कि वह टिप्पणी का एक-एक शद आज भी प्रदूषण मंडल बोर्ड के अध्यक्ष से लेकर निचले स्तर तक के कर्मचारी पर लागू हो रही है। समिति ने अपने निष्कर्ष में बोर्ड के बारे में कहा था प्रदूषण निर्माण मंडल के शीर्ष स्थल से निचले स्तर तक की जो भूमिका है वह निश्चत ही दुर्भाग्य पूर्ण और उदासीनता यह दर्शाती है। मंडल अध्यक्ष जैसे जिम्मेदार व्यक्ति जब समिति के समक्ष प्रोसीक्यूशन की कार्रवाई संबंधी बात कहकर जाएं और उसका पालन न करें। तो निचले अमले से अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती। सोम डिस्टलरी के बेतवा प्रदूषण के संबंध में समिति ने जो निष्कर्ष राज्य प्रदूषण मंडल के बारे में दिए थे। इससे यह साबित होता है कि प्रदूषण मंडल प्रदेश की जनता को जहर पीने पर मजबूर कर रहा हैं। क्योंकि उद्योगों से सांठ-गांठ करके राज्य की पवित्र नदियां प्रदूषित तो हो रही हैं तो वहीं राज्य में स्थापित उद्योगों से निकलने वाली हवा और पानी जहर घोल रही हैं। राज्य में स्थापित एक दूसरे के उद्योग के बार में राज्य प्रदूषण मंडल की जो भूमिका रही वहीं संदेह के घेरे में हैं। आज राजधानी में स्थित यूनियन कार्बाइट के जहरीले कचरे को नष्ट करने के लिए राज्य सरकार से लेकर केन्द्र सरकार भी चिंतित है, लेकिन राज्य की पीथमपुर में स्थापित रामकी उद्योग जिसका काम प्रदेश के उद्योगों से निकलने वाले कचरों को नष्ट करने के लिए स्थापित की गई हैं। उक्त कंपनी को राज्य शासन के आदेश द्वारा प्रदेश के कई उद्योगों से लाखों रूपए अग्रिम भुगतान जहरीले कचरे को नष्ट कराने के लिए कराया गया है। प्रदेश में ऐसी कंपनी होने के बावजूद यूनियन कार्बाइट का कचरा जर्मन में नष्ट कराने की प्रक्रिया चले तो फिर उक्त कंपनी का राज्य में औचित्य क्या? हालांकि इस कंपनी के स्थल चयन को लेकर जो बोर्ड ने हेराफेरी की वह भी जांच का विषय हैं। कुल मिलाकर ऐसे कई मामले है जिनमें राज्य प्रदूषण मंडल बोर्ड के अध्यक्ष से लेकर निचले स्तर तक के कर्मचारियों की कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़े करते हैं।
राज्य सरकार द्वारा विकास के नाम पर प्रदेश में उद्योगों की स्थापना करने की भरपूर कोशिश की जा रही है, लेकिन इसके बावजूद भी यह उद्योग अपने आसपास के रहवासियों के लिए प्रदूषण फैलाने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। कार्रवाई के नाम पर प्रदूषण मंडल सिवाय नोटिसी कार्रवाई के अलावा कोई ठोस कार्रवाई नहीं करता है। क्योंकि इसी तरह के नोटिस मिलने के बाद उद्योगपति प्रदूषण मंडल के अधिकारियों से सांठ-गांठ कर लेते हैं? मामला कुछ भी हो लेकिन प्रदूषण मंडल बोर्ड पर प्रतिवर्ष जनता की कमाई का करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद भी नतीजा शून्य ही नजर आता है। तभी तो प्रदेश के उद्योगों द्वारा किया जा रहा दूषित जल व वायु का उत्सर्जन रुकने का नाम नहीं ले रहा हैं। हवा व पानी को प्रदूषित करने में भोपाल के उद्योगों की संख्या सबसे ज्यादा है। वर्ष 2011-12 में भोपाल क्षेत्र के करीब 39 उद्योगों से जल प्रदूषण तथा 12 से वायु प्रदूषण मानक से अधिक होना पाया गया है।
इंदौर जैसे उद्योगिक क्षेत्र में मानक से अधिक उगलने वाले जल व वायु प्रदूषक उद्योगों की संख्या भोपाल, जबलपुर, धार व उज्जैन से कम हैं। भोपाल क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले मंडीदीप में जल व वायु प्रदूषण की हालत काफी खराब है। मंडीदीप की 16 औद्योगिक इकाइयां जल प्रदूषक तथा 8 इकाइयां वायु प्रदूषक मानक से अधिक उगल रही हैं।
आरटीआई में हुआ खुलासा:- प्रयत्न संस्था द्वारा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारियों में जो तथ्य सामने आए हैं। उसके अनुसार प्रदेश में करीब 248 उद्योग ऐसे हैं जो जल व वायु को प्रदूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। प्रदेश में करीब 194 उद्योगों द्वारा छोड़े जा रहे जल में प्रदूषक की मात्रा मानक से अधिक मिली है। वहीं लगभग 54 उद्योग ऐसे हैं जिनमें वायु प्रदूषक की मात्रा मानक से अधिक निकलना पायी गई है।
बंद हो चुके हैं कई उद्योग:- हालांकि खतरनाक कचरे के प्रबंधन में लापरवाही बरतने के चलते प्रदेश के कई उद्योगों में ताला लग चुका है। इन उद्योगों को खतरनाक अपशिष्ट नियम 2008 की उपेक्षा व सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों का पालन नहीं करने का दोषी पाया गया था। एमपीपीसीबी ने अदालम में विचाराधीन अवधि तक 144 उद्योगों को बंद कर दिया, लेकिन इनमें से 109 को बाद में खतनाक अपशिष्ट कचरा प्रबंधन के लिए उचित कार्रवाई करने पर संचालन की अनुमति दे दी। हालांकि अभी भी 35 उद्योगों में ताला जड़ा हुआ है।
राज्य प्रदूषण मंडल बोर्ड की लापरवाही और उद्योगपतियों के साथ सांठ-गांठ के चलते राज्य के चार शहर ऐसे है जिनमें सबसे ज्यादा प्रदूषण है।
वह जिले है इंदौर, देवास, सिंगरौली, पीथमपुर, लेकिन मजे की बात यह है कि इन सब सर्वाधिक जिलों की जानकारी राज्य के प्रदूषण मंडल बोर्ड के अध्यक्ष डा. एनपी शुक्ला को भी नहीं है। ऐसी स्थिति में जब जिस बोर्ड को प्रदेश में प्रदूषण मंडल को प्रदूषण नियंत्रण करने की जिम्मेदारी हो और उसके मुखिया को राज्य के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों की जानकारी भर न हो। तो ऐसे में राज्य में प्रदूषण फैलाने वाले इन उद्योगों जिनके माध्यम से राज्य की जल और वायु को प्रदूषित किया जा रहा हो उसकी जानकारी उनको नहीं होगी। क्योंकि उन्हें अक्टूबर में इस पद से मुक्त होना है और ऐसे में वह अपने भविष्य की चिंता करें या फिर प्रदेश प्रदूषण झेल रही जनता की।
- अवधेश पुरोहित
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Monday, January 14, 2013
प्रदूषण मंडल की लापरवाही से प्रदेश की हवा-पानी में घोला जा रहा जहर
क्या दिग्विजय सिंह की ज़ुबान सचमुच फिसल जाती है ?
मोकर्रम खान)
हाल ही में भोपाल के कुछ समाचार पत्रों में यह खबर छपी कि कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को कांग्रेस ने चुप रहने की नसीहत दी है. इस खबर को भोपाल के कुछ चुनिंदा अखबारों ने अलग अलग ढंग से नमक मिर्च लगा कर छापा. एक ने लिखा ‘’दिग्विजय के मुंह पर ताला’’, दूसरे ने लिखा ‘’दिग्विजय सिंह को पार्टी की चुप रहने की नसीहत’’, तीसरे ने लिखा ‘’दिग्गी को झटका’’ चौथे ने तो यह तक लिख दिया कि ‘’दिग्विजय सिंह हाशिये पर चले गये’’. कटु तथा कठोर सत्य यह है कि इनमें से अधिकतर समाचार पत्रों के संपादक/स्वामी दो दशक पहले तक मिडिल इनकम ग्रुप में आते थे और अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिये विज्ञापनों के जुगाड़ में रात दिन परिश्रम करते थे. कई तो उस समय मुख्यमंत्री रहे दिग्गी राजा के दरबार में अघोषित भाट (राजा के प्रशंशागीत गाने वाले प्रोफेशनल गायक) का भी कार्य करते थे. गायनोपरांत पुरस्कार स्वरूप आर्थिक सहायता के लिये गिड़गिड़ाते थे. कभी विज्ञापन, कभी अधिकारियों के ट्रांसफर या मलाईदार पद पर पोस्टिंग, कभी ठेके, कभी सप्लाई आर्डर्स. दिग्गी राजा लगातार 10 वर्ष तक मुख्य मंत्री रहे. इन लोगों ने जम कर चांदी काटी और मिडिल इनकम ग्रुप से सुपर हायर इनकम ग्रुप में पहुंच गये, अखबार के साथ साथ बड़े बड़े उद्योग धंधे भी चलाने लगे. नाजायज कमाई और कृतघ्नता एवं अवसरवादिता का चोली दामन का साथ होता है. दिग्विजय सिंह ने 2003 के मध्य प्रदेश विधान सभा चुनावों के दौरान यह प्रतिज्ञा कर ली कि यदि कांग्रेस मध्य प्रदेश में हारती है तो मैं 10 वर्ष तक सरकार में कोई पद नहीं लूंगा, इसलिये केंद्र में कांग्रेसनीत यू0पी0ए0 सरकार में मंत्री पद नहीं लिया. प्रशंशागीत गाने वाले पूर्णत: प्रोफेशनल होते हैं. यदि सामने वाले के वालेट में माल है तो गाते रहेंगे, नहीं तो उसका दामन छोड़, जिसकी अंटी में रुपये हैं उसके घर के सामने हारमोनियम तबला ले कर बैठ जायेंगे, वही हुआ. दिग्गी राजा के सन्यास की घोषणा का लाभ कुछ ऐसे लोगों को मिल गया जिनका कोई जनाधार ही नहीं था, उन्हें मलाईदार पद मिल गये. राजनीति में महत्वपूर्ण पद पाने तथा उसे बचाये रखने के लिये जनाधार बढ़ाते रहना आवश्यक होता है किंतु यदि किसी व्यक्ति को बिना जनाधार के ही लाटरी की रकम की तरह पद मिल जाये तो उसके दिमाग में महत्वाकांक्षायें सागर की लहरों की तरह हिलोरे मारने लगती हैं और वह हर उस इंसान का अस्तित्व समाप्त करने के प्रयास में लग जाता है जिसके पास जनाधार होता है क्योंकि उसका जनाधार, जनाधारविहीन व्यक्ति को हर समय मुंह चिढ़ाता तथा डराता रहता है. जनाधारविहीन व्यक्ति, जनाधार रखने वाले व्यक्ति से सीधे टकराने का साहस नहीं कर सकता क्योंकि राजनीति के अखाड़े में जनबल के बिना मल्लयुद्ध संभव ही नहीं है. ऐसे में अनुचित आर्थिक लाभ के लिये मुंह फाड़े बैठे कुछ मीडिया हाउस जो पीत पत्रकारिता के माध्यम से किसी की इमेज बनाने या गिराने का बाकायदा ठेका लेते हैं, ऐसे लोगों का साथ देने पहुंच जाते हैं. राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के समर में यदि जातिवाद का तड़का भी लग जाय तो युद्ध की तस्वीर ही बदल जाती है, करेला, ऊपर से नीम चढ़ा वाली स्थिति बन जाती है. प्रतिद्वंदिता तथा सौतिया डाह की भावना के कारण कई बार एक ही नाव के सवार इस हद तक लड़ बैठते हैं कि नाव पलट कर डूब जाने का ख़तरा पैदा हो जाता है. जिसने नाव बनाने तथा उसके मेंटेनेंस में अपना जान-माल लगाया है उसे तो दर्द होगा और वह भरसक प्रयास करेगा कि नाव डूबने न पाये भले ही उसे थोड़ा अपमान सहन करना पड़े क्योंकि उसे मालूम है कि नदी पार करने का एकमात्र साधन यह नाव ही है. यदि यह डूब गई तो पूरे परिवार का बंटाधार हो जायगा, किंतु जो व्यक्ति फ्री पास द्वारा नाव में सफर कर रहा है, उसे क्यों चिंता होगी, नाव कल डूबती है तो आज डूब जाये, अपन तो दूसरी नाव में जुगाड़ बैठा लेंगे.
अभी दिग्विजय सिंह के जिन बयानों के आधार पर कुछ मीडिया हाउस दिग्विजय सिंह के राजनीतिक वनवास का दु:स्वप्न देख रहे हैं, उनमें वास्तव में कोई दम ही नहीं है. मीडिया के अनुसार, दिग्विजय सिंह ने यह बयान दिया कि ममता बनर्जी राजनीति में कच्ची हैं और अपने फैसलों को ले कर डांवाडोल स्थिति में रहती हैं. ममता बार बार कांग्रेस के धैर्य की परीक्षा न लें. इस पर कांग्रेस ने बयान जारी किया कि दिग्विजय सिंह पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ता नहीं हैं. दिग्विजय सिंह ने भी जवाब दे दिया कि मैं ने कब कहा कि मैं पार्टी का आधिकारिक प्रवक्ता हूं. सच्चाई यह है कि राजनीति के खेल निराले होते हैं. कई घटनायें प्रायोजित होती हैं. ममता बनजीं की रोज रोज की ब्लैकमेलिंग से कांग्रेस त्रस्त है, यह बात जग-जाहिर है. केवल सरकार को स्थिर रखने के लिये कांग्रेस ममता से सीधे पंगा नहीं ले रही है इसलिये पार्टी की भावना तथा अप्रत्यक्ष चेतावनी दिग्विजय सिंह के उक्त बयान के माध्यम से ममता दीदी तथा देश की जनता तक पहुंचा दी गई. इस चेतावनी का स्पष्ट प्रभाव भी देश की जनता ने देखा, ममता के तेवर नरम पड़ गये. किंतु इस घटना को ममता के सार्वजनिक अपमान के रूप में न ले लिया जाय इसलिये पार्टी ने इस बयान से अपने आप को अलग प्रदर्शित करने का प्रयास किया. यदि कांग्रेस इस बयान को पार्टी के अधिकृत बयान के रूप में स्वीकार कर लेती तो ममता तथा कांग्रेस दोनों के लिये गठबंधन बनाये रखना दुष्कर कार्य होता जो यूपीए सरकार की हेल्थ पर बुरा प्रभाव डालता. इसलिये यह रास्ता अपनाया गया जिससे सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी. किंतु धन्य हैं भोपाल के स्वयंभू मीडिया सम्राट जिन्होंने अपने आपको इतना शक्तिशाली समझ लिया कि दिग्गी राजा जैसे चतुर क्रिकेटर को भी क्लीन बोल्ड करने का ख्व़ाब देखने लगे. मज़े की बात यह है कि दिग्विजय सिंह के बयान से पार्टी ने किनारा कर लिया इस साधारण समाचार को केवल भोपाल के कुछ समाचार पत्रों ने इतना ज्यादा उछाला और अपने अपने ढंग से इसका विश्लेषण कर के जनता के सामने तोड़ मरोड़ कर पेश किया, जबकि यह एक अति साधारण घटना थी जिसे महत्व देने की आवश्यकता ही नहीं थी.
भोपाल के एक मीडिया हाउस का यह कहना है कि दिग्विजय सिंह की ज़ुबान फिसल जाती है, कभी भी कहीं भी कुछ भी बोल देते हैं, कभी बाबा रामदेव के विरुद्ध, कभी अन्ना हजारे के विरुद्ध, कभी किसी राजनेता के विरुद्ध. बाबा रामदेव एपीसोड में इस मीडिया हाउस की वेब साइट पर दिग्विजय सिंह के बयानों को खूब उछाला गया, कुछ लोगों ने इन बयानों पर अश्लील टिप्पणियां कीं, कई ने तो गंदी गालियां भी लिखीं. वेब साइट वालों ने इन अश्लील टिप्पणियों तथा गंदी गालियों को बगैर किसी काट छांट के ज्यों का त्यों प्रकाशित कर दिया. कम से कम अपनी इमेज का तो ख्याल किया होता किंतु वह भी नहीं किया. ख़ैर, बात चल रही है दिग्विजय सिंह की ज़ुबान फिसलने की, तो सच्चाई यह है कि दिग्विजय सिंह राजनीति के चाणक्य हैं. दो बार लगातार मध्य प्रदेश जैसे विशाल राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, आज भी कई बड़े राजनेताओं के गुरु हैं. उनकी ज़ुबान फिसलने का प्रश्न ही नहीं उठता. वे जो भी बोलते हैं एक सोची समझी रणनीति के तहत बोलते हैं. उनकी रणनीति के कांग्रेस के धुरंधर नेता भी कायल हैं. जब बाबा रामदेव योग छोड़ राजनीति के भोग में लीन होने के प्रयास करने लगे तब दिग्विजय ने उन्हें व्यापारी कहा, कुछ लोगों को बहुत बुरा लगा किंतु बाबा ने तो स्वयं स्वीकार किया कि उनका वार्षिक टर्न ओवर कई सौ करोड़ है. बाबा रामदेव की 22 राज्यों में 152 दुकानें तथा 50 अस्पताल हैं, 236 प्रोडक्ट्स तथा 32 पैकेज हैं. इसके अलावा 166 आडियो तथा वीडियो कैसेट्स हैं. इन सबसे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर करोड़ों रुपये का व्यापार प्रति वर्ष होता है, फिर बुरा मानने की क्या बात है. दिग्विजय सिंह ने अन्ना हजारे के संबंध में कुछ हल्की फुल्की टिप्पणी कर दी तो लोग इसमें भी कूदने लगे किंतु क्या अन्ना हजारे तथा उनकी टीम के सभी सदस्य इतने बड़े संत हैं कि उनके अंदर कोई दोष हो ही नहीं सकता. ममता बनर्जी बार बार बखेड़ा खड़ा करती हैं, इसी बहाने डील के प्रयास भी करती हैं. अगर दिग्विजय सिंह ने यह कह दिया कि ममता कांग्रेस के धैर्य की बार बार परीक्षा न लें तो क्या गलत कह दिया. यदि दिग्विजय सिंह में राजनीतिक परिपक्वता का अभाव होता और वे कुछ भी अंड बंड बोलते होते तो अभी तक अखिल भारतीय कांग्रेस के महासचिव जैसे महत्वपूर्ण पद पर बने न रह पाते. जो लोग यह भ्रम पाले हुये हैं कि दिग्विजय सिंह की जु़बान कभी भी कहीं भी फिसल जाती है जिसके कारण दिग्विजय सिंह कभी भी राजनीतिक वनवास में भेजे जा सकते हैं वे वास्तव में मृग-मरीचिका में भटक रहे हैं. ऐसे लोगों को चाहिये कि इस भ्रम की स्थिति से तत्काल बाहर आ जायें वर्ना दिग्विजय सिंह के 10 वर्षीय सन्यास की अवधि पूर्ण होने में थोड़ा ही समय बचा है.
मोकर्रम खान, वरिष्ठ पत्रकार/राजनीतिक विश्लेषक
पूर्व निजी सचिव, केंद्रीय शहरी विकास राज्य मंत्री.
मोबाइल 9827079845, 9039879753
e-mail : unsoldjournalism@gmail.com
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यह न्याय है कि जादू-टोना?
यह न्याय है कि जादू-टोना?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने राहुल गांधी के बारे में जो बयान किया है, वह मीडिया का ध्यान खींच रहा है लेकिन उन्होंने भारत की न्याय-व्यवस्था पर जो नया सुझाव दिया है, वह हाशिए में चला गया है। उन्होंने कहा है कि वादियों और प्रतिवादियों को अदालतों के फैसले उनकी भाषा में उपलब्ध करवाए जाएं। ऐसी समझदारी की बात इसके पहले किसी कानून मंत्री ने शायद कभी नहीं कही। किसी प्रधानमंत्री, किसी कानून मंत्री या किसी राजनेता को यह बात अभी तक सूझी क्यों नहीं?
कारण स्पष्ट है। दो सौ साल की गुलामी ने भारत के दिमाग को ही ठस्स कर दिया है। हम यह कल्पना ही नहीं करते कि हमारा कानून हमारी भाषा में बन सकता है। अदालतों की बहस और फैसले अपनी भाषा में तभी होंगे, जबकि कानून अपनी भाषाओं में बनेंगे। खुर्शीद ने यह तो कह दिया कि फैसले स्वभाषाओं में उपलब्ध करवाए जाएं लेकिन यह नहीं कहा कि वे स्वभाषाओं में ही लिखे जाएं। वे होंगे तो अंग्रेजी में ही लेकिन खुर्शीद की बात मान ली जाए तो उनके अनुवाद कई भाषाओं में हो जाएंगे। सरकारी अनुवाद की लीला से कौन परिचित नहीं है? मक्खी पर मक्खी बिठाने में निष्णात हमारे बाबू उन अंग्रेजी फैसले का कचूमर हिंदी तथा अन्य भाषाओं में कैसा निकालेंगे, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है। मूल अंग्रेजी फैसलों और अनुवाद से उठी समस्याओं को निपटाने के लिए नए मुकदमे दायर किए जाएंगे। भारत के न्यायालय पागलखानों में तब्दील हो जाएंगे। लोगों को न्याय सुलभ करवाना तो दूर रहा, वे अनुवाद की गुत्थियों में उलझ जाएंगे।
इसका मतलब यह नहीं कि खुर्शीद का सुझाव निरर्थक है। एक अर्थ में वह क्रांतिकारी है। उन्होंने आम आदमी की तकलीफ को समझा तो सही। वादी और प्रतिवादी को पहले तो यह ही ठीक से समझ में नहीं आता कि अदालत में हो क्या रहा है। उनके वकील आपस में क्या गिटपिट कर रहे हैं। फिर जो फैसला अंग्रेजी में आता है, वह भी उसकी समझ के परे होता है। वह जादू-टोने की तरह हो जाता है। उसका वकील उसे जो सार-संक्षेप समझा देता है, उससे उसे संतोष करना पड़ता है। कई लोगों को उम्र-कैद काट देने के बाद पता चलता है कि उनके वकील ने जज को वह मुख्य तर्क समझाया ही नहीं, जो उसे दोषमुक्त कर सकता था। सारा कानून, वकीली बहस और फैसले अंग्रेजी में होने के कारण वादी और प्रतिवादी अदालत में अपनी बात कहने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते। इसका अर्थ यह नहीं कि फैसले अंग्रेजी में होते हैं तो किसी को न्याय मिलता ही नहीं। न्याय मिलता तो है लेकिन जिसको न्याय मिलता है, वह इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं होता। यह मूल मानव अधिकार का पूर्ण उल्लंघन है। यह लोकतंत्र का भी मजाक है। जो कानून और न्याय-व्यवस्था लोक की समझ के परे है, उसे लोकतांत्रिक कैसे कहा जाए?
इसीलिए खुर्शीद के सुझाव में से लोकतंत्र की सुगंध आती है लेकिन यह सुगंध इत्र की नहीं, परफ्यूम की है। इस सुंगध को गहरी और सुदीर्घ बनाने के लिए यह जरूरी है कि देश के सारे कानून मूल रूप से हिंदी में बनें। समस्त भाषाओं में मौलिक कानून आगे जाकर बन सकते हैं। उनका अनुवाद हिंदी से अन्य भारतीय भाषाओं में हो सकता है। अब यहां प्रश्न किया जा सकता है कि यदि आप अंग्रेजी कानून के अनुवाद रद्द करते हैं तो हिंदी कानून के अनुवाद को मान्य कैसे करते हैं? इसका उत्तर सरल है। पहला, समस्त भारतीय भाषाओं की भाव-भूमि एक ही है। उनकी मूल धारणाएं, मुहावरें, कहावतें, शैलियां लगभग एक जैसी हैं। उनके परस्पर अनुवाद में विभ्रम की गुंजाइश अंग्रेजी के मुकाबले बहुत कम है। दूसरा, उन्हें संस्कृत, अरबी, फारसी जैसी प्राचीन भाषाओं की शब्द-राशि सहज उपलब्ध है। तीसरा, अंग्रेजी के मुकाबले इन भाषाओं के अनुवादकों की संख्या काफी बड़ी होगी। चैथा, अपनी भाषा में कानून बनने के कारण अंग्रेजी कानून की गुलामी से भी भारत तत्काल मुक्त हो जाएगा। भाषा के साथ-साथ संस्कार, परंपराएं, अवधारणाएं, प्रतिक्रियाएं और चित्तवृत्तियां भी ढलती जाती हैं। स्वभाषा में कानून बनेगा तो न्याय के बारे में हमारा सोच स्वदेशी और मौलिक होगा।
यदि कानून अंग्रेजी में बनता है तो बहस और फैसले भी अंग्रेजी में ही होते हैं। इसका नतीजा तो यह है कि मुकदमे द्रौपदी के चीर की तरह लंबे होते चले जाते हैं। देश में लगभग तीन करोड़ मुकदमे अधर में लटके हुए हैं। कई-कई तो 30-30 बरसों से लटके हुए हैं। अन्य कारणों के अलावा इसका एक बड़ा कारण अंग्रेजी भी है। विदेशी भाषा को समझना, बोलना और लिखना अपनी भाषा के मुकाबले कठिन होता है। इसीलिए अंग्रेज के पूर्व गुलाम देशों के अलावा दुनिया के लगभग सभी देशों में न्याय स्वभाषा में दिया जाता है। जॉन स्टुअर्ट मिल ने क्या खूब कहा है, ‘देर से दिया गया न्याय, वास्तव में अन्याय है।’ इस देरी का कारण अंग्रेजी है। अंग्रेजी के कारण हमारी न्याय-व्यवस्था अन्यायकारी बन गई है।
यदि न्याय स्वभाषा में मिले तो उसका अध्ययन-अध्यापन भी स्वभाषाओं में होगा। वकील या जज बनना अधिक आसान होगा। अभी तो उनकी सारी ताकत अंग्रेजी के बाल की खाल उखाड़ने में ही नष्ट हो जाती है। देश में हजारों नए जजों की जरूरत है। इसकी पूर्ति में अंग्रेजी सबसे बड़ा रोड़ा है। यह रोड़ा डॉक्टरी, इंजीनियरी, वैज्ञानिकी आदि सभी मार्गों में अड़ा हुआ है। यदि भारत में कानून और चिकित्सा की पढ़ाई स्वभाषाओं में होती रहती तो भारत के वकील और डॉक्टर दुनिया में सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होते और उनकी संख्या भी प्रचुर होती। अंग्रेजी की अनिवार्य पढ़ाई ने भारतीय न्याय को किताबी ज्ञान में कैद कर दिया है। न्याय तो मूलतः उचित और अनुचित के सहज-संज्ञान को कहते हैं। कानूनी ग्रंथ, पुराने फैसले, नजीर वगैरह न्याय करने में सहायक जरूर होते हैं लेकिन यह सहायता हमारे न्याय पर काफी भारी पड़ती है, क्योंकि वह अंग्रेजी में होती है। यह ऐसा ही है, जैसे किसी श्रेष्ठ गायक पर उसके तबले और हारमोनियमवाले भारी पड़ जाएं। यदि कानून का किताबी ज्ञान स्वभाषाओं में हो तो वह न्याय-प्रक्रिया की सहज-संगति करेगा। शिक्षा में यह मूलभूत क्रांतिकारी परिवर्तन करना हमारे वर्तमान राजनीतिज्ञों के बस की बात नहीं है। इसीलिए फिलहाल फैसलों के अनुवाद का ही स्वागत है।
(लेखक भारतीय भाषा सम्मेलन एवं भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)
टैक्नोसिटी- भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी परिदृश्य में एक प्रमुख केन्द्र
जैकब अब्राहम
तिरुअनंतपुरम जिले के पल्लिप्पुरम क्षेत्र में उद्योग के बडे ब्रांडों द्वारा उत्पाद केन्द्रों को स्थापित करने की संभावनाओँ, प्रशिक्षण परिसरों, विकासात्मक संस्थानों और विविध अन्य पहल की शुरुआत के साथ भारत के सूचना प्रौद्योगिकी परिदृश्य को तैयार करने में एक प्रमुख स्थल यानि तिरुअनंतपुरम स्थित टैक्नोसिटी बहुत तेजी से वैश्विक गतिविधियों का केन्द्र बन रहा है।
टैक्नोपार्क के प्रमुख कार्यकारी अधिकारी ने बताया कि- "निवेश क्षमता और संभावनाओं के संबंध में दुनिया भर से मांगी जा रही जानकारियों के साथ हम अपने नियत समय के अनुसार आगे बढ़ रहे हैं।" वरिष्ठ प्रबंधक व्यापार विकास के अनुसार-"टीम टैक्नोपार्क के द्वारा संचालित और पोषित टैक्नोसिटी जब अपनी वास्तविक शक्ल ग्रहण करेगा तो यह राज्य और राष्ट्र दोनों के लिए बेशकीमती होगा।"
तैयार मास्टर प्लान और संभावित निवेशकों के लिए उन्नत अवसंरचना सुविधा मुहैया कराने के साथ टैक्नोसिटी का कार्य वर्तमान में प्रगति पर है। पूरी तरह से तैयार हो जाने के बाद यह 432 एकड में फैला एक समेकित सूचना प्रौद्योगिकी टाउनशिप होगा जिसमें न केवल आईटी/आईटीईएस फर्मों के लिए स्थान होगा बल्कि आवासीय, वाणिज्यिक, सेवा, चिकित्सा और शिक्षण सुविधाएं भी उपलब्ध होगी। यह परियोजना स्व- आश्रित सैटेलाइट सिटी के रुप में होगी जिसके तहत तिरुअनंतपुरम शहर के संसाधनों और अवसंरचना का दोहन नहीं किया जाएगा।
एम्बेडेड सॉफ्टवेयर विकास, उद्यम संसाधन नियोजन (ईआरपी), प्रक्रिया नियंत्रण सॉफ्टवेयर डिजाइन, इंजीनियरिंग और कंप्यूटर आधारित डिजायन सॉफ्टवेयर विकास, आईटी समर्थित सेवाएं (आईटीईएस), प्रक्रिया पुनः आभियांत्रिकी, एनिमेशन और ई-व्यापार जैसी विविध प्रकार की कंपनिया टैक्नोसिटी की इकाइयों में शामिल होगी। घरेलू कंपनियों के साथ ही बहुराष्ट्रीय संगठनों की सहायक कंपनियों को भी फर्म द्वारा शामिल किया जाएगा।
टैक्नोसिटी में आईटी/आईटीईएस और इलेक्ट्रॉनिक कंपनियों के क्रियान्वयन के लिए आवश्यक सभी अवसंरचना और समर्थन सुविधाओं के साथ ही कर्मचारियों के लिए विश्व स्तरीय सुविधाएं भी होंगी। इसके अलावा टैक्नोपार्क जैसी टैक्नोसिटी व्यापार संवर्धन सुविधाओं को भी मुहैया कराएंगी।
टैक्नोसिटी में किराए पर स्थान लेने वाले संगठनों के लिए बहु-इमारत के साथ लगभग 25 मिलियन वर्ग फीट बिल्ट-अप स्थान है। इसे एक समेकित टाउनशिप के रुप में विकसित किया जा रहा है और इसमें आवासीय स्थान, रीटेल सुविधाएं, मल्टीप्लेक्स, अस्पतालों और स्कूलों की सुविधाएं भी शामिल है। इससे टैक्नोसिटी में कंपनियों के कर्मचारियों को कार्यालय से पैदल दूरी पर ही विश्वस्तरीय सुविधाओं को प्राप्त करने की सरलता होगी।
तिरुअनंतपुरम राष्ट्रीय इंटरनेट प्रणाली से जुडा है और परिसर में फाइबर ऑप्टिक लाइनों के द्वारा इसमें रिलायंस इंफोकॉम, भारती एयरटेल, विदेश संचार निगम, एशियानेट डाटालाईन जैसे बैंडविड्थ प्रदाताओं की सेवाएं शामिल हैं।
टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज लिमिटेड (टीसीएस) एशिया के सबसे बडे प्रशिक्षण केन्द्र को स्थापित करने की प्रक्रिया में है । उन्हें आवंटित 82 एकड़ की ज़मीन में एक समय में 16,000 कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया जा सकता है और उनके रहने की व्यवस्था की व्यवस्था की जा सकती है। टीसीएस पहले ही टैक्नोपार्क फेज-I से अपने ग्लोबल लर्निंग सेंटर का संचालन कर रहा है। लगभग 10,000 कर्मचारियों के लिए सॉफ्टवेयर विकास केन्द्र का निर्माण टैक्नोपार्क फेज-I में किया जा रहा है।
इंफोसिस को आवंटित 50 एकड़ एसईजेड भूमि में इंफोसिस द्वारा उनके अगले विकास केन्द्र की स्थापना की प्रक्रिया चल रही है। फेज-I और फेज-II से इंफोसिस पहले ही संचालन कर रहा है। तीसरा सॉफ्टवेयर विकास ब्लॉक और साथ ही बहुस्तरीय कार पार्किंग की इमारत के निर्माण का कार्य फेज-II के परिसर में चल रहा है।
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी और प्रबंधन संस्थान – केरल (आईआईआईटीएम-के) और एशियन स्कूल ऑफ बिजनेस (एएसबी) जैसे कम से कम दो महत्वपूर्ण शैक्षिक संस्थान और अनुसंधान संस्थान टैक्नोसिटी में होंगे। इनमें से एशियन स्कूल ऑफ बिजनेस अपना संचालन शुरु कर चुकी है और आईआईआईटीएम-के अपने 10 एकड ज़मीन में संचालन शुरु करने की प्रक्रिया में है। टैक्नोपार्क टैक्नोसिटी में 50 एकड विशेष आर्थिक क्षेत्र का विकास कर रही है।
केरल सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के तहत एक स्वायत्त संस्था इलेक्ट्रॉनिक्स टैक्नॉलॉजी पार्क केरल के तत्वाधान में टैक्नोपार्क की स्थापना की गई। इसमें 240 से भी अधिक कंपनिया और 32000 से भी अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। अवसंरचना का निर्माण तथा साथ ही उच्च प्रौद्योगिकी कंपनियों के विकास के लिए आवश्यक समर्थन मुहैया कराना टैक्नोपार्क का उद्देश्य था।
अपने आकार और कर्मचारियों की क्षमता दोनों के हिसाब से पार्क निरंतर प्रगति कर रहा है। शुरुआत में केवल पार्क सेंटर, पंपा और पेरियार इमारत ही थीं। टैक्नोपार्क की कुल भूमि लगभग 771.54 एकड की है। टैक्नोपार्क के फेज एक, फेज दो और फेज तीन के लिए लगभग 326.54 की भूमि है और बाकी स्थान टैक्नोसिटी की लिए शेष भूमि के रुप में है। टैक्नोपार्क में समय समय पर नई इमारतों जैसे नीला, गायत्री और भवनी को जोडा गया है। फरवरी 2007 में 850,000 वर्ग फीट के तेजस्विनी के उद्घाटन के साथ ही यह भारत का सबसे बडा आईटी पार्क बन गया। केरल में यह रोजगार का सबसे बडा स्रोत बन चुका है जिसमें 32000 से भी अधिक लोग 240 कंपनियों में प्रत्यक्ष रुप से कार्यरत हैं। इसके ज़रिए 2010-11 के दौरान 1977.32 करोड़ रुपए के निर्यात अर्जन के साथ 2000 करोड़ रुपए का सकल कारोबर हुआ।
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मध्य प्रदेश की पुलिस सिंघम है या दबंग ?
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(मोकर्रम खान)
हाल ही में इंदौर में एक युवक को कुछ गुंडों ने दिन दहाड़े, सरे राह चाकू से गोद डाला. युवक का अपराध यह था कि उसने उन गुंडों को अपनी बहन से छेड़खानी करने से मना किया था. मीडिया के अनुसार घटना के बाद लगभग 45 मिनट का समय जिसमें उसकी जान बचाई जा सकती थी, पुलिस की कागजी कार्यवाही में बीत गया, परिणामस्वरूप, उस युवक की जीवन लीला समाप्त हो गई. कई निजी टीवी चैनलों ने इस समाचार का वीडियो दिखा दिखा कर मामले को गरमाने का भरसक प्रयास किया किंतु पुलिस के उच्चाधिकारियों जिनमें एक महिला भी शामिल हैं, ने अपने अधीनस्थों
का जम कर बचाव किया. वैसे परिस्थितियों का तकाज़ा तो यह था कि पीडि़त परिवार को सांत्वना देने तथा जनाक्रोश कम करने के लिये दोषी पुलिस कर्मियों को कम से कम तत्काल प्रभाव ने निलंबित कर दिया जाता. ऐसा करने का अधिकार जिले के एसपी से ले कर मुख्यमंत्री तक सभी को प्राप्त है लेकिन किसी ने इस अधिकार का प्रयोग कर पीडि़त परिजनों के ज़ख्मों पर मलहम लगाने की आवश्यकता नहीं समझी. पुलिस के आला अधिकारियों ने अपने कर्मचारियों का बचाव खुल कर किया. गृह मंत्री ने जांच रिपोर्ट की प्रतीक्षा करने को कहा. सबसे मज़े की बात मुख्यमंत्री ने कही कि पुलिस सिंघम बने. सिंघम फिल्म एक ईमानदार पुलिस अधिकारी अजय देवगन की कहानी है परंतु सिंघम केवल एक फिल्म है जो मनोरंजन का साधन मात्र है, वास्तविकता से उसका दूर दूर तक वास्ता नहीं है.
रील लाइफ में सिंघम है किंतु रियल लाइफ में पुलिस दबंग की भूमिका में है, दबंग जो दादागिरी से सब कुछ प्राप्त कर सकता है. दबंग फिल्म में नायक सलमान खान थानेदार है. नायिका सोनाक्षी सिन्हा एक गरीब लड़की है जिसका इस संसार में एक गरीब शराबी पिता के अलावा और कोई नहीं है, थानेदार इस हकीकत से वाकिफ है इसलिये नायिका से प्रेम की पींगें बढ़ाने के लिये उसके इर्द गिर्द चक्कर लगाने की ज़हमत नहीं उठाता, न ही आई लव यू कहने की आवश्यकता समझता है, उसे सीधे आर्डर देता है, मुझसे शादी कर लो. नायिका अपनी विवशता बताती है कि मैं अपने शराबी और बीमार बाप को नहीं छोड़ सकती. थानेदार उससे किसी प्रकार का मान मनौवल नहीं करता बल्कि झगड़े की जड़ बाप को मानसिक प्रताड़ना देता है और नायिका से शादी करने के लिये दबाव बनाता है. गरीब बाप थानेदार का मुकाबला करने का साहस नहीं रखता इसलिये एक निश्चित तिथि को अपनी लड़की ब्याह कर ले जाने के लिये कहता है किंतु उस तिथि के आने के पहले ही आत्महत्या कर लेता है. बाप की
मौत पर नायिका आंसू बहाती रहती है, मोहल्ले की औरतें भी उसका दुख बांटने के लिये उसका अनुसरण कर रही होती हैं तभी थानेदार सलमान खान आता है, सभी को रोते देख कर उसके अंदर मानवीय
संवेदना नहीं जागती, वह नायिका का दुख कम करने के लिये प्रेम के दो शब्द भी नहीं बोलता बल्कि पहले से रो रही सभी महिलाओं को डांट कर भगा देता है और नायिका को रोने धोने की भी मोहलत नहीं देता, ले जा कर सीधे विवाह कर लेता है, विवाह के तत्काल बाद नायिका के साथ रहते हुये भी पर-नारियों के पीछे भागता है, नायिका उसे बार बार पकड़ कर वापस खींचती है. थानेदार न उसके दुख
की परवाह करता है न ही समाज की क्योंकि वह दबंग है, और दबंग भी साधारण नहीं, समस्त सुविधायेंयुक्त शासकी मान्यता प्राप्त दबंग, उसे किसी से डरने की क्या आवश्यकता है.
तो वास्तव में पुलिस दबंग ही है जिसे किसी का डर नहीं है और इंदौर पुलिस तो दबंगों से भी कई कदम आगे है. पिछले वर्ष एक प्रकरण प्रकाश में आया था, इंदौर में एक थानेदार ने एक किशोरी को जो रात 9 बजे अपने भाई को कोचिंग में छोड़ कर आ रही थी, रास्तें में रोक लिया और पूछताछ के लिये थाने ले जाने के बहाने एक घर में ले जा कर उसके अश्लील एमएमएस बनाये.
संयोगवश लड़की के परिजन राजनीति में अच्छी पकड़ रखते थे, उनके एक रिश्तेदार विधायक ने पूरे शासन तथा प्रशासन को हिला कर रख दिया तब जा कर उस थानेदार के विरुद्ध कुछ कार्यवाही हुई. इस
मामले के खुलासे के बाद एक अन्य युवती ने भी शिकायत की कि उक्त थानेदार ने उसके भी जबरन अश्लील एमएमएस बनाये थे और ब्लैकमेल किया था, यह लड़की भी प्रदेश की एक काबीना मंत्री की रिश्तेदार थी. पुलिस की दबंगई देखिये, मंत्री संतरी किसी की भी परवाह नहीं करते. राजनेता भी पुलिस की दबंगई के सामने बेबस नज़र आते हैं. थानेदार द्वारा लड़कियों के जबरन अश्लील एमएमएस बना कर उन्हें ब्लैकमेल करने के ये 2 मामले हाई प्रोफाइल होने के कारण प्रकाश में आ गये, ऐसे मामलों की वास्तविक संख्या का अनुमान लगाना कठिन है क्योंकि बदनामी तथा पुलिस की प्रताड़ना के डर से
अधिकांश लड़कियां सामने ही नहीं आती हैं. छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर की एक लड़की इंदौर में पढ़ती थी, उसकी हत्या हो गई. लड़की का बाप भागा भागा इंदौर पहुंचा और दोषियों के विरुद्ध कार्यवाही की मांग की किंतु पुलिस ने यह कह कर चलता कर दिया कि लड़की का चरित्र ठीक नहीं था. बाप ने छत्तीसगढ़ के भाजपाई राजनेताओं, मीडियाकर्मियों तथा अधिकारियों से सहायता की विनती
की, उन लोगों ने इंदौर पुलिस पर कार्यवाही हेतु दबाव डाला तो पुलिस ने मृतका के पिता को उल्टा चमकाया कि ज्यादा नेतागिरी मत करो. जब पुलिस इस प्रकार की दबंगई दिखायेगी तो गुंडों के हौसले बढ़ना स्वाभाविक है. एक लड़की अपने पिता के साथ दो पहिया वाहन पर जा रही थी. कुछ मनचलों ने लड़की का हांथ पकड़ कर खींच लिया. बाप बेटी दोनों ही नीचे गिर पड़े, बाप को मौत हो गई, बेटी गंभीर रूप से घायल हो गई.
पुलिस का काम है, अपराधियों के बीच दहशत पैदा करना ताकि वे आपराधिक घटनाओं को अंजाम दे कर आम जनता को प्रताडि़त न करें किंतु यदि पुलिस अपने अधिकारों का प्रयोग अपराधियों के विरुद्ध न
करे और उल्टे जनता को हतोत्साहित करे तो क्या होगा, प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है. बहन से छेड़खानी करने का विरोध करने पर युवक को सरे राह, दिन के प्रकाश में चाकू से गोद डालना फिर पुलिस कर्मियों द्वारा कागजी कार्यवाही में इतना विलंब करना कि इलाज में देरी की कारण युवक की मृत्यु हो जाये, इतने पर भी उच्चाधिकारियों द्वारा पुलिस कर्मियों का बचाव करना क्या यह स्पष्ट संदेश नहीं देता कि महिलाओं के विरुद्ध हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज़ उठाने का दुस्साहस कोई कभी भी न करे अन्यथा इस अपराध के लिये सीधे प्राण दंड ही मिलेगा. पुलिस में सिंघम देखना है तो सिनेमा हाल की टिकट लीजिये या इस फिल्म की सीडी ला कर घर पर देखिये और कल्पना लोक में विचरण कीजिये, चाहें तो अपने आप को भी सिंघम समझ सकते हैं और नायक होने के सुख का अनुभव कर सकते हैं किंतु याद रहे कि सिंघम केवल एक काल्पनिक कथा है, वास्तविकता नहीं. वास्तविकता तो सलमान खान की फिल्म दबंग है.
मोकर्रम खान, वरिष्ठ पत्रकार/राजनीतिक विश्लेषक
पूर्व निजी सचिव, केंद्रीय शहरी विकास राज्य मंत्री.
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कांग्रेस, कोयला और कालिख
अनिल सौमित्र
कांग्रेस के नेता भले ही कुछ भी कहें, उनके प्रवक्ता मीडिया में कुछ भी बोलें, वे चाहे कितनी ही सफाई क्यों न दें- एक बात तो पक्की है- कांग्रेस बदनाम हो गई है। कांग्रेस का नाम लेते ही, उसका नाम सुनते ही कोयला, कालिख, करप्सन, कलई, कलि, कालिमा, कलंक, कंटक, कुटिल, कपट, कपटी, कलह, कठोर, कलियुग, कलुष-कलुषा, कुख्यात, कलंदरी, कशमकश, कसाई, कसैला, कसूरवार, कारागाह, कायर आदि और ऐसे ही कई समानार्थी शब्दों की छवि बनती है। एक ऐसी पार्टी या संगठन जिसकी स्थापना जरूर एक अंग्रेज ने की थी, लेकिन अनेक वर्षों तक वह देशभक्तों और राष्ट्रवादियों के सेवा का माध्यम बनी। अंग्रेजों के जाने के बाद गांधीजी ने कांग्रेस को भंग करने का सुझाव दिया था। कुछ स्वार्थी नेताओं ने उनकी एक न सुनी। देशभक्त नेताओं की पुण्याई और सद्कर्मों का फल नेहरू जैसे कुछ स्वार्थी नेता खाना चाहते थे। इसलिए आजादी के बाद भी कांग्रेस का लाभ उठाया जाता रहा। तब न सही, लेकिन आज जो कांगे्रस को गांधी की राय न मानने का श्राप लग चुका है। वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष अपने नाम के आगे ‘गांधी’ जरूर लगाती हैं, लेकिन उनमें गांधी के व्यक्तित्व का अंशमात्र भी नहीं है। वे रंचमात्र भी गांधी के विचारों की उत्तराधिकारी नहीं हैं।
कांग्रेस जहां सरकार में वहां वह अंग्रेजों की सोच और नीति का अनुशरण कर रही है। जहां वह विपक्ष में है वह जनता और जनमानस से कोसों दूर है। गांधीजी का पूरा जीवन विदेशियों और विदेशपरस्ती से लड़ते हुए बीता। लेकिन सोनिया माइनो गांधी का संपूर्ण जीवन ही विदेशपरस्त है। कमोबेश यही कांग्रेस के नेताओं का भी है। जो नेता विदेशपरस्त या भ्रष्ट नहीं हैं वे दरकिनार कर दिए गए हैं, वे हाशिए पर हैं। कांग्रेस देश और देशवासियों की हालत से बेपरवाह है। उसे सिर्फ अपने और अपनों की परवाह है। कांग्रेस के अपने वे हैं जो या तो उनके सगे हैं, या देशी-विदेशी रिश्तेदार। कांग्रेस ने जैसे देशी लोगों को विदेशी नेतृत्व के भरोसे छोड़ दिया है, वैसे ही भारत के देशी बाजार को विदेशी कंपनियों और पूंजीपतियों के हाथों में सौंप दिया है। खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश हो या पेट्रो-उत्पादों (तेल) की कीमतें बढ़ाने का मामला कांग्रेस ने विपक्ष की एक न सुनी, अपने सहयोगी दलों को छोड़ देना मुनासिब समझा, देश की जनता को भले ही गुमराह करना पड़े, लेकिन वह अमेरिकापरस्ती नहीं छोड़ सकती। कांग्रेस को देश की जनता से बस सत्ता चाहिए। कैसे भी, किसी भी कीमत पर। एक बार सत्ता मिल जाये, जनता जाये भाड़ में। देश आर्थिक संकटों से घिरा हुआ है, किन्तु केन्द्र सरकार की फिजूलर्खी का आलम यह है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मंत्रियों ने 678 करोड़ उड़ा दिए। यह व्यय पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में 12 गुना अधिक है।
कांग्रेस के नेताओं को कोयले की कालिख, करप्सन की कलई और मंहगाई देने के कलंक की कोई परवाह नहीं। उसके नेता कलंदर हैं। उन्हें न तो कुख्यात होने का भय है और न ही कसूरवार होने का मलाल। जनता को मंहगाई से मार डालने पर उन्हें कोई कसाई कहे तो कहे। समस्याओं से मुंह चुराने पर विरोधी उन्हें कायर कहें तो कहें। वे अपनी कुटिलता नहीं छोड़ सकते।
कांग्रेसी बेशर्म भी हो गए हैं। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सुशील शिंदे ने इसका उदाहरण दे दिया। केन्द्र सरकार के तीसरे गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने सोच-समझकर बेतुका बयान दिया। उन्होंने कहा कि कोयले से हाथ काले हो जायें तो पानी से धोने पर फिर साफ हो जोते हैं। जनता जिस तरह बोफोर्स घोटाले को भूल गई, कोयला घोटाले को भी भूल जायेगी। जनता भूले, न भूले कांग्रेस जरूर भूल जाती है। जनता तो घोटाले नहीं, छठी का दूध भी याद दिला देती है। कांग्रेस को भी याद होना चाहिए, जनता ने 1984 में कांग्रेस को 400 से अधिक सीटें दी थी। लेकिन उसके बाद उसी जनता ने उसका ऐसा हश्र किया कि उसे आज तक पूर्ण बहुमत से मोहताज कर दिया। आवाम को यह भी याद नहीं है कि बीते कुछ वर्षों में कांग्रेस की सरकार ने लोक-लुभावन और लोक-कल्याणकारी कौन-से कदम उठाये। काफी समय से ऐसा ही हो रहा है कि जनता आह! आह! कर रही है, ये कराहने की आवाजें हैं। काश! कि कांग्रेस के लिए जनता वाह!वाह करती।
कांग्रेस का यही हाल मध्यप्रदेश में भी है। दिग्विजय सिंह ने अपने कार्यकाल में प्रदेश का ऐसा बंटाधार किया कि जनता ने उनके समेत कांग्रेस को प्रदेश से बेदखल कर दिया। यहां कांग्रेस कलह की शिकार है। मुद्दाविहीन है। कांग्रेस को विपक्ष में बैठे 10 वर्ष होने का आया। वह खामोश है। उसे सत्ता तो दिख रही है, लेकिन जनता के लिए संघर्ष का इरादा नहीं। गुटों और आंतरिक कुटिलता की शिकार कांग्रेस भाजपा की सरकार और संगठन की सक्रियता के आगे भीगी बिल्ली हो गई है। उसके पास न तो अपने कार्यकर्ताओं के सवालों का जवाब है और न ही केन्द्र सरकार के निर्णयों से हो रही जनता की तकलीफों का उपाए। कांग्रेस सत्ता और विपक्ष दोनों रूपों में पिट रही है। कांग्रसी नेताओं का खलनायकों का इतिहास पीछा नहीं छोड़ रहा है। वे राजे-रजवाड़ों और सामंत प्रवृति से बाहर नहीं आ पा रहे हैं। आमजन की आवाजों से कोसों दूर अपने ही कोलाहल में डूबे कांग्रेसी सत्ता के लिए मारी-मारी तो कर सकते हैं, लेकिन वे जनता का विश्वास नहीं जीत सकते। कांग्रेस जनता का विश्वास हार चुकी है। कांग्रेस के नेता आत्मविश्वास खो चुके हैं। जनता उनसे और वे जनता से दूरी बना चुकी है। यह खाई बड़ी है और बढ़ती ही जा रही है। कांग्रेस के लिए इस खाई को पाटना दूर की कौड़ी है।
कांग्रेस का आलाकमान तो कोयले की कालिख से कलंकित है। उसका प्रदेश नेतृत्व अपने रसूख और जायदाद को बचाने की जुगत में फ्रिकमंद है। प्रदेश की भाजपा सरकार के साथ कांग्रेस की धींगामुश्ती इसी फ्रि़क्र के कारण है। जनता के लिए अपनी फ्रिक्र को कांग्रेस बहुत पहले दफन कर चुकी है। इसी महीने खंडवा में हुई कार्यसमिति में भाजपा अध्यक्ष ने तीसरी बार सरकार बनाने के लिए तैयारी करने का आह्वान किया है। हरियाणा के सूरजकुंड में हुई भाजपा की राष्ट्रीय परिषद् भी निर्णायक सिद्ध हुई है। भाजपा ने केन्द्र में एनडीए के विस्तार का संकल्प लिया है और प्रदेश में तीसरी बार सरकार बनाने का नारा दिया है। भाजपा का नेतृत्व, नारा और कार्यकर्ता एक है। इस मामले में कांग्रेस अनेक है। भाजपा सक्रिय है, कांग्रेस निष्क्रिय। भाजपा कार्यकर्ता आत्मविश्वास से लबरेज, लेकिन कांग्रेस के कार्यकर्ता सशंकित और नेतृत्व की गुटबाजी के कारण कशमकश में। प्रदेश की जनता देश में परिवर्तन और और मध्यप्रदेश में निरन्तर होने की बाटजोह रही है।
(लेखक चरैवेति पत्रिका के संपादक और मीडिया एक्टीविस्ट हैं)
भोली भाली जनता के दग़ाबाज़ ब्वाय फ्रेंड अन्ना हजारे और बाबा रामदेव
(मोकर्रम खान)
पिछले 16 महीनों से देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने का दावा करने वाले अन्ना हजारे ने अचानक आंदोलन समाप्ति की घोषणा कर दी. इससे देश के कई हजार लोगों के दिल टूटे. कुछ बुद्धिजीवी अपनी समस्त बौद्धिक शक्ति का उपयोग कर इस विषय पर अनुसंधान कर रहे हैं कि अन्ना हजारे ने आखिर किन परिस्थितियों से विवश हो कर अपना आंदोलन अचानक समाप्त कर दिया और टीम भंग कर दी. लाखों लोगों ने अन्ना और उनकी टीम को अपना मसीहा मान लिया था. इंडिया अगेंस्ट करप्शन से लोगों ने यह मान लिया था कि देश से करप्शन की जल्दी ही फेयरवेल पार्टी होने वाली है. राष्ट्र को भ्रष्टाचार के दलदल से निकालने का दावा करने वाले इन स्वयंभू जन लोकपालों ने भ्रष्टाचार उन्मूलन हेतु अपने प्राणों की आहुति देने का वचन दिया था किंतु कुछ ही दिनों में इनका साहस जवाब दे गया. भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता के लिये यह गहरा आघात है. भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकने का दावा करने वाले इन तथा कथित मसीहाओं के पहले एक और मसीहा प्रगट हुये थे, बाबा रामदेव, जिन्होंने देश की जनता को इस रहस्य से अवगत कराया कि देश का 500 लाख करोड़ का काला धन विदेशों में जमा है, वे इस काले धन को स्वदेश वापस ला कर रहेंगे और जब इतना पैसा आ जायगा तो जनता को अगले 10 सालों तक कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा. बाबा ने जनता को ऐसा सपना दिखाया था जो आज तक किसी बड़े से बड़े राजनेता ने नहीं दिखाया था. लाखों लोग बाबा के समर्थन में खड़े हो गये. उनके काला धन विरोधी ज्ञापन पर लगभग 1 करोड़ लोगों ने हस्ताक्षर किये थे. बाबा ने उत्साह में आ कर घोषणा कर दी कि वे काला धन वापस लाने हेतु अपने प्राणों की बाजी लगा देंगे और दिल्ली के रामलीला मैदान में आमरण अनशन पर बैठ गये किंतु मृत्यु को अंगीकार करना तो बहुत दूर की बात है, पुलिस के घुसते ही मैदान से भाग खड़े हुये, जान बचाने के लिये महिला के वेश में भागे. अब काला धन के विरुद्ध यदा-कदा हल्का फुल्का बयान दे देते हैं, मात्र औपचारिकता निभाने के लिये. बाबा रामदेव तथा अन्ना हजारे ने जनता को खूब सब्ज बाग दिखाये, जनता ने भी उनसे बड़ी आशायें बांध लीं. बाबा रामदेव जहां भी जाते, उनके समर्थन में जन-सैलाब उमड़ पड़ता. अन्ना हजारे के समर्थन में हजारों लोगों ने देश भर में रैलियां और मार्च निकाले. दिल्ली जैसे महानगर में जहां की व्यस्ततम जीवन शैली में लोग अपने परिवार को भी ठीक से समय नहीं दे पाते, हजारों लोग अपना समर्थन देने के लिये जंतर मंतर पर एकत्र हुये और मौसम की परवाह किये बगैर डटे रहे किंतु अन्ना ने अचानक आंदोलन ही समाप्त कर दिया. जनता अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रही है. बाबा रामदेव तथा अन्ना हजारे देश की भोली भाली जनता के ऐसे ब्वायफ्रेंड साबित हुये जो सीधी सादी लड़कियों को अपनी लच्छेदार बातों से प्रेम जाल में फांस कर उनका आर्थिक, मानसिक तथा दैहिक शोषण करते हैं, फिर धीरे से रफूचक्कर हो जाते हैं, लड़कियां अपने भाग्य को कोसती हुई रोती रह जाती हैं. इसीलिये बुजुर्ग लोग लड़कियों को ब्वाय फ्रेंड के चक्कर से दूर रहने की सलाह देते हैं क्योंकि ब्वाय फ्रेंड धोखा देने के लिये ही होता है. उसकी बातें अफीम की तरह होती हैं जो थोड़ी देर के लिये सारे दुख दर्द भुला कर मीठी नींद में सुला देती हैं किंतु जब नशा उतरता है तो दर्द दोगुना हो कर उभरता है. ब्वाय फ्रेंड का साथ क्षणिक सुख देता है जिसकी अंतिम परिणिति विश्वासघात तथा अंतहीन दुख के रूप में होती है. पति थोड़ी धौंस बताता है, कभी प्रताडि़त भी करता है, ब्वाय फ्रेंड के मुकाबले कम प्यार दिखाता है, कभी बेवकूफ भी बनाता है किंतु पत्नी की सुरक्षा तथा संरक्षा (रोटी, कपड़ा, मकान, सौंदर्य प्रसाधन, चिकित्सा आदि) का आजीवन दायित्व निभाता है. देश में शासन कर रहे राजनेता कुछ इसी प्रकार के पतियों की श्रेणी में आते हैं. कुछ ज्यादा भ्रष्ट हैं, कुछ कम, तो कुछ ईमानदार भी हैं. यह भी कठोर सत्य है कि इतने भ्रष्टाचार और घोटालों के बावजूद देश उत्तरोत्तर प्रगति कर रहा है. साइंस, टेक्नोलाजी, डिफेंस, आईटी, हर क्षेत्र में विश्व की महाशक्तियां भी भारत का लोहा मानती हैं. यह बात अवश्य है कि यदि भ्रष्टाचार नहीं होता तथा लोग राष्ट्र के प्रति उतने ही समर्पित होते जितने जापान, अमेरिका, रूस, ब्रिटेन आदि में हैं तो हम भी महाशक्तियों की कतार में खड़े होते.
बात चल रही थी भोली भाली जनता के ब्वाय फ्रेंड्स के रूप में उभरे बाबा रामदेव तथा अन्ना हजारे की दगाबाजी की. तो, अभी तो जनता ने केवल इतना ही देखा है कि बाबा रामदेव ने 500 लाख करोड़ के काले धन तथा 10 सालों तक टैक्स फ्री लाइफ का दिवा स्वप्न दिखाया फिर गायब हो गये. अन्ना हजारे ने देश को भ्रष्टाचार मुक्त करने का दावा किया फिर अचानक आंदोलन समाप्ति की घोषणा कर दी और अपनी टीम भी भंग कर दी. जब जनता को यह पता लगेगा कि इन दोनों तथा कथित अवतारों ने डेढ़ साल तक जनता को जो टीवी सीरियल दिखाया उसकी पटकथा के लेखक, निर्माता तथा प्रायोजक राजनेता ही थे, तो जनता को कितना सदमा पहुंचेगा. प्रस्तुत है एक विश्लेषण जिससे यह अनुमान लगाने में आसानी होगी कि इस सीरियल के लेखक, निर्माता तथा प्रायोजक कौन कौन थे. लगभग डेढ़ वर्ष पहले जब पेट्रोलियम तथा खाद्य पदार्थों की मंहगाई सुरसा का तरह बढ़ रही थी तब बाबा रामदेव अचानक योग की कोचिंग छोड़ काला धन की मशाल ले कर खड़े हो गये. हर तरफ 500 लाख करोड़ के काले धन का ऐसा हौवा खड़ा किया कि लोग पेट्रोल और खाने पीने की चीजों की मंहगाई को भूल कर बाबा रामदेव की मोनो-एक्टिंग देखने लगे जिसमें उन्हें आनंद आने लगा. इसी आनंदमय माहौल में 5 राज्यों के विधान सभी चुनाव संपन्न हो गये. मंहगाई इन चुनावों में मुद्दा ही नहीं बन पाई जबकि खाद्य पदार्थों की मंहगाई एकमात्र ऐसा मुद्दा है जो सरकार बदलने की क्षमता रखता है. इतिहास गवाह है कि केवल प्याज महंगा हो जाने से सरकारें बदल गईं परंतु बाबा जी के आशीर्वाद से मंहगाई का मुद्दा नेपथ्य में चला गया. बाबा जी का काम समाप्त हो गया था, अब उन्हें वापस अपनी कोचिंग संभाल लेनी चाहिये थी किंतु काला धन विरोधी मुहिम में उमड़े जन सैलाब को देख कर बाबा के मन मे भी राजनेता बनने की महत्वाकांक्षा उत्पन्न हो गई. संभवत: बाबा ने सोचा होगा कि योग का कार्यक्रम दिखाने के लिये तो टीवी चैनल वाले पैसे मांगते हैं, नेता बन जायेंगे तो फ्री में टीवी पर दिखने लगेंगे. बाबा ने राजनीति में कूदने की घोषणा कर दी. कांग्रेस चाह रही थी कि बाबा अपनी राजनीतिक पार्टी लांच कर दें और उनकी देखा देखी कुछ हिंदू धर्म गुरु भी अपनी पार्टियां बना कर राजनीति के मैदान में कूद जायें. चूंकि बाबा रामदेव तथा अन्य हिंदू धर्माचार्य भगवा वस्त्र पहनते हैं इसलिये उन्हें कट्टर हिंदू वोट ही मिल सकेंगे जिसका नुकसान भाजपा को होगा क्योंकि भाजपा की वास्तविक शक्ति कट्टर हिंदू वोट बैंक ही है, यदि इसमें सेंध लग जाती है तो भाजपा धरातल पर आ जायगी. भाजपा नेताओं ने इस खतरे को भांप लिया. फौरन भाजपा तथा उसके अभिभावक आरएसएस के नेताओं ने बाबा रामदेव का समर्थन शुरू कर दिया ताकि यह लगे कि जितने भी भगवा वस्त्र धारी है सब भाजपा की ही संपत्ति हैं. किंतु इससे जनता में यह संदेश गया कि बाबा रामदेव भले ही अपने आप को धर्मनिरपेक्ष तथा नान एलाइंड प्रदर्शित करते हैं किंतु वे वास्तव में भाजपा तथा आरएसएस के आदमी हैं. इससे बाबा के समर्थकों की संख्या में काफी कमी आ गई. बाबा ने सोचा चलो खुद किंग नहीं बन सके तो क्या हुआ कम से कम भाजपा में किंगमेकर की भूमिका में तो रहेंगे. यह देख कर कांग्रेस को डर हो गया कि अगर बाबा रामदेव ने अपनी पार्टी लांच करने के बजाय भाजपा के पक्ष में अपील कर दी तो भाजपा को काफी फायदा हो सकता है क्योंकि बाबा के समर्थक भी लाखों में हैं. उनके काला धन विरोधी ज्ञापन पर 50 लाख से अधिक लोगों ने हस्ताक्षर किये थे. इन परिस्थितियों में कांग्रेस के पास बाबा की छीछालेदर करके उन्हें पूर्णत: डिफ्यूज कर देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. पहले बाबा को समझाइश दी गई कि वे राजनीति से दूर रहें, अपनी योग की कोचिंग और दवाओं का व्यापार जिसका टर्न ओवर करोड़ों में है, देखें और देश विदेश में फैली अरबों रुपये की अचल संपत्ति संभालें. लेकिन बाबा नहीं माने, अनशन पर बैठ गये. आधी रात के बाद पुलिस ने धावा बोला और लोगों को खदेड़ना शुरू किया. बाबा को डर हो गया कि इसी हुड़दंग में कोई उन्हें निपटा न दे इसलिये बाबा अपनी जान बचाने के लिये औरतों के कपड़े पहन कर भागे. फिर भी अनशन नहीं तोड़ा. दिल्ली, यूपी कहीं दो गज जमीन नहीं मिली तो उस समय भाजपा शासित उत्तराखंड में तंबू गाड़ दिया. कांग्रेस ने पूरी उपेक्षा बरती. भाजपा ने कांग्रेस पर दबाव बनाने के प्रयास किये कि वह बाबा का अनशन तुड़वाने के लिये पहल करे किंतु कांग्रेस ने कोई भाव नहीं दिया. बाबा की जान रामलीला मैदान में तो बच गई थी किंतु अनशन नहीं तोड़ते तो उत्तराखंड में अवश्य चली जाती इसलिये भाजपा ने धर्म गुरुओं की सहायता से उनका अनशन तुड़वाया क्योंकि भाजपा सीधे पिक्चर में नहीं आना चाहती थी ताकि बाबा नान-एलाइंड दिखते रहें. कुछ ही दिनों में बाबा की सेहत ठीक हो गई. कांग्रेस भी उनकी सेहत की रिमोट मानीटरिंग कर रही थी. उसे मालूम था कि चोट खाये बाबा फिर दहाड़ने का प्रयास करेंगे इसलिये बाबा तथा उनके सहयोगियों की कुंडलियां खंगालने के लिये इनकम टैक्स, ईडी, सीबीआई तथा विदेश मंत्रालय को लगा दिया गया. बाबा की एक सहयोगी राजबाला जो रामलीला मैदान में घायल हो गई थीं, अस्पताल में इलाज के दौरान चल बसीं. बाबा के निकटतम सहयोगी बालकृष्ण फर्जी पासपोर्ट मामले में जेल चले गये, बाबा के दवा व्यापार का करोड़ों का टर्न ओवर तथा देश विदेश में फैली अरबों की अचल संपत्ति सब उजागर हो गया. यह भी समाचार आया कि पतंजलि योग पीठ ने नेपाल में 700 रुपानिया जमीन रियायती दरों पर खरीदी थी किंतु बाद में उसका अधिकतर हिस्सा निजी व्यक्तियों तथा बिल्डरों को बेच दिया गया. नेपाल सरकार ने इस पर जांच बिठा दी. इन खुलासों के पहले लोग यह समझते थे कि लंगोटी धारी बाबा को किसी चीज का मोह नहीं है, वो दवायें नो प्राफिट-नो लास के सिद्धांत पर बेचते हैं, एक बार भोजन करते हैं, चल-अचल संपत्ति में उनकी कोई रुचि नहीं है, एक छोटी सी कुटिया में संत जीवन व्यतीत करते हैं. इन सारी बातों से बाबा की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा जो उनका मनोबल तोड़ने के लिये पर्याप्त था. बाबा ने सरकार के विरुद्ध दहाड़ना बंद कर दिया. कभी कभी औपचारिकता निभाने के लिये यह अवश्य कह देते हैं कि मेरा आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है, जारी रहेगा. वैसे बाबा के पास शांति से बैठने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं है क्योंकि काला धन केवल एक दल के पास ही नहीं है, जो भी सत्ता में रहा है, चाहे केंद्र में अथवा राज्यों में, लगभग सभी ने काला धन बनाया है. बाबा विरोध करें भी तो किसका और कैसे. कांग्रेस ने तो बाबा को चारों तरफ से घेर कर हालत पतली कर दी है. भाजपा शाशित राज्यों में भी घोटालों की कमी नहीं है किंतु बाबा भाजपा के विरुद्ध कैसे बोलें उन्होंने तो उनके प्राण भी बचाये हैं और कुछ हद तक प्रतिष्ठा भी.
अब आइये सुपर मसीहा बने अन्ना हजारे पर. जब बाबा रामदेव का काला धन विरोधी आंदोलन भारी भीड़ खींच रहा था तथा बाबा राजनीति की सरिता में कूदने को आतुर थे, उसी समय अन्ना हजारे की अचानक एंट्री हुई, वे महाराष्ट्र से इंपोर्ट हो कर आये और सीधे जंतर मंतर पर बैठ गये और भ्रष्टाचार के विरुद्ध निर्णायक युद्ध की घोषणा कर दी. अन्ना हजारे को उस समय तक दिल्ली तो दूर महाराष्ट्र में भी ज्यादा लोग नहीं जानते थे किंतु उनके अनशन पर बैठते ही उनके साथ समर्थको की अच्छी खासी तादाद हो गई. अल्प शिक्षित अन्ना के अधीन भूतपूर्व वरिष्ठ नौकरशाह, प्रख्यात वकील, न्यायविद, बुद्धिजीवी लोगों की एक पूरी फौज खड़ी हो गई. सोनिया गांधी जो अच्छे अच्छे धुरंधरों पर दृष्टिपात नहीं करतीं, अन्न के अनशन पर चिंता व्यक्त करने लगीं तथा उनसे अनशन तोड़ने की अपील करने लगीं. भारत के विभिन्न शहरों में छोटी छोटी टीम अन्ना का गठन हो गया, विदेशों तक में अन्ना के समर्थन में जुलूस निकलने लगे. अन्ना का फोटो टाइम मैग्जीन तक पहुंच गया. निजी टीवी चैनलों ने अन्ना को इतना धुआंधार कवरेज दिया कि चारों तरफ अन्ना ही अन्ना दिखाई देने लगे. सरकार ने टीम अन्ना की मांग पर लोकपाल बिल के लिये ड्राफ्टिंग कमेटी का गठन कर दिया. ड्राफ्टिंग का काम भी शुरू हो गया. अन्ना का शोर इतना ज्यादा हो गया कि बाबा रामदेव का काले धन का मुद्दा पाताल में चला गया और बाबा भी आउट आफ स्क्रीन हो गये. उसके बाद अन्ना के लोकपाल बिल और सरकार द्वारा तैयार किये गये बिल के बीच असमानतायें सामने आईं और सरकार तथा टीम अन्ना के बीच विवाद बढ़ा. इस विवाद में टीम अन्ना ने अन्य दलों के नेताओं को भी लपेट लिया. सरकार ने अपना लोकपाल बिल संसद में पेश कर दिया. टीम अन्ना ने विरोध के स्वर तेज कर दिये और विपक्षी दलों से मदद मांगी किंतु राजनीतिक दलों ने सरकार का साथ दिया. परिणाम स्वरूप लोकपाल बिल हमेशा के लिये लटक गया. इस बिल को लटकाने या ठंडे बस्ते में डालने में सभी राजनीतिक दलों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाईं. किसी ने बहाना बनाया कि सीबीआई को लोकपाल से बाहर रखा जाय, किसी ने लोकपाल में भी आरक्षण का पेंच फंसा दिया, किसी ने तृतीय तथा चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने की जिद पकड़ ली, किसी ने कहा कि न्यायपालिका पर शिकंजा कसना चाहिये तो किसी ने न्यायपालिका तथा सीबीआई को सरकारी नियंत्रण से मुक्त रखने की वकालत की. किसी ने खुल्लम खुल्ला विरोध किया तो किसी ने चुपके से. अन्ना हजारे के आंदोलन से सरकार को सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि सारे देश के सामने यह कलई खुल गई कि भ्रष्टाचार के पोषण में केवल सरकार/कांग्रेस के ही नेता शामिल नहीं हैं, सभी दलों के नेता एक ही जैसे हैं. जनता को यह संदेश भली भांति चला गया कि राजनेता सभी एक जैसे हैं चाहे वे किसी भी दल के हों, भ्रष्टाचार रोकने के उपायों के विरुद्ध सभी एकजुट हैं. जनता चाहे जिसे चुने परिस्थितियों में परिवर्तन नहीं आने वाला.
अन्ना हजारे बाबा रामदेव के एंटीडोट बन कर आये थे किंतु इतना बड़ा कारनामा दिखा कर गये. सभी राजनीतिक दलों को बेनकाब कर दिया. अब जनता जब वोट डालेगी तो उसे मंहगाई, काला धन और भ्रष्टाचार के मुद्दों से हट कर सोचना होगा क्योंकि इन मुद्दों पर तो सभी दल एक जैसे हैं. फिर बचता है, विकास का मुद्दा किंतु विकास के बड़े बड़े दावे तो सभी पार्टियां कर रही हैं. भले ही विकास न करें किंतु विकास का चर्चा जोर शोर से करती हैं. इसलिये यह मुद्दा भी ज्यादा प्रभावी नहीं होगा. अंत में बचता है सांप्रदायिकता/धर्म निरपेक्षता का मुद्दा जिसमे भाजपा मार खा जाती है क्योंकि उसके अलावा बाकी सभी दल धर्मनिरपेक्षता का दावा करते हैं. भाजपा चाह कर भी अपने आपको धर्म निरपेक्ष घोषित नहीं कर सकती क्योंकि जिस दिन ऐसा किया उसी दिन आरएसएस अपनी बैसाखी हटा लेगा.
अंत में, अन्ना हजारे की वास्तविकता का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि उन्हें या उनकी टीम को न तो पुलिस ने छेड़ा, न ही सीबीआई, ईडी या इनकम टैक्स विभाग ने. प्राइवेट टीवी चैनल जो बगैर मोटी रकम लिये किसी को हाई लाइट नहीं करते, अन्ना हजारे को कैसे इतना ज्यादा कवरेज दिया. अन्ना के पास तो भूंजी भांग नहीं है, फिर इतना कवरेज बगैर किसी प्रायोजक या शासकीय दबाव के संभव ही नहीं है. अब अन्ना हजारे का कार्य समाप्त हो गया है इसलिये उन्होंने शांति का मार्ग अपना लिया है. न आंदोलन चलायेंगे, न ही राजनीति करेंगे. किंतु अन्ना ने जिस ढंग से अचानक सन्यास की घोषणा कर दी उससे जनता को संदेह होने लगा कि हो न हो दाल में कुछ काला है. संभव है अन्ना के स्क्रीन से गायब होने के पीछे कोई पोलिटिकल गेम हो इसलिये बाबा रामदेव को फिर एक्टिव कर दिया गया है. अब बाबा रामदेव ने कालाधन तथा भ्रष्टाचार दोनों से एक साथ लड़ने की घोषणा कर दी है. इस बार सरकार की तरफ से कोई धमकी भी नहीं मिल रही है और टीवी चैनल बाबा के पीछे ऐसे दौड़ रहे हैं जैसे कोई महानायक आ गया हो. स्मरणीय है कि कुछ ही दिनों पहले कांग्रेस ने बाबा को चुनाव लड़ने की सलाह दी थी तथा यह भी बताया था कि बालकृष्ण बाबा की काफी पोल पट्टी जानता है इसलिये उसकी जान को खतरा है, उसकी सुरक्षा बढ़ाई जाये. इसके फौरन बाद बाबा जी ने काला धन के साथ साथ भ्रष्टाचार मिटाने का भी ठेका ले लिया. शायद बाबा ने बात मान ली क्योंकि अगर नही मानते तो उनके बारे में बालकृष्ण ऐसे ऐसे खुलासे करता जो स्वयं बाबा को भी मालूम नहीं होंगे किंतु उनकी जेल यात्रा का मार्ग अवश्य प्रशस्त करेंगे. अब बाबा पहले अपना आंदोलन चलायेंगे फिर अपनी राजनीतिक पार्टी लांच कर देंगे, उनकी देखा देखी कुछ और बाबा राजनीति में कूद पड़ेंगे. अगले लोकसभा चुनावों तक कई भगवा पार्टियां चुनाव मैदान में दिखाई पड़ेंगी और अच्छी खासी तादाद में हिंदू वोट काटेंगी. नुकसान किसका होगा, केवल भाजपा का, जो अभी तक धार्मिक आधार पर ही टिकी हुई है किंतु जब भगवा वस्त्र धारी धर्म गुरु स्वयं राजनीति के मैदान में होंगे तो हिंदू वोट किसे मिलेंगे उन्हें या भाजपा को. कांग्रेस के लिये यह सबसे सुविधा जनक स्थिति होगी.
कुछ भी हो डेढ़ वर्ष से चल रहे बाबा रामदेव तथा अन्ना हजारे एपीसोड की पटकथा जिसने भी लिखी है उसकी बुद्धि की कुशाग्रता अद्वितीय है. अनुमान लगायें यह पटकथा लेखक कौन हो सकता है, शायद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह.
मोकर्रम खान, वरिष्ठ पत्रकार/राजनीतिक विश्लेषक
पूर्व निजी सचिव, केंद्रीय शहरी विकास राज्य मंत्री.
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शासन का शिवराज मॉडल हो रहा मज़बूत
शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में सरकार के सात वर्षों के कार्य और कार्रवाईयों के सिंहावलोकन से जो बात साफ तौर पर नजर आती है वह विकास और बदलाव है। पिछले सात वर्ष में जहाँ राज्य की बीमारु छवि में बदलाव आया है वहीं विकास के नए कीर्तिमान भी स्थापित हुए हैं। राज्य की प्रशासनिक मशीनरी की दिशा और दर्शन में बदलाव के साथ ही विकास का प्रकाश अनछुए और अनदेखे क्षेत्रों में पहुँचा है। आम आदमी को खास बनाकर नर में नारायण को देखने की अवधारणा के साथ शिवराज सरकार के सात साल में शासन का नया मॉडल निर्मित हुआ है।
शासन के इस मॉडल में जनतंत्र की नवीन मान्यताएँ और मानक स्थापित हुए हैं। शिवराज मॉडल में जन और तंत्र के मध्य दूरियाँ समाप्त हुई है। शासन का संवेदनशील और मानवीय स्वरूप निर्मित हुआ है, जो व्यक्ति की विकास की जरूरतों को पूरा करने के साथ ही उसकी सामाजिक जिम्मेदारियों में भी हाथ बँटाता है। यह मॉडल सहृदयता, उदारता और विश्वसनीयता जैसे उच्च मानवीय गुणों से ओत-प्रोत है। लौकिक लक्ष्यों के साथ ही आध्यात्मिक आनंद के प्रति भी संकल्पित है। शासन के इस शिवराज मॉडल में गरीब का कोई धर्म और जाति नहीं होती है, सरकार वही होती है, जो गरीब के लिये हो।
शिवराजसिंह चौहान ने 29 नवम्बर 2005 को सरकार का नेतृत्व ग्रहण करने के साथ ही शासन के इस मॉडल का क्रियान्वयन शुरू कर दिया। उन्होंने 30 नवम्बर 2005 को वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक में शासन की दिशा और दर्शन को स्पष्ट कर दिया। मुख्य सचिव और अपर मुख्य सचिव स्तर के अधिकारियों को भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप 20 से 25 वर्ष के अग्रिम नियोजन के निर्देश देते हुए मध्यप्रदेश को देश के अग्रिम राज्यों की श्रेणी में लाने का लक्ष्य दे दिया। उन्होंने विकास के इस मॉडल की प्राथमिकताओं को भी तभी स्पष्ट कर दिया था। उन्होंने आम आदमी का जीवन बेहतर हो और विकास की गति तीव्र करने की दिशा में कार्य के निर्देश दिये थे। श्री चौहान की आम आदमी के जीवन को बेहतर बनाने की प्रतिबद्धता के 7 वर्ष में स्पष्ट परिणाम मिलने लगे हैं।
मध्यप्रदेश आज एक मजबूत अर्थ-व्यवस्था वाला प्रदेश है। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के 7.6 प्रतिशत आर्थिक विकास के लक्ष्य के विरूद्ध योजना के अंत में 10.20 प्रतिशत विकास दर हासिल की गयी। इससे पहले नवमीं पंचवर्षीय योजना में यह दर 8.49 प्रतिशत थी। इसी तरह ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में औसत कृषि विकास दर 9.04 प्रतिशत रही, जो एक शानदार उपलब्धि है। इस दौरान अखिल भारतीय कृषि विकास दर मात्र 3.3 प्रतिशत रही।
मध्यप्रदेश ने वर्ष 2011-12 में लगभग 12 प्रतिशत आर्थिक विकास दर और 18 प्रतिशत कृषि विकास दर हासिल कर अपनी आर्थिक मजबूती का परिचय दिया है। बीते पाँच वर्ष में प्रदेश की संचयी औद्योगिक विकास दर 9.82 प्रतिशत रही, जबकि अखिल भारतीय दर 6.83 रही। वर्ष 2011-12 में प्रदेश की औद्योगिक विकास दर अखिल भारतीय 3.95 की तुलना में 8.05 प्रतिशत रही। जीएसडीपी में सेकेण्ड्री सेक्टर (खनिज, विनिर्माण, ऊर्जा, निर्माण) का योगदान बढ़कर 33 प्रतिशत हो गया। निर्माण क्षेत्र में प्रदेश 16.69 प्रतिशत की दर से बढ़ा।
वर्ष 2011-12 में मध्यप्रदेश आर्थिक विकास दर में गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, पंजाब और तमिलनाडु से आगे है। प्रदेश ने कृषि उत्पादन में नया कीर्तिमान रचा है। बीते रबी मौसम में प्रदेश में 127 लाख टन का बम्पर गेहूँ उत्पादन हुआ। राज्य ने इतनी बड़ी उपलब्धि पायी है जब सिंचित क्षेत्र मात्र 32 प्रतिशत है। अधोसरंचना विकास के क्षेत्र में लगभग 70 हजार किलोमीटर लंबी सड़कों का निर्माण और सुधार किया गया है। बिजली क्षेत्र में बहुत तेजी से काम हो रहा है। विद्युत उत्पादन क्षमता 9458 मेगावॉट हो गयी है। इसी प्रकार शिवराज सरकार की पहली मंत्रिपरिषद की बैठक 6 दिसम्बर 2005 ने एक बत्ती विद्युत कनेक्शन और 5 हॉर्सपावर के सिंचाई पम्पधारकों के बकाया को समाप्त कर सरकार की जनहितकारी प्राथमिकताओं का मार्ग खोला था।
आज सात वर्ष की अवधि में सरकार के जनहितकारी निर्णयों की पूरी श्रंखला बन गई है। शासन के इस मॉडल की अति विशिष्ट प्रमुखता नीति निर्माण प्रक्रिया में समाज की भागीदारी की है। सात वर्ष के दौरान मुख्यमंत्री निवास पर आयोजित 26 पंचायत में समाज के सभी वर्गों को नीति निर्माण में भागीदारी मिली है। भागीदारी केवल शासकीय क्रियाकलापों तक ही सीमित नहीं है। उसमें संबंधों की आत्मीयता और उष्मा भी है। यही कारण है कि बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक, जैन हो अथवा बौद्ध सभी के उमंग और उत्साह के अवसरों पर मुख्यमंत्री निवास के द्वार आमजन के लिए खुल जाते हैं और सभी धर्मों के पर्व गरिमामय भव्यता के साथ मनाए जाते हैं।
शासन के इस मॉडल में आम आदमी के साथ सरकार उसके विकास के प्रयासों और खुशी के अवसरों के साथ ही उसकी सामाजिक जिम्मेदारियों और पारिवारिक कष्टों में भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहती है। संतान के जन्म का अवसर हो। उसके लालन-पालन की जिम्मेदारी और विवाह का संस्कार हो। बीमारी, दुर्घटना अथवा मृत्यु की दुःखद स्थितियाँ हो सभी में सहयोग के लिए सरकार की योजनाएँं हैं। फिर चाहे वह जननी सुरक्षा योजना, मज़दूर सुरक्षा योजना हो, कन्यादान योजना, लाड़ली लक्ष्मी योजना हो अथवा दुर्घटना और अन्त्येष्टि सहायता, ऐसी अनेक योजनाएँ सरकार द्वारा संचालित की जा रही। बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए अथवा ग्रामीण उद्योगों की स्थापना के लिए वित्तीय सहायता में भी सरकार का सहयोग उपलब्ध है।
सरकार के इस मॉडल की विशिष्टिताओं में तात्कालिक सहायता और मदद के साथ ही दीर्घकालिक दूरगामी सुधार और परिवर्तन के प्रयास भी हो रहे हैं। भ्रष्टाचार की भयावह समस्या के समाधान की सार्थक पहल शासन के इस मॉडल में अंर्तनिहित है। ई-प्रशासन के माध्यम से भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन के अनेक प्रभावी कार्य हुए हैं। ऑनलाइन सेवा प्रदाय और सेवा की समय-सीमा की गारंटी, ई-पेमेंट आदि के माध्यम से शासकीय कार्यों में पारदर्शिता और तत्परता आयी है। भ्रष्टाचार नियंत्रित हुआ है। इसके साथ ही भ्रष्टाचारियों को खोजकर दंडित करने की कार्रवाई भी तेज गति से हो रही है। भ्रष्टाचारी की सम्पत्ति राजसात करने के अभूतपूर्व प्रावधान के साथ ही दोषियों को कड़े दण्ड के लिए 8 विशेष न्यायालयों के गठन की ऐतिहासिक कार्रवाई भी की गई है।
मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में सरकार के सात वर्ष ने शासन के समभावी जनोन्मुखी स्वरूप को विकसित किया है। जिसमें आर्थिक, प्रशासनिक मुद्दों के साथ ही सामाजिक चेतना भी शामिल है। इसीलिए बेटी बचाओ अभियान के शंखनाद के साथ ही बेटियों वाले परिवारों को वृद्धावस्था पेंशन की व्यवस्था भी सरकार कर रही है। बच्चे के जन्म की खुशियाँ आंगनवाड़ी केन्द्रों में मनाई जाती हैं तो वृद्धजन को तीथ-दर्शन करवाने के लिए भी सरकार की विशेष ट्रेनें चल रही है।
संक्षेप में कहे तो शिवराज सरकार के सात वर्ष में राज्य में तो यह मॉडल मज़बूत हुआ ही है उसकी ख्याति देश और विदेश में भी हो रही है। संयुक्त राष्ट्रसंघ राज्य को पुरस्कृत कर रहा है तो अन्य राज्य सरकारें मध्यप्रदेश की योजनाओं का अनुसरण करते हुए नीतियाँ बना रही हैं।
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यौन अपराध अधिनियम 2012 के कार्यान्वयन के बावजूद हालात ज्यों के त्यों
बहुप्रचारित ‘‘यौन अपराध से बच्चों का संरक्षण अधिनियम’’ (POCSO) 14 नवंबर 2012 से अस्तित्व में आया। अधिनियम के कार्यान्वयन के समय महिला और बाल विकास मंत्री श्रीमति कृष्णा तीरथ ने दावा किया था कि यह अधिनियम देश में बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की संख्या में वृद्धि के कारण पैदा हुईं सभी समस्याओं का हल निकालने में सक्षम है।
उस समय एक बैठक को संबोधित करते हुए श्रीमति कृष्णा तीरथ ने क्हा था कि आईपीसी के मौजूदा कानून न केवल अपर्याप्त बल्कि बच्चों और व्यस्कों के बीच अंतर नहीं कर रहे थे। उन्होने क्हा था कि इस अधिनियम में बच्चों के साथ यौन अपराधों के लिए कड़ी और कठोर सज़ा निर्धारित की गई है।
मंत्री ने यह भी क्हा था कि पुलिस और न्यायपालिका के अतिरिक्त केन्द्र और राज्य सरकारों के स्तर पर कर्मचारियों की ट्रेनिंग इस अधिनियम के क्रियान्वयन को प्रभावी बनाने के लिए महत्वपूर्ण है। इस अधिनियम के तहत राज्य सरकारों की जिम्मेवारी है कि वह हर जिले में स्पेशल सैशन कोर्ट बनाएं और स्पैशल पब्लिक प्रासिक्यूटर, विशेष किशोर पुलिस, बाल कल्याण समिति और जिला बाल संरक्षण इकाईयों की स्थापना करें। यौन अत्याचार के शिकार बच्चों के मुआवजे के भुगतान के लिए योजनाओं का निर्माण भी राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है, उन्होंने क्हा था।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जहां एक ओर यह सब क्हा और किया जा रहा था, इस अधिनियम के पारित होने के करीब 50 दिन बाद भी जमीनी स्तर पर अधिक बदलाव नहीं आया है। दिल्ली के नरेला में गत 25 नवंबर को चार वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार किया गया। आम आदमी पार्टी के कार्यकत्र्ता वंश सलूजा ने रियल न्यूज को बताया कि जब यह मामला आम आदमी पार्टी के स्वयंसेवकों के संज्ञान में आया तो उन्होंने पुलिस पर दबाव बनाया कि बच्ची का चिकित्सा परीक्षण कराया जाए। लेकिन उनके भरपूर प्रयासों के बावजूद पुलिस ने बच्ची की चिकित्सा जांच नहीं कराई। इस से बुरा यह हुआ कि एक दिसंबर को जब आम आदमी पार्टी के कार्यकत्र्ताओं ने जांच के लिए पुलिस पर दबाव बनाने की चेष्टा की तो उनपर लाठियां भांजी गईं।
हालांकि अरविंद केजरीवाल और गोपाल राय के नरेला पुलिस स्टेशन के बाहर धरने पर बैठने के पश्चात उन तीन पुसिल कर्मियों जिन्होंने कार्यकत्र्ताओं पर लाठियां चलाई थीं के खिलाफ धारा 376 और 511 के तहत कार्यवाई की गई आम आदमी पार्टी के स्वयंसेवकों ने पुलिस की ओर से संवेदनशीलता की कमी दिखाने के लिए डीसीपी बाहरी क्षेत्र दिल्ली बीएस जायसवाल से बातचीत को यूटयूब पर पोस्ट किया है।
इस प्रकार के मुद्दों की ओर संवेदनशीलता की कमी का अंदाजा इस बात से भी हो सकता है कि यौन अपराध अधिनियम के प्रावधानों के कार्यान्वयन से संबंधित रियल न्यूज की ओर से दिल्ली पुलिस के वरिष्ट अफसरों को भेजी गई प्रश्नावली का केवल एक अफसर ने उत्तर देना आवश्यक समझा।
दिल्ली के बहुप्रचारित बलात्कार मामले से कुछ दिन पूर्व रियल न्यूज ने इस अधिनियम के संबंध में जानकारी पाने हेतु श्री संजय कुमार जैन (डीसीपी अपराध और रेलवे), श्री बीएस जायसवाल (डीसीपी बाहरी दिल्ली), श्री रोमिल बनिया (डीसीपी नार्थवेस्ट), श्रीमति सिंधु पिल्ले (डीसीपी उत्तरी दिल्ली), श्री वीवी चैधरी (डीसीपी पूर्वोत्तर दिल्ली), श्री प्रभाकर (डीसीपी पूर्व दिल्ली), श्रीमति छाया शर्मा (डीसीपी दक्षिण दिल्ली), श्री अजय चैधरी (अतिरिक्त सीपी दक्षिण पूर्वी दिल्ली), श्री वी रंगनाथन (अतिरिक्त सीपी पश्चिमी दिल्ली), श्री अनिल कुमार ओझा (अतिरिक्त सीपी दक्षिण पश्चिम दिल्ली), श्री डीसी श्रीवास्तव (अतिरिक्त सीपी सेंटल), श्री केसी द्विवेदी (अतिरिक्त सीपी नई दिल्ली) के अतिरिक्त अन्य वरिष्ट अधिकारियों जैसे श्री एमएस बिष्ट को एक प्रश्नावली भेजी थी।
अपनी प्रतिक्रिया में श्रीमति सिंधु पिल्लई (आईपीएस और डीसीपी उत्तरी दिल्ली) ने क्हा कि ‘‘यह अधिनियम न केवल बच्चों के साथ शोषण और आक्रामक यौन गतिविधियों में आने वाले तमाम अपराधों को परिभाषित करता है बल्कि सजा के प्रावधान भी बनाता है और विशेष अदालतों, विशेष पब्लिक प्रासिक्यूटर और कई अन्य विशेष सेवा वितरण एजेंटों को निर्धारित करता है। प्रथम दृष्टया यह अधिनियम संवेदनशील दिखाई पड़ता है और बच्चे जिन कठिनाईयों का सामना करते हैं उनका समाधान पेश करता है परन्तु साथ ही यह कुछ पहलुओं को अंदेखा कर देता है जिन से अधिनियम लागू होने के पश्चात निपटना आवश्यक होगा।’’
श्रीमति पिल्लई ने आगे बताया कि उत्तरी दिल्ली के सभी एसीपी और एसएचओ को इस अधिनियम के प्रावधानों को सच्ची भावना के साथ लागू करने के निर्देश दे दिए गए हैं। उन्होंने क्हा कि वह सहमत हैं कि एक संवेदनशील प्रशिक्षण कार्यक्रम/कार्यशाला के आयोजन की आवश्यकता है ताकि इस अधिनियम में मौजूद विभिन्न सुविधाओं और प्रावधानों के बारे में जागरूकता फैलाई जा सके।
हाल ही में चलती बस में युवती के साथ बलात्कार और उससे संबंधित घटनाओं से पता चलता है कि संवेदिकरण प्रशिक्षण कार्यक्रमों/कार्यशालाओं का न केवल राष्ट्रीय राजधानी में बल्कि सभी राज्यों में और सभी स्तर पर आयोजन आवश्यक है क्योंकि भारत के दूरस्थ भागों में ऐसे मामलों में असंवेदनशीलता दिखाए जाने के कई मामले सामने आए हैं।
दिल्ली में हुआ बलात्कार का मामला भले ही मीडिया की सुर्खियां बना हुआ है, बच्चों के खिलाफ यौन अपराध से संबंधित घटनाओं की अभी भी अंदेखी की जा रही है। चार साल की बच्ची के साथ बलात्कार की घटना के कुछ ही दिन बाद दिल्ली में एक नौ वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार का मामला भी सामने आ चुका है। सीतापुर में दो दिन पूर्व एक सात वर्षीय बच्ची की बलात्कार के पश्चात हत्या कर दी गई और उसी रोज फैजाबाद में एक 15 वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई गई। बागपत में भी एक 15 वर्षीय लड़की के अपहरण और बलात्कार की कोशिश का मामला सामने आया है। जहां रोजाना इस प्रकार के मामले सामने आ रहे हैं, हमारे नेता और प्रशासन अभी भी लापरवाह नजर आ रहे हैं जिसके कारण इस प्रकार के अधिनियम केवल कागजों पर ही अच्छे दिखाई देते हैं।
रियल न्यूज इंटरनेश्नल न्यूज ब्यूरो
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बलात्कार की घटनाओं के लिये कौन जिम्मेदार ?
बलात्कार की घटनाओं के लिये कौन जिम्मेदार ?
(मोकर्रम खान)
हाल ही में दिल्ली में एक पैरा मेडिकल छात्रा के साथ रात लगभग 9 बजे चलती बस में कुछ लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया. छात्रा को सभी शासकीय प्रयासों के बावजूद बचाया नहीं जा सका. इस घटना ने कई प्रश्न खड़े कर दिये हैं. क्या देश की राजधानी में कानून व्यवस्था इतनी कमजोर हो गई है कि बलात्कारियों के हौसले इस सीमा तक बुलंद हो चुके हैं. जब राजधानी में जहां लगभग हर जगह पुलिस की चौकसी मौजूद है, इस प्रकार की घटनायें हो रही हैं तो देश के अन्य शहरों तथा छोटे छोटे गांवों में जहां पुलिस तक पहुंच पाना तथा एफआईआर कराना ही दुष्कर कार्य है, वहां क्या स्थिति होगी. दिल्ली में सामूहिक बलात्कार हुआ इसलिये मीडिया में इस घटना को इतना कवरेज मिला कि देश के कोने कोने तक खबर पहुंच गई, जगह जगह प्रदर्शन होने लगे. संसद मे भी इस मामले की गूंज सुनाई दी. फिल्म अभिनेत्री से राज्य सभा सांसद बनीं जया बच्चन इतनी व्यथित हुईं कि रो पड़ीं और पूछा कि दूसरे मुद्दों पर संसद ठप की जा सकती है तो ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर क्यों नहीं की गई. संभवत: यह पहला अवसर है जब किसी महिला नेत्री ने बलात्कार के विरुद्ध इतना मुखर प्रहार किया है. बहरहाल संसद में गैर राजनीतिक मुद्दे अधिक समय तक नहीं टिक पाते. ऐसे विषयों पर राजनेता केवल सहानुभूति स्वरूप दो मिनट की श्रद्धांजलि दे सकते हैं और कुछ नहीं क्योंकि ऐसे विषयों पर उन्हें कोई राजनीतिक लाभ नहीं दिखाई देता. जया बच्चन अभी तक प्रोफेशनल पोलिटीशियन नहीं बनी हें इसलिये भावुक हो गईं. खैर, राजनेताओं के लिये भले ही महिलाओं के विरुद्ध बलात्कार जैसे अत्याचार का मुद्दा अधिक महत्व नहीं रखता हो किंतु समाज को झकझोरने के लिये यह मुद्दा 2जी या एफडीआई से अधिक शक्तिशाली है. आखिर बलात्कार की घटनायें क्यों बार बार होती हैं, इसकी तह तक जाना ही होगा. एक कारण तो अपराधियों को समुचित दंड न मिल पाना है. अक्सर बलात्कार के प्रकरणों में पुलिस द्वारा रिपोर्ट दर्ज करने में आना कानी की जाती है. पीडि़ता का डाक्टरी परीक्षण इतनी देर में कराया जाता है कि सबूत स्वत: मिट जाते हैं. कभी कभी डाक्टर भी कमजोर या गलत मेडिकल रिपोर्ट दे देते हैं. कभी कभी पुलिस-डाक्टर गठजोड़ भी बलात्कारी को बचाने में सहायक होता है. रही सही कमी अधिवक्तागण पूरी कर देते हैं जो मोटी फीस वसूल कर बलात्कारियों को बचाने का प्रयास करते हैं. पीडि़ता से ऐसे ऐसे अश्लील प्रश्न करते हैं कि बलात्कार का मुकदमा बलात्कार से भी अधिक पीड़ादायक बन जाता है. फिर कानून की रस्सी इतनी लंबी होती है कि पीडि़ता का साहस जवाब दे जाता है. कई मुकदमें दशकों तक चलते रहते हैं. पीडि़ता युवावस्था से अधेड़ वय को पहुंच जाती है, इस दौरान उसका यौवन, सामाजिक सम्मान, आर्थिक स्थिति, परिवार की प्रतिष्ठा, अन्य बहनों का भविष्य, सब ध्वस्त हो जाते हैं, फिर भी अपराधियों को दंड नहीं मिल पाता. वे कभी साक्ष्य के अभाव में, कभी संदेह का लाभ पा कर तो कभी बाइज्जत बरी हो कर छूट जाते हैं और पीडि़ता तथा उसके परिवार के सदस्यों को मुंह चिढ़ाते हुये निर्द्वंद घूमते हैं. इससे ऐसी परिस्थितियां निर्मित हो जाती हैं कि पीडि़ता तथा उसके परिवार के पास सामूहिक आत्महत्या के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प उपलब्ध नहीं होता. उनकी जीवनलाला समाप्त हो जाने के बाद भी न समाज जागता है और न ही शासन/प्रशासन या कानून. इससे भावी पीडि़तों को यह संदेश भली भांति चला जाता है कि वे समाज में पल रहे भेडि़यों से अपनी सुरक्षा की व्यवस्था स्वयं करें, शासन/प्रशासन से कोई आशा न रखें और यदि फिर भी उनके साथ कोई अनहोनी हो जाय तो इसे भाग्य का लेख समझ कर शिरोधार्य करें, इस घटना की चर्चा भी कहीं न करें अन्यथा धन-धर्म दोनों हीं गंवाने पड़ेंगे.
गुंडे तथा बलात्कारी उक्त तथ्यों को पीडि़तों से भी अधिक अच्छी तरह समझते हैं. इसलिये भविष्य में निरंतर तथा निर्बाध शारीरिक तथा आर्थिक शोषण करने के लिये बलात्कार की ब्ल्यू फिल्म या एमएमएस बना लेते हैं. पुलिस भले ही बलात्कारियों के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य न एकत्र कर सके किंतु बलात्कारियों के पास पीडि़त को ब्लैक मेल करने के लिये पर्याप्त सामग्री रहती है. पुरुष प्रधान समाज में यदि किसी महिला को पर्याप्त सामाजिक तथा आर्थिक संरक्षण प्राप्त नहीं है तो वह कभी भी समाज के भेडि़यों की यौनक्ष्ुाधापूर्ति का अकस्मात शिकार बन सकती है. पर्याप्त दंड के अभाव में बलात्कारियों को प्रोत्साहन मिल रहा है. कुछ मुस्लिम देशों में बलात्कार के लिये सीधे प्राणदंड की व्यवस्था है इसलिये वहां बलात्कार करने का साहस कोई नहीं कर पाता. हमारे देश में तो ऐसे ऐसे सुधारवादी हैं कि बलात्कारी को फांसी देने के विरुद्ध भी आंदोलन चलाने लगते हैं. लगभग 5 वर्ष पूर्व कोलकाता में एक व्यक्ति को एक अबोध बच्ची के साथ बलात्कार के बाद निर्मम हत्या के आरोप में फांसी दी जा रही थी तो कुछ लोग उसकी फांसी के विरुद्ध सड़कों पर उतर आये थे. धन्य हैं ऐसे सुधारवादी. इससे बलात्कारियों को प्रोत्साहन नहीं मिलेगा तो और क्या होगा.
यह तस्वीर का एक पहलू है, अब दूसरा पहलू देखिये. आधुनिकीकरण के इस दौर में अश्लीलता को सबसे ज्यादा प्रोत्साहन मिला है. बाजारवाद इतना पैर पसार चुका है कि विदेशी कंपनियां अपने उत्पाद बेचने के लिये तरह तरह के हथकंडे इस्तेमाल कर रही हैं. टी वी पर ऐसे ऐसे अश्लील विज्ञापन दिखा रही हैं कि किशोर तथा युवा वर्ग क्या छोटे छोटे बच्चों के मन-मष्तिष्क भी अवैध यौन संबंधों की ओर तेजी से अग्रसर हो रहे हैं. एक विज्ञापन में एक युवक अपने शरीर पर एक परफ्यूम का स्प्रे करता है, उसके दो सेकेंड बाद ही दर्जनों अर्धनग्न युवतियां पागलों की तरह दौड़ती हुई आ कर उस युवक से लिपट जाती हैं और उसके पूरे शरीर पर चुंबन ले कर अपने लिपिस्टिक पुते होंठों के निशान डाल देती हैं. एक विज्ञापन में एक नई नवेली दुल्हन 16 श्रंगार कर अपने पति की प्रतीक्षा कर रही होती है तभी सामने के मकान की खिड़की खुलती है और शरीर पर स्प्रे डालता हुआ एक युवक प्रगट होता है. उस स्प्रे की सुगंध से दुल्हन इतनी कामांध हो जाती है कि अपने पिया से प्रथम मिलन की प्रतीक्षा भंग कर तत्काल अपने गहने तथा कपड़े उतारने लगती है. फिल्मी गानों में भी कामोत्तेजक दृश्यों तथा फूहड़़ शब्दों का खुल कर प्रयोग होता है. इस अश्लीलता के नग्न प्रचार का शिकार किशोर तथा युवा वर्ग सर्वाधिक हो रहा है. अब वे सामाजिक तथा धार्मिक बंधनों में रहने को तैयार नहीं हैं. वे उन्मुक्त जीवन जीना चाहते हैं जिसमें शादी ब्याह, घर गृहस्थी, बच्चों का पालन पोषण जैसे उलझनों वाले पड़ाव न आयें. पहले कुंवारी लड़कियां एवं महिलायें अपना शरीर पररुषों से छिपाती थीं. यदि कभी गलती से दुपट्टा या साड़ी का आंचल सीने से सरक गया तो घबरा जाती थीं और तत्काल अपने आप को पुन: व्यवस्थित कर लेती थीं. अब बहुत सी महिलायें कपड़े पहनती हैं तो अपना शरीर छुपाने के लिये नहीं बल्कि अपना रंग, रूप, मांसल देह तथा शरीर की बनावट प्रदर्शित कर पर-पुरुषों को आकर्षित करने के लिये. पहले महिलायें अपने पति के साथ भी खुले आम घूमने में शरमाती थीं, लड़कियां किसी एक से प्रेम करती थीं और उससे भी समाज की नजरें बचा कर छुप छुप कर मिलती थीं तथा उनके प्रेम का केवल एक उद्देश्य होता था, अपनी पसंद के उस युवक से ही विवाह. पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण में अब लड़कियां ऐसे कपड़े पहन रही हैं जिनसे शरीर छिपे कम, दिखे ज्यादा तथा उन्हें देख कर लोग उत्तेजित और आकर्षित हों. जो लड़की जितने ज्यादा ब्वाय फ्रेंड बनायेगी वह उतनी बड़ी चैंपियन कहलायेगी. पहले यह कार्य लड़के किया करते थे. अब कुछ लड़कियां कपड़ों की तरह ब्वाय फ्रेंड बदलती हैं. आज एक के साथ घूम रही हैं, कल दूसरे के साथ, परसों तीसरे के साथ, नरसों चौथे के साथ. कुछ ऐसी भी हैं जो अपनी दोस्तों के बीच अपने ब्वाय फ्रेंड्स की लिस्ट बता कर गौरव का अनुभव करती हैं.
समाज कितना भी आधुनिक या पाश्चात्य मुखी हो जाय इस सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि पुरुष प्रधान समाज में नारी की सुरक्षा की गारंटी पुरुष ही है. विवाह से पहले पिता तथा भाई एवं विवाहोपरांत पति, उसकी सुरक्षा का दायित्व निभाते हैं. कुंवारी लड़की जब पिता या भाई के साथ शालीनता के साथ चलती है तो उस पर बुरी नजर डालने या कोई अवांछित कृत्य करने का साहस किसी बदमाश में नहीं होता. जब विवाहोपरांत पति के साथ चलती है तो समाज उसे सम्मान की दृष्टि से देखता है. गुंडे बदमाश भी जानते हैं कि इस महिला को ज़ेड प्लस सुरक्षा प्राप्त है, यह सड़क पर पड़ी हुई जूठी हड्डी नहीं है जिसे कोई भी कुत्ता अपने जबड़ों में दबा कर चूसने लगे. दूसरी ओर जब कोई लड़की भड़कीले वस्त्र पहन कर किसी पर पुरुष के शरीर से जोंक की तरह चिपक कर सार्वजनिक भ्रमण करती है तो बहुत से लोगों की भावनायें दूषित हो जाती हैं और वे उसे बल पूर्वक प्राप्त करने की योजना बनाने लगते हैं क्योंकि वे यह जानते हैं कि यह न तो उस व्यक्ति की बहन है, न ही पत्नी इसलिये यह इसके रक्षक की भूमिका नहीं निभा सकता और चूंकि यह लोग धार्मिक तथा सामाजिक मान्यताओं के विरुद्ध कार्य कर रहे हैं इसलिये इन्हें सोशल सपोर्ट भी नहीं मिलेगा. संभवत: वे यह भी सोचने लगते हैं कि जिस प्रकार यह युवक पर-पुरुष हो कर भी इसके साथ आनंद के क्षण बिता रहा है, हम भी बिता सकते हैं, हम में और इस युवक में केवल एक ही तो अंतर है, वह है लड़की की सहमति का. बलात्कार का एक कारण उक्त परिस्थितियां भी हो सकती हैं.
आजकल कुछ महिलाओं ने एक अजीब ही मुहिम चला रखी है. उनका कहना है कि हम चाहे जैसे कपड़े पहनें, कोई हम पर अपनी मर्जी नहीं थोप सकता, किंतु प्रश्न यह उठता है कि प्रकृति ने स्त्री-पुरुष के बीच जो परस्पर आकर्षण की व्यवस्था रखी है जिसके कारण दो विपरीत लिंग के शरीरों का मिलन फिर संतानोत्पत्ति तथा सांसारिक व्यवस्था का निर्माण होता है, का क्या इलाज किया जाय. एक इलाज तो यह है कि पुरुष के अंदर जो प्रकृति प्रदत्त यौन पिपासा है जो स्त्री का रूप, रंग तथा शरीर देख कर ही जागृत होती है, वह समाप्त हो जाय फिर महिलायें चाहे जितना अंग प्रदर्शन करें, कोई समस्या नहीं होगी, पुरुष शांति से बैठा रहेगा, किंतु यह इलाज भी भारी पड़ेगा क्योंकि यौन संबंध केवल पुरुषों की आवश्यकता नहीं है, यह प्रत्येक प्राणी तथा नर एवं मादा की आवश्यकता है. संभवत: विदेशी संस्कृति की पुजारी ये महिलायें यह चाहती हैं कि पंजीरी भी खा लें और हंस भी लें, यह कैसे संभव है. विदेशी अप-संस्कृति के पुजारी तथा पुजारिनें संभवत: इस तथ्य से अनभिज्ञ हैं कि पाश्चात्य देशों में अति अश्लीलता के कारण पुरुषों में पौरुषहीनता आम बीमारी है जिसके कारण वहां परिवार विघटित हो रहे हैं, लोग रोज जीवन साथी बदल रहे हैं. तलाकों की संख्या इतनी अधिक हो चुकी है कि कई लोगों को यह भी याद नहीं रहता कि पिछले 5 सालों में उनके कितनी बार विवाह हुये और कितनी बार तलाक. चारों ओर यौन अराजकता का वातावरण है. मनुष्य तथा पशुओं में अंतर ढूंढना कठिन हो रहा है. शायद कुछ लोग भारत की संस्कृति एवं सभ्यता को पलीता लगाने की ठान चुके हैं. यदि इनके कुप्रयास सफल हो गये तो यह देश की दुर्भाग्य ही होगा क्योंकि नैतिकता ही हमारा संबल है जो हमें हर परिस्थिति में चट्टान की तरह खड़े रहने की शक्ति एवं प्रेरणा देता है.
दिल्ली में पैरा मेडिकल छात्रा के साथ बलात्कार की घटना से जिस प्रकार समाज उद्वेलित हुआ उससे राजनेताओं तथा पुलिस के कान अवश्य खड़े हो गये हैं. अब राजनेता बलात्कार के लिये कठोर दंड हेतु कानून बनाने की बात कर रहे हैं. पुलिस अचानक सक्रिय हो गई है. पहले केवल बलात्कार तथा छेड़छाड़ की घटनाओं के समाचार छपते थे, अब घटना के समाचारों के साथ साथ आरोपियों के गिरफ्तार कर लिये जाने के समाचार भी साथ ही छपने लगे हैं अन्यथा पहले अपराधियों का पता ही नहीं चल पाता था. बलात्कारियों को कठोर दंड देने के लिये कुछ महिलाओं ने यह सुझाव दिया है कि सऊदी अरब में बलात्कारियों को जिस प्रकार की सजा दी जाती है, उसी प्रकार की सजा की व्यवस्था भारत में भी की जाय. सुझाव अति उत्तम है क्यों कि यदि दो चार लोगों को भी ऐसी सजा मिल गई तो लोग बलात्कार का नाम ही भूल जायेंगे. परंतु एक बात यह भी ध्यान में रखनी होगी कि सऊदी अरब में महिलाओं को अंग प्रदर्शन की अनुमति नहीं है. क्या पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण में लिप्त महिलायें इस व्यवस्था को भी स्वीकार करेंगी.
अंत में, बलात्कार को किसी भी प्रकार जायज नहीं ठहराया जा सकता. यह जघन्य अपराध है जो संपूर्ण मानवता को कलंकित करता है. इसके लिये फांसी की सजा भी कम है. यदि कोई कन्या या महिला पर-पुरुष के साथ खुले आम घूम रही हो तो भी किसी को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह उसे छीन कर ले जाय और बलपूर्वक शारीरिक संबंध बनाये या उसके शरीर को किसी तरह की क्षति पहुंचाये. जो महिलायें पैसे ले कर यौन सुख बेचती हैं, उनके भी अपने नियम कायदे हैं, उन पर भी बल प्रयोग नहीं किया जा सकता. शांतिपूर्ण जीवन जीने का हक सबको है. बलात्कार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिये शासन, प्रशासन, कानून तथा समाज सभी को एक साथ मिल कर काम करना होगा और इस दिशा में समन्वय के साथ ईमानदार प्रयास करने होंगे, कोरी बयानबाजी और प्रदर्शनों का कोई सार्थक परिणाम नहीं निकलेगा.
मोकर्रम खान, वरिष्ठ पत्रकार/राजनीतिक विश्लेषक
पूर्व निजी सचिव, केंद्रीय शहरी विकास राज्य मंत्री.
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Saturday, December 22, 2012
दो ग्रामीण विस्तार अधिकारी निलंबित
भोपाल 22 दिसंबर 2012। कार्यालय उप पंजीयक सहकारी संस्थाए जिला अशोकनगर द्वारा प्राथमिक कृषि साख सहकारी संस्था रांवसर एवं रूसल्ला के निर्वाचन सम्पन्न कराने हेतु बीएल सेन ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी को रांवसर एवं हरिओम शिवहरे ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी को रूसल्ला का रिटर्निग ऑफीसर नियुक्त किया गया था। उक्त कर्मचारियों द्वारा आदेशों को लेने से इंकार किया गया जो शासकीय आदेशों की अवहेलना की श्रेणी में आता है। निर्वाचन कार्य में लापरवाही वरतने पर कलेक्टर संकेत भोडवे ने तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। निलंबन काल में इनका मुख्यालय अनुविभागीय अधिकारी कार्यालय चंदेरी रहेगा एवं निलंबन काल में नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता प्राप्त होगा।
- डॉ. नवीन जोशी
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लाईव कवरेज से परहेज
भोपाल 22 दिसंबर 2012। विधानसभा की कार्यवाही का टीवी पर लाईव कवरेज दिखाया जाये इसके लिये कांग्रेस के एक युवा विधायक ने स्पीकर ईश्वर दास रोहाणी को पत्र लिखने की कार्यवाही करने की कोशिश की लेकिन उन्हीं के दल के एक नेता ने उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी तथा कहा कि इससे प्रिन्ट मीडिया का महत्व कम हो जायेगा जबकि रिपोर्टिंग में प्रिन्ट मीडिया ज्यादा बेहतर है। ज्ञातव्य है कि कुछ साल पहले भी विधानसभा की कार्यवाही के टीवी कवरेज की बात जोर-शोर से उठी थी लेकिन बाद में यह ठण्डी पड़ गई। फिलहाल विधानसभा में उसके सचिवालय के स्वयं के कैमरे लगे हुये हैं तथा बजट सत्र में आम बजट रखने के दौरान टीवी न्यूज चैनलों को सदन के अंदर की कार्यवाही दिखाने की छूट दी जाती है।
- डॉ. नवीन जोशी
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रेत में तरबूज-खरबूज उत्पादन में मछुआरों को मिलेगी प्राथमिकता
भोपाल 22 दिसंबर 2012। नदी किनारों की रेत में तरबूज-खरबूज उत्पादन हेतु मछुआरों को प्राथमिकता मिलेगी। इसके लिये नवगठित मछुआ कल्याण बोर्ड नीति बनाने के लियु सुझाव देगा। इसके अलावा बोर्ड सिंघाड़ा अनुसंधान, उत्पादन तथा विपणन के विकास तथा सुधार हेतु और कमल गट्टा तथा उससे उत्पादित मखाना के बेहतर विपणन के लिये भी सुझाव देगा। बंद ऋतु तथा मत्स्याखेट प्रतिबंधित क्षेत्र में मत्स्याखेट प्रतिबंध प्रभावी रखने में मछुआरों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये भी बोर्ड परमर्श देगा। वह मछुआ कल्याणकारी योजनाओं हेतु मत्स्योद्योग विभाग तथा मत्स्य महासंघ को अनुशंसायें भी करेगा।
ज्ञातव्य है कि राज्य सरकार ने विधायक मोती कश्यप की अध्यक्षता में मछुआ कल्याण बोर्ड का गठन किया है। अब सरकार ने इस बोर्ड के कामकाज अधिसूचित कर दिये हैं। मछलीपालन विभाग द्वारा अधिसूचित कामकाज के अंतर्गत बोर्ड सुखान मछली के आखेट तथा विपणन की नीति, अक्रियाशील मछुआरों के चिन्हांकन हेतु गठित समिति की अनुशंसा/निर्णयों के क्रियान्वयन के लिये और नौका/तैराकी के लिये बच्चों को प्रशिक्षण संबंधी सुझाव भी देगा। इसी तरह बोर्ड नौका घाटों पर नौका संचालन नीति पर भी राय देगा।
विभाग द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया है कि बोर्ड का कार्यकाल तीन साल रहेगा तथा इसमें विभागीय अमले को प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ किया जायेगा और बोर्ड में कुल 23 पद होंगे। बोर्ड को इस साल कार्यालय व्यय के लिये चालीस लाख रुपये मिलेंगे तथा अगले दो वर्षों में यह राशि क्रमश: 35-35 लाख रुपये होगी। बोर्ड का स्वतंत्र कार्यालय होगा तथा इसका मुख्यालय भोपाल में रहेगा लेकिन बोर्ड प्रदेश में कहीं भी बैठक रखने के लिये स्वतंत्र होगा।
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रेप की घटना के बाद अब तो दिल्ली जाने में हमेशा लगेगा डर
जबलपुर। इसी कड़ी में आज मेडिकल के फिजियोथैरिपी के शिक्षकों एवं छात्रों ने कॉलेज बंद रखते हुए दोपहर को जुलूस निकाला और शाम को कैंडल मार्च निकालते हुए अपना विरोध प्रदर्शित किया। सभी का यही कहना है कि नई दिल्ली सुरक्षित नहीं है, ऐसे में वह भी आने वाले भविष्य में यहां अध्ययन करने जाने में डरने लगे हैं। गौरतलब है कि उक्त घटना के बाद से सभी महिलाएं अपने-आप को असुरक्षित महसूस करने लगी हैं। लड़कियों को दिन हो शाम या फिर रात भी बाहर निकलने में भय लगने लगा है।
चूंकि यह घटना चलती बस में हुई है तो अभिभावकों को अपनी बच्चियों के लिये सर्वोत्तम परिवहन माने जाने वाली बसों में भी भेजने में संकोच हो रहा है। यही वजह थी कि मेडिकल कॉलेज सहित स्वयंप्रभा, मेट्रो व एमएम फिजियोथैरेपी कॉलेज के छात्र-छात्राएं सड़कों पर उतर आए। डॉ. अजय फौजदार ने बताया कि शाम को छात्र-छात्राओं ने मिलकर कैंडल मार्च निकाला व आरोपियों को सख्त से सख्त सजा होने की मांग की।
इस साल सबसे अधिक होश उड़ाने वाली खबर रही : पत्नी के 'प्राइवेट पार्ट' पर पति लगाता था ताला
इंदौर। इस साल यूं तो होश उड़ाने वाली कई खबरें सामने आईं, लेकिन मध्यप्रदेश के इंदौर में घटी एक खौफनाक घटना ने लोगों को सबसे अधिक हैरत में डाल दिया। शंकालु पति ने अमानवीयता की सारी हदें पार करते हुए पत्नी के गुप्तांग पर ताला लगा दिया। इसका खुलासा सोमवार को तब हुआ जब महिला ने तंग आकर जहर खा लिया। अस्पताल में डॉक्टरों ने जांच की तो उनके होश उड़ गए और तत्काल पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने आरोपी पति को हिरासत में ले लिया है।
आखिर यह शख्स अपनी पत्नी के साथ इतना क्रूर व्यवहार क्यों करता था..उसने कितनी निर्दयता से और कैसे अपनी पत्नी के गुप्तांग पर ताला लगाया..14 साल की बेटी के साथ यह शख्स क्या करता था..यह सबकुछ आगे की तस्वीरों पर क्लिक करके जानिए...
नोट : यह केवल दैनिकभास्कर.कॉम में ऑनलाइन पब्लिश हुई खबरों पर आधारित है।
Tuesday, December 18, 2012
बौद्ध एवं भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय शांति की राह प्रशस्त कर मानवता की सेवा का माध्यम बने
भोपाल 18 दिसम्बर 2012। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने कहा है कि साँची बौद्ध एवं भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय शांति की राह प्रशस्त कर मानवता की सेवा का माध्यम बनेगा। मुख्यमंत्री श्री चौहान आज यहाँ साँची बौद्ध एवं भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय की सलाहकार समिति के सदस्यों से विश्वविद्यालय के अध्ययन, अध्यापन एवं शोध विषयों पर परामर्श कर रहे थे।
इस अवसर पर मुख्य सचिव आर. परशुराम, सलाहकार समिति के सदस्य गेसे सेमतेन, डॉ. सिद्धेश्वर रामेश्वर भट्ट, प्रो. श्रीकांत कोण्डापल्ली, प्रो. जियो लयाँग, डॉ. लोकेश चन्द्रा, प्रो. मिथिला प्रसाद त्रिपाठी, प्रो. कृष्णबिहारी पाण्डेय, निर्मला शर्मा और प्रमुख सचिव संस्कृति श्री बसन्त प्रताप सिंह उपस्थित थे।
मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि साँची बौद्ध एवं भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय का स्वरूप ऐसा हो कि वह मानव मात्र के कल्याण की नई दृष्टि और दिशा दे। उन्होंने कहा कि इस कार्य में देश-दुनिया के सभी विद्वानों से परामर्श किया जाये। उनके विचार मंथन से उत्पन्न कार्यों को क्रियान्वित करने का कार्य राज्य सरकार द्वारा किया जायेगा। इस कार्य में धन की कमी नहीं होगी। उन्होंने कहा कि शैक्षणिक सत्र का प्रारंभ बौद्ध और भारतीय दर्शन के अध्ययन- अध्यापन से प्रारंभ हो। उन्होंने कहा कि भौतिकता की अंधी दौड़ में मानव मूल्यों का क्षरण हो रहा है। भारतीय दर्शन से ही नैतिक मूल्यों के संरक्षण को नई दिशा देने में मदद मिलेगी।
चर्चा में बताया गया कि सलाहकार समिति द्वारा अगले शैक्षणिक सत्र से शिक्षण कार्य प्रारंभ करने की रूप रेखा तैयार की गयी है। इस संबंध में फरवरी माह में बैठक का आयोजन किया गया है जिसमें पाठ्यक्रम और शैक्षणिक गतिविधियों आदि के संबंध में निर्णय किया जायेगा।
आयकर ने मारे फिटजी के कार्यालयों में छापे
आयकर ने मारे फिटजी के कार्यालयों में छापे
भोपाल 18 दिसम्बर 2012। आयकर विभाग की टीमों ने फिटजी ग्रुप के भोपाल, इंदौर, दिल्ली सहित देश के कई शहरों में कार्यालयों में एक साथ छापामार कार्रवाई की।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार आयकर टीम ने यहां एमपी नगर स्थित फिटजी इंस्टीट्यूट गुप कार्यालय, कोचिंग सेंटर, भदभदा स्थित कोचिंग सेंटर और प्लेटिनम प्लाजा स्थित मयूर स्कूल कार्यालय और बिसनखेडी स्थित मयूर स्कूल, संदीपनि चेरीटेबल ट्रस्ट नामक संस्थान में छापामार कार्रवाई की।
आयकर नई दिल्ली की टीम ने सर्वे की कार्रवाई दिल्ली, नोएडा, इंदौर, ग्वालियर, राजस्थान सहित कई राज्यों में स्थित फिटजी ग्रुप के कार्यालयों में की गई है। फिटजी ग्रुप की कोचिंग पिछले नौ साल से चल रही है।
पूरे देश में फिटजी के 46 शहरों में सेंटर हैं, जिसमें 194 से अधिक क्लास रूम हैं।
बताया जाता है कि फिटजी ग्रुप बच्चों को राष्ट्रीय और प्रदेश के इंजीनियरिंग कालेजों में प्रवेश परीक्षा की तैयारी कराई जाती है। संस्थान से प्रावीण्य सूची (टापर) के विद्यार्थियों को फीस में छूट देना बताया जाता था, लेकिन उन विद्यार्थियों से भी फीस ली जाती थी।
इस कोचिंग इंस्टीटयूट की एक साल की फीस लगभग एक लाख रुपये है।कुछ विद्यार्थियों से पचास से लेकर सत्तर हजार रुपये भी लिए जाते हैं।
आयकर विभाग ने फिटजी और मयूर, संदीपनि चेरीटेवल ट्रस्ट से काफी मात्रा में दस्तावेज बिल-बुक, आधा दर्जन पास-बुक बरामद किए हैं। इसके साथ ही आधा दर्जन लाकरों के भी दस्तावेज मिले हैं।
साधु के वेश में चित्रकूट में रह रहा था मालेगांव विस्फोट का प्रमुख आरोपी
साधु के वेश मालेगांव विस्फोट का प्रमुख आरोपी मध्य प्रदेश के सतना से पकड़ा गया है
भोपाल 18 दिसम्बर 2012। पुलिस ने बताया कि आरोपी चित्रकूट के एक मंदिर से साधुवेश में रह रहा था। सतना पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंप दिया है।
पुलिस अधिकारियों ने मंगलवार 18 दिसंबर को भोपाल में बताया कि पकड़े गए आरोपी की पहचान धनसिंह के रूप में हुयी है। वह इंदौर जिले के देपालपुर का निवासी है। सूत्रों ने बताया कि वह भेष बदल कर चित्रकूट में साक्षी कुंड में लखनदास महाराज उर्फ लखनदास बाबा उर्फ रामलखन के नाम से रह रहा था।
साक्षी कुंड कामतानाथ की परिक्रमा करने के दौरान पड़ता है। चित्रकूट जाने के बाद धनसिंह ने लखनदास महाराज के नाम से अपना हुलिया बदल लिया था तथा दाढ़ी-बाल बढ़ाकर साधुवेश में रहने लगा था।
उन्होंने बताया कि लखनदास बाबा को सतना पुलिस ने एनआई की सूचना पर सोमवार तड़के गिरफ्तार किया. प्राथमिक पूछताछ में आरोपी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया है. उसने माना है कि वह मालेगांव बम विस्फोट में शामिल था।
लखनदास बाबा द्वारा जुर्म कबूल करने के बाद पुलिस ने शाम तक उसे एनआईए को सौंप दिया।
उल्लेखनीय है कि समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट मामले में एनआईए ने दो दिन पहले उज्जैन से दशरथ गारी उर्फ दशरथ चौधरी उर्फ समंदर सिंह को गिरफ्तार किया था. उस पर पांच लाख रुपये का इनाम घोषित था।
दशरथ ने ही एनआईए की पूछताछ में लखनदास बाबा के बारे में जानकारी दी थी. बताया जाता है कि दशरथ ने और भी कई राज एनआईए की पूछताछ में उगले हैं।
पुलिस के अनुसार लखनदास बाबा ने पूछताछ में बताया कि वह मालेगांव विस्फोट की योजना में शामिल था, जिसके बाद फरारी काटने के लिए चित्रकूट आ गया। तब से वह चित्रकूट में ही रह रहा था।
में चित्रकूट में रह रहा था मालेगांव विस्फोट का प्रमुख आरोपी
भोपाल 18 दिसम्बर 2012। पुलिस ने बताया कि आरोपी चित्रकूट के एक मंदिर से साधुवेश में रह रहा था। सतना पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंप दिया है।
पुलिस अधिकारियों ने मंगलवार 18 दिसंबर को भोपाल में बताया कि पकड़े गए आरोपी की पहचान धनसिंह के रूप में हुयी है। वह इंदौर जिले के देपालपुर का निवासी है। सूत्रों ने बताया कि वह भेष बदल कर चित्रकूट में साक्षी कुंड में लखनदास महाराज उर्फ लखनदास बाबा उर्फ रामलखन के नाम से रह रहा था।
साक्षी कुंड कामतानाथ की परिक्रमा करने के दौरान पड़ता है। चित्रकूट जाने के बाद धनसिंह ने लखनदास महाराज के नाम से अपना हुलिया बदल लिया था तथा दाढ़ी-बाल बढ़ाकर साधुवेश में रहने लगा था।
उन्होंने बताया कि लखनदास बाबा को सतना पुलिस ने एनआई की सूचना पर सोमवार तड़के गिरफ्तार किया. प्राथमिक पूछताछ में आरोपी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया है. उसने माना है कि वह मालेगांव बम विस्फोट में शामिल था।
लखनदास बाबा द्वारा जुर्म कबूल करने के बाद पुलिस ने शाम तक उसे एनआईए को सौंप दिया।
उल्लेखनीय है कि समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट मामले में एनआईए ने दो दिन पहले उज्जैन से दशरथ गारी उर्फ दशरथ चौधरी उर्फ समंदर सिंह को गिरफ्तार किया था. उस पर पांच लाख रुपये का इनाम घोषित था।
दशरथ ने ही एनआईए की पूछताछ में लखनदास बाबा के बारे में जानकारी दी थी. बताया जाता है कि दशरथ ने और भी कई राज एनआईए की पूछताछ में उगले हैं।
पुलिस के अनुसार लखनदास बाबा ने पूछताछ में बताया कि वह मालेगांव विस्फोट की योजना में शामिल था, जिसके बाद फरारी काटने के लिए चित्रकूट आ गया। तब से वह चित्रकूट में ही रह रहा था।
में चित्रकूट में रह रहा था मालेगांव विस्फोट का प्रमुख आरोपी
बिजली शिकायतें दर्ज करवाने टोल-फ्री नम्बर शुरू
भोपाल 17 दिसम्बर 2012। मध्यप्रदेश मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कम्पनी ने उपभोक्ताओं की बिजली शिकायतें दर्ज करने के लिये टोल-फ्री नम्बर शुरू किया है। उपभोक्ता को सेंट्रल कॉल-सेंटर में अपना नाम अथवा सर्विस कनेक्शन बताने मात्र से ही शिकायत दर्ज हो जायेगी। गैर-उपभोक्ता भी कॉल-सेंटर में फोन कर बिजली संबंधी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। उपभोक्ता के यहाँ यदि बिजली चली गई है अथवा कोई और शिकायत भी है तो सेंट्रल कॉल-सेंटर के टोल-फ्री नम्बर 18004203300 पर फोन किया जा सकता है। कम्पनी ने उपभोक्ताओं से अपील की है कि अच्छी सेवा के लिये इसका लाभ उठायें।
कम्पनी ने बिजली शिकायतों को दर्ज करने तथा इनका तेजी से निपटारा करने के उद्देश्य से सेंट्रल कॉल-सेंटर में टोल-फ्री नम्बर शुरू किया है। कम्पनी कार्यक्षेत्र के सभी 16 जिलों के उपभोक्ता टोल-फ्री नम्बर 18004203300 पर अपनी बिजली संबंधी शिकायतें दर्ज करवा सकते हैं। कम्पनी क्षेत्र के भोपाल, विदिशा, रायसेन, सीहोर, होशंगाबाद, हरदा, राजगढ़, बैतूल, ग्वालियर, गुना, अशोकनगर, दतिया, शिवपुरी, श्योपुर, मुरैना तथा भिण्ड जिले में यह व्यवस्था की गई है।
कॉल-सेंटर में की जाने वाली शिकायत
सेंट्रल कॉल-सेंटर में उपभोक्ता नये कनेक्शन, कनेक्शन का लोड कम या ज्यादा करना, मीटर रीडिंग दर्ज करना, बिजली बंद होना, मीटर की खराबी, कनेक्शन काटने एवं जोड़ने के मामले, बिजली चोरी, वोल्टेज में उतार-चढ़ाव, स्ट्रीट लाइट, ट्रांसफार्मर में चिन्गारी निकलने, विद्युत दुर्घटना, बिलिंग आदि शिकायतें अथवा जानकारी भी दर्ज करवा सकते हैं। साथ ही ग्रामीण क्षेत्र के उपभोक्ता गाँव और खेत के फेल ट्रांसफार्मर की सूचना दे सकेंगे। इसके लिये उन्हें डी.पी. में पेंट किया 10 अंकों का नम्बर बताकर टोल-फ्री नम्बर पर देना होगा।
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