Monday, August 30, 2010

Now, a restroom to give instant health check

Now, a restroom to give instant health check


27 August 2010



eHealth Bureau

An 'Intelligence Toilet' that provides instant health check up has been developed in Japan. Every time a user answer a call of nature, this high-tech loo analyses their urine, blood pressure, temperature and weight, reports the Sun.

Over a couple of seconds it produces a well-being report, which is displayed on a wall-mounted screen. This data can further be transferred to the user's computer and sent to their doctor for reference.

Made by Toto, the so-called Intelligence Toilet is the latest high-tech convenience that has been made in Japan. The Intelligence Toilet is capable of storing the data of up to five different people and retails for 3,800 pound.

नए प्रेस कानून की तैयारी -लाजपत आहूजा


नए प्रेस कानून की तैयारी -लाजपत आहूजा
(लेखक मध्यप्रदेश सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में अतिरिक्त संचालक)
प्रेस कानून बदलने का वक्त करीब आ रहा है। भोपाल में पिछले दिनों हुई एक संगोष्ठी में यह बिंदु पूरी गंभीरता से उठा था कि आजादी के छह दशक के बाद स्वतंत्र भारत में समाचार पत्र-पत्रिकाओं का नियमन अब भी जिस अधिनियम से हो रहा है, वह प्रेस और पुस्तक पंजीकरण अधिनियम वर्ष 1867 का है। अंग्रेजकाल के अधिनियम की धाराओं में भी सामान्य परिवर्तन के अलावा कुछ खास नहीं बदला गया है। पिछले 27 वर्षों में तो इसमें नाममात्र का भी परिवर्तन नहीं हुआ है। अब यह सुयोग बना है कि रायों के सूचना मंत्रियों के पिछले माह दिल्ली में हुए सम्मेलन में नए प्रेस अधिनियम के प्रारूप पर विचार हुआ है। इसे नए नाम से और नए सिरे से प्रारूप तैयार करने की वर्षों पुरानी, अपेक्षा पूरी होने की दशा में देरी से ही सही, ठोस कदम उठा है। प्रस्तावित अधिनियम के प्रारूप की कमियां विचार-मंथन से दूर की जा सकती है।
हमारे देश में किसी भी समाचार-पत्र या अन्य नियतकालिक पत्र-पत्रिका के प्रकाशन के पूर्व की औपचारिकताएं इस अखिल भारतीय अधिनियम के अंतर्गत ही आती है। शीर्षक आवंटन से लेकर उसके रजिस्ट्रेशन और नियमितता संबंधी प्रक्रिया का ब्योरा इसमें है। पूरे देश के लिए समाचार-पत्रों का एक ही पंजीयक होता है। मूल रूप से अंग्रेजों के बनाए हुए इस कानून के अंतर्गत पंजीयक का प्रचलित नाम 'आरएनआई' है। 1867 में प्रेस की जानकारी रखने के लिए सर्वप्रथम यह कानून बनाया गया था। बाद में प्रेस को दबाने के लिए वायसराय लायटन के समय 1878 का बदनाम वर्नाकुलरप्रेस प्रेस एक्ट बना। भाषाई समाचार-पत्रों को दबाने के लिए लाया गया यह कानून इंग्लैंड में सत्ता परिवर्तन के बाद 1881 में रद्द किया गया और 1867 वाले कानून को ही जारी रखा गया।
स्वतंत्र भारत में समाचार पत्रों के नियमन में भी यह कानून सफल रहा, इसमें संदेह के कई कारण है। समाचार-पत्रों के प्रकाशन की अगंभीर बढ़त, अपात्रों का प्रकाशन कर्म और ऊटपटांग शीर्षकों के लिए बहुत हद तक मौजूदा कानून को ही जिम्मेदार माना जाता है। इसलिए इस अधिनियम का फिर से प्रारूप तैयार करने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। वर्ष 1952 में बने प्रथम प्रेस आयोग ने इस अधिनियम के बारे में विचार किया था। आयोग की कुछ सिफारिशों को लागू भी किया गया। समाचार पत्रों के लिए रजिस्ट्रार की नियुक्ति इन सिफारिशों में से एक थी। 1978 में बने द्वितीय प्रेस आयोग ने भी कई सुझाव दिए। इन्हें अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। इनमें से कुछ परिभाषाएं आदि अब नए प्रारूपमें ली गई है। हालांकि उनमें नई व्याख्याएं भी है। नए कानून को द प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ पब्लिकेशंस एक्ट का नाम दिया जाएगा। बुक्स (किताओं) को इस अधिनियम की परिधि से बाहर करना प्रस्तावित किया गया है। सभी नियतकालिकों को प्रकाशनों (पब्लिकेंशन) में समाहित करते हुए समाचार पत्र, पत्रिका, जर्नल, न्यूज लेटर को अलग-अलग परिभाषित किया गया है। शीर्षक सत्यापन का नया प्रावधान इसमें शामिल किया गया है। इसके तहत अवयस्क, संज्ञेय अपराधों में सजायाफ्ता और जो भारत का नागरिक नहीं हैं, वे कोई प्रकाशन नहीं कर पाएंगे। प्रसार संख्या के सत्यापन के लिए भी वैधानिक प्रावधान किए गए हैं।
प्रस्तावित नए प्रेस कानून में संपादक की परिभाषा में शैक्षणिक योग्यता को जोड़ा गया है। वर्तमान अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था। यह एक अच्छा प्रावधान है, लेकिन इसे प्रस्तावित संशोधनों में स्पष्ट नहीं किया गया है। शीर्षकों के सत्यापन नाम से नया प्रावधान किया गया है। इस धारा में शीर्षकों का सोद्देश्य और अर्थपूर्ण होना भी जोड़ा जाना चाहिए। प्रस्तावित अधिनियम के उल्लंघन पर आर्थिक दंड बढ़ाया गया है।
आशा की जा सकती है कि नए प्रेस कानून की सूरत और सीरत प्रेस और देश के लिए शुभ होगी। प्रेस संबंधी मौजूदा परिदृश्य के दृष्टिगत तीसरे प्रेस आयोग की स्थापना के लिए भी यह उपयुक्त समय है।

भोपाल lake

गणेश vandana

Tuesday, August 24, 2010

Jimena Navarrete crowned Miss Universe 2010


Miss Mexico Jimena Navarrete wins Miss Universe pageantBy Rick Porter
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August 23, 2010 11:12 PJimena Navarrete of Mexico is the 2010 Miss Universe.

She won the title Monday night (Aug. 23) during NBC's live broadcast of the pageant in Las Vegas. Miss Jamaica Yendi Philipps was the first runner-up; Miss Australia Jesinta Campbell, Miss Ukraine Anna Poslavska and Miss Philippines Venus Raj -- who was the online favorite -- rounded out the top five.

Navarrete takes over as Miss Universe from Stefania Fernandez, who won last year's pageant representing Venezuela.

Navrrete had the second-highest score among the top 15 (behind Philipps) in the swimsuit portion of the competition and was the top scorer after the evening-gown portion.

All five finalists handled their interview question pretty well. Judge Evan Lysacek asked Navarrete about the effect of unsupervised Internet use on young people. She answered that while the Internet is an "indispensable tool," adults should be watchful about what their kids are seeing online.

Campbell was given the Miss Congeniality award by her fellow contestants, while Miss Thailand Fonthip Watcharatrakul won both Miss Photogenic and the favorite national costume award.

"Today" co-host Natalie Morales and "Celebrity Apprentice" winner Bret Michaels hosted the broadcast.
M

गजल का भी हो रिएलिटी शो : जगजीत सिंह

इंदौर। दिल के बहुत करीब रहने वाले अहसास को छू लेने वाली आवाज के मालिक जगजीत सिंह गायकी के ठेठ हिंदुस्तानी रूपों के लगातार गुमनाम होते जाने से फिक्रमंद हैं। उन्होंने सुझाया है कि फिल्मी गीतों के साथ गजल और ठुमरी का भी रियलिटी शो होना चाहिए, ताकि ये गायन विधाएं फिर मशहूर हो सकें।

एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने यहां आए जगजीत ने कहा, 'गजल और ठुमरी का भी रिएलिटी शो होना चाहिए, ताकि पारंपरिक गायन विधाओं को प्रचार मिल सके। खोई ख्याति पाने के लिए गजल को प्रचार के जरिए की जरूरत है।'

जगजीत मानते हैं कि जीवनशैली और सुनने-समझने का मिजाज बदलने से गजल गायकी की ओर लोगों का रुझान कम होता जा रहा है।

69 वर्षीय गजल गायक ने कुछ तल्ख लहजे में कहा, 'ज्यादातर नौजवान गजल सीखना ही नहीं चाहते। वे तो रातों-रात स्टार बनना चाहते हैं, लेकिन उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि इस तरह मिली कामयाबी रातों-रात खो भी जाती है।'

हिन्दुओं ने खोल दिए दिल के दरवाजे


पिछले एक सदी के भयंकर बाढ़ से जूझ रहे पाकिस्तान ने भले ही भारत की पांच मिलियन डॉलर की सहायता लेने में आनाकानी की हो लेकिन यहां के हिंदू समुदाय ने संकट की इस घड़ी में मुसलमान भाइयों की ऐसी मदद की है जिसने नफरत की राजनीति करनेवाले पाकिस्तान के हुक्मरानों की आंखें खोल दी है। बाढ़ प्रभावित इलाके में हिंदू समुदाय के लोग जहां आर्थिक सहायता दे रहे है, वहीं रमजान के महीनें में लोगों को सहरी और रोजा खोलने के वक्त खाना बनाकर भी ला रहे है। हिंदुओं के इस भावना से पाकिस्तान के दछिणपंथी राजनीति करने वाले नवाज शरीफ भी खासे प्रभावित हो गए है। वे अपने भाषणों में हिंदुओं की जोरदार तारीफ कर रहे है।

सिंध में हिंदू समुदाय की संख्या काफी है। सक्खर, जैकोबाबाद, कराची में हिंदू खासी संख्या में है। इनके हाथ में व्यापार है। अच्छा पैसा भी है। कुछ जमींदार हिंदू भी है। जिसमें भारत के पूर्व विदेश मंत्री और भाजपा नेता जसवंत सिंह के चचेरे भाई भी शामिल है। सिंध के कई जिले इस समय बाढ़ से तबाही के शिकार हो गए। इस मौके पर हिंदू समुदाय के लोग खुलकर मुसलमानों की मदद करने को आगे आए है। सिंध के सक्खर में हिंदू परिवार की महिलाएं नियमित रुप से अपने घरों में खाना बनाकर बाढ़ प्रभावित लोगों को मदद की है।

पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस राणा भगवान दास भी बाढ़ प्रभावित लोगों को मदद करने के लिए जीतोड़ मेहनत कर रहे है। और तो और सरकार पर लगे आरोपों को देखते हुए बाढ़ राहत कार्य के लिए बनाए गए कमिशन में भी राणा भगवान दास को रखा गया है। नवाज शरीफ जब खुद सक्खर पहुंचे तो इस भावना को देख उसकी प्रशंसा करने से नहीं चुके। टीवी चैनलों पर हिंदू समुदाय के लोगों को धन्यवाद दिया। गौरतलब है कि इस समय बाढ़ से से तबाही के बाद पाकिस्तान में सरकारी सहायता नाममात्र की है। सरकार को लोग दान देने से भी गुरेज कर रहे है। लोगों का कहना है कि बाढ़ पीड़ितों तक पैसा पहुंचेगा या नहीं इसकी गारंटी नहीं है। इसलिए एनजीओ को पैसे देने में कोई गुरेज उन्हें नहीं है।

लाहौर के अमीर हिंदू परिवार के महिला-पुरूष भी बाढ़ पीडितों के लिए जोरदार काम कर रहे है। लाहौर के अमीर हिंदुओं में से एक हर्ष मेहरा की बहन पिछले कुछ दिनों से स्वात घाटी में है। नौशेरा जिले में बाढ़ पीड़ितों के लिए काम कर रही है।हर्ष मेहरा के अनुसार उनकी बहन एक एनजीओ के साथ है। वे पिछले कुछ दिनों से स्वात में ही है। हर्ष मेहरा के अनुसार सरकार पर लोगों को भरोसा नहीं है। अमेरिकी सहायता भी शायद एनजीओ के माध्यम से बंटे। इस समय अमेरिका से सहायता प्राप्त लगभग १०० एनजीओ के कार्यालय सिंध, पंजाब और खैबर पख्तूनखवा राज्य में खुल चुके है।

दिलचस्प बात है कि बाढ़ को लेकर राजनीति शुरू हो गई है। कई कट्टर संगठनों से संबंधित लोग इसके लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा रहे है। पर कई लोग खुलकर मौलाना राजनीति का विरोध कर रहे है। ग्रीन सर्कल आर्गेनाइजेशन के हेड और लाहौर में रहने वाले राणा शफीक के अनुसार भारत को ही हर चीज के लिए दोषी ठहराने की जरूरत नहीं है। अगर भारत ने बाढ़ नियंत्रण के लिए डैम बनाए तो पाकिस्तान को क्या समस्या है। पाकिस्तान को भी बाढ़ नियंत्रण के लिए समय पर डैम बनाना चाहिए था। इससे बा़ढ़ की नौबत ही नहीं आती। अब अगर बाढ़ आयी है तो अपनी गलती को देखने के बजाए भारत को दोष दे रहे है।

उधर प्राइवेट संगठनों में जनता का सबसे ज्यादा विश्वास ईदी फाउंडेशन और पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी इमरान खान पर है। लाहौर शहर में सारे राजनीतिक दलों ने कैंप लगा रखे है। पर लोगों के डोनेशन के सामान इमरान खान के कैंप में ही ज्यादा नजर आता है। उनकी पार्टी के कैंप में खासे लोग दान देने के लिए पहुंच रहे है। वहीं अब्दुल सतार ईदी का ईदी फाउंडेशन पर भी लोगों को काफी विश्वास है। वहां भी लोग दान के रुप में पैसे और अन्य सामान दे रहे है। हालांकि इस बाढ़ का एक और प्रभाव बाद में दिखेगा। जमाए-ए-इस्लामी, जमात-उल-दवा, तालिबान ने हर जगह कैंप खोल दिए है और सरकार को फेल बताने से नहीं चुक रहे है। इससे काफी सारे लोग कट्टरपंथी संगठनों की तरफ झुक सकते है, इससे नुकसान पाकिस्तान को होगा।

Monday, August 23, 2010

135 किलोमीटर तक अविरल रहेगी गंगा की धारा


आखिरकार जीडी का अनशन सफल हुआ. गोमुख से उत्तरकाशी तक गंगा की धारा अब अविरल रहेगी और इस पर किसी प्रकार की बिजली परियोजना स्थापित नहीं की जा सकेगी. सरकार ने लोहारी नागपाला पनबिजली परियोजना पर काम को पूरी तरह से रोक दिया है. इसके साथ ही गोमुख से उत्तरकाशी तक 135 किलोमीटर के क्षेत्र को अति संवेदनशील घोषित किया गया है.

गंगा की सफाई और उसके अविरल निर्मल प्रवाह पर छिड़े आंदोलन के चलते केंद्र सरकार ने छह सौ मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए लोहारी-नागपाला पर चल रहा काम पिछले साल जून में रोका था। आंदोलन के धीमे पड़ते ही दोबारा काम शुरू हो गया था। जिसके बाद पर्यावरणविद प्रो. जीडी अग्रवाल गंगा को बचाने के लिए एक बार फिर हरिद्वार में अनशन पर बैठ गये थे। धरने के बाद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने करोड़ों लोगों की गंगा में आस्था का सवाल उठाते हुए तीन अगस्त को प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा था जिसके बाद आखिरकार इस परियोजना को समाप्त कर दिया गया. इस फैसले से सार्वजनिक उपक्रम नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन (एनटीपीसी) की छह सौ करोड़ रुपए से भी ज्यादा की पूंजी बट्टे-खाते में जानी है। अब तक हुए काम को स्थानीय पारिस्थतिकी के लिहाज से हटाने में व पूरी साफ-सफाई में करोड़ों के नए खर्च की योजना अभी बननी है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को भेजे अपने पत्र में लिखा है कि हमारी सरकार गंगा के अतिरिक्त उपलब्ध जल पर लघु जल-विद्युत परियोजना की पक्षधर है। जनभावना और पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिगत प्रदेश सरकार ने दो जल-विद्युत परियोजनाएं पाला-मनेरी एवं भैरो घाटी को डेढ़ साल पहले स्थगित कर दिया था। लोहारी नागपाला योजना में गंगा विलुप्त होकर 16 किलोमीटर लंबी टनल के माध्यम से गुजरेगी जो जनविश्वास और भावनाओं के अनुरूप नहीं होगी और न पर्यावरणीय दृष्टी से ही इसे उपयुक्त माना जा सकता है।

पर्यावरण रक्षा से जुड़े लोगों, विद्वानों, हिंदू नेताओं और स्थानीय निवासियों ने भी गंगा के धार्मिक महत्त्व और बड़े बांधों से होने वाले नुकसान पर प्रधानमंत्री व वित्त मंत्री तक फरियाद की। आखिर वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, बिजली मंत्री सुशील कुमार शिंदे और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने तय किया कि लोहारी नागपाला जल परियोजना पर काम रोक दिया जाए और पर्यावरण भौगोलिक संतुलन के लिहाज से एक तकनीकी समिति बांध पर अब तक हुए निर्माण को हटाए।

राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद मुक़दमे से जुड़े


इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जज न्यायमूर्ति पलोक बसु ने विवादित राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद मुक़दमे से जुड़े लोगों से मुलाकात करके एक बार फिर इस बात की कोशिश शुरू की है कि इस जटिल विवाद को स्थानीय लोग आपसी बातचीत से सुलझा लें।

हाईकोर्ट की अयोध्या प्रकरण विशेष पीठ साठ साल से लंबित इस मुकदमे का सितंबर महीने के आखिर में फैसला सुनाने वाली है। जस्टिस पलोक बसु का कहना है कि अदालती फैसला आने के बाद देश के हालात बिगड़ सकते हैं, इसलिए वे पिछले कुछ समय से अयोध्या आकर इस मसले का स्थानीय स्तर पर हल निकालने की संभावनाएँ तलाश रहे हैं।

जस्टिस बसु ने इस दौरे में मुख्य रूप से मुसलमानों के सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से मुकदमे के मुख्य पक्षकारों हाजी हाशिम अंसारी और हाजी महबूब और राम जन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास से भेंट की।

पिछले दौरे में वो हिंदुओं की ओर से विवादित भूमि के मुख्य दावेदार निर्मोही अखाड़ा के सरपंच महंत भास्कर दास से मिले थे। लेकिन कोई भी पक्ष इस बातचीत को अभी बहुत गंभीरता से नहीं ले रहा है क्योंकि इससे पहले कई दौर की वार्ताएँ विफल हो चुकी हैं।

हाशिम अंसारी का कहना है कि बाबरी मस्जिद का मामला अब केवल अयोध्या के मुसलमानों का मसला नहीं रहा। अगर अयोध्या के मुसलमान कोई समझौता कर भी लें तो उसे सुन्नी वक्फ बोर्ड और मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड नहीं मानेगा। वही निर्मोही अखाड़ा के एक प्रमुख संत राम दास का कहना है कि अब जब हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई है, जस्टिस पलोक बसु की कोशिश का कोई मतलब नहीं है।

फिर भी जस्टिस बसु कहते हैं, 'मैं अब अभी बहुत आशावान हूँ कि स्थानीय लोग मिल बैठकर मसला हल कर सकते हैं।' यह कहकर जस्टिस बसु अपने घर इलाहाबाद के लिए रवाना हो गए।

छत्तीसगढ़ में बिलासा एक देवी के रुप में देखी जाती



सलमान रावी (रायपुर)


BBCछत्तीसगढ़ में बिलासा एक देवी के रुप में देखी जाती हैं। कहते हैं कि उनके ही नाम पर बिलासपुर शहर का नामकरण हुआ। बिलासा केवटिन की एक आदमकद प्रतिमा भी शहर में लगी हुई है और उसी छत्तीसगढ़ में बिलासा ब्रांड की एक शराब बन और बिक रही है।

हालाँकि ये ब्रांड पाँच साल से भी ज्यादा समय से सारे सरकारी शराब ठेकों पर उपलब्ध है, लेकिन अब इसे लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है। केवट समाज इसे अपना अपमान बता रहा है और विपक्षी दल कांग्रेस ने भी इसका विरोध किया है।

इसके बाद छत्तीसगढ़ के आबकारी मंत्री और बिलासपुर के विधायक अमर अग्रवाल ने आश्वासन दिया है कि सरकार उचित कार्रवाई करेगी।

बिलासा केवटिन : बिलासपुर राज्य की न्यायधानी कही जाती है क्योंकि छत्तीसगढ़ का उच्च न्यायालय यहीं स्थित है। इस शहर के मध्य में है बिलासा चौक जहाँ बिलासा केवटिन की एक आदमकद प्रतिमा खड़ी है।

बिलासपुर के ही सोमनाथ यादव इतिहास बताते हुए कहते हैं, 'बिलासा देवी एक वीरांगना थीं। सोलहवीं शताब्दी में जब रतनपुर छत्तीसगढ़ की राजधानी हुआ करती थी तो राजा कल्याण सहाय बिलासपुर के पास शिकार करते हुए घायल हो गए थे। उस समय बिलासा केवटिन ने उन्हें बचाया था। इससे खुश होकर राजा ने उन्हें अपना सलाहकार नियुक्त करते हुए नदी किनारे की जागीर उनके नाम लिख दी थी।'

सोमनाथ का कहना है कि स्थानीय लोक गीतों में भी बिलासा देवी का गुणगान किया जाता है।

बिलासा देवी के लिए छत्तीसगढ़ के लोगों में, खासकर केवट समाज में, बड़ी श्रध्दा है और इसका एक सबूत यह भी है कि छत्तीसगढ़ की सरकार हर वर्ष मत्स्य पालन के लिए बिलासा देवी पुरस्कार भी देती है। मगर बिलासा नाम से एक स्थानीय शराब का ब्रांड सरकारी शराब के ठेकों पर बिक रहा है। इस ब्रांड के शराब का निर्माण बिलासपुर में ही हो रहा है।

अधिकारियों का कहना है कि यह ब्रांड पाँच साल से अधिक समय से बाजार में है। लेकिन अब इस ब्रांड को लेकर विरोध प्रदर्शन होने शुरू हो गए हैं।


BBCविरोध : जहाँ राज्य का केवट समाज शराब के ब्रांड को लेकर गुस्से में है वहीं कला और संस्कृतिकर्मी भी इसे लेकर नाराज हैं पिछले दिनों केवट समाज ने बिलासपुर में एक रैली निकली और प्रशासन को एक ज्ञापन देकर शराब का लेबल बदलने की माँग की है।

केवट समाज के प्रवक्ता किशनलाल केवट कहते हैं, 'बिलासा केवटिन हमारे समाज के लिए एक आराध्य देवी हैं और उनके नाम से शराब का ब्रांड पूरे समाज का अपमान है।' वे कहते हैं, 'हम इसका विरोध कर रहे हैं और हम आंदोलन और तेज करेंगे।'

छत्तीसगढ़ी लोक कला और संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था 'बिलासा कला मंच' ने भी शराब के इस ब्रांड के मुद्दे को लेकर आंदोलन छेड़ रखा है।

मंच के अध्यक्ष सोमनाथ यादव का कहना हैं, 'इस पर तब और ज्यादा अफसोस होता है जब राज्य के आबकारी मंत्री और विधानसभा के अध्यक्ष बिलासपुर के ही हों। हमने आबकारी मंत्री से मुलाकात की है और अपना विरोध दर्ज करते हुए उन्हें एक ज्ञापन भी सौंपा है।'

अब इस मुद्दे को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शन पर राजनितिक रंग भी चढ़ने लगा है। विधानसभा में विपक्ष के नेता रविंद्र चौबे ने हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा सत्र के दौरान इस मुद्दे को उठाया था।

बीबीसी से बात करते हुए चौबे ने कहा, 'क्या मजाल है कोई शराब का व्यापारी छत्तीसगढ़ के लोगों की आस्था से खेल करे अगर उसे सरकार का समर्थन प्राप्त न हो। एक तरफ सरकार बिलासा देवी पुरस्कार देती है। दूसरी तरफ उनके नाम से शराब का ब्रांड सरकारी ठेकों से बिक रहा हो तो यह किसका दुर्भाग्य है?'

विपक्ष के नेता चाहे जो कहें लेकिन इस ब्रांड को स्वीकृति तब मिली थी जब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार थी।

बिलासपुर से भाजपा के विधायक और राज्य के आबकारी मंत्री अमर अग्रवाल कहते हैं, 'इस ब्रांड को स्वीकृति तब मिली थी जब हमारी सरकार नहीं थी। अब यह मामला मेरे पास आया है। मैं इसकी जाँच करा रहा हूँ। जाँच के बाद कार्रवाई होगी। वैसे आम लोगों कि भावना है कि बिलासा नाम से शराब का ब्रांड नहीं होना चाहिए, इस भावना को ध्यान में रखा जाएगा।'

लेकिन शराब पीने वालों का क्या। वो लेबल देखकर नहीं बल्कि सुरूर के लिए शराब पीते हैं। लिहाजा बिलासा विस्की बाजार में अभी भी बिक रही है।

न्यू दिल्हे games

Friday, August 20, 2010

मध्य प्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष हरवंश सिंह को गुरुवार रात दिल का दौरा पड़ने के बाद यहां के ए

भोपाल।। मध्य प्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष हरवंश सिंह को गुरुवार रात दिल का दौरा पड़ने के बाद यहां के ए
क अस्पताल में दाखिल कराया गया।

सिंह के पारिवारिक सूत्रों के अनुसार कल उन्हें सीने में दर्द और घबराहट के बाद भोपाल मेमोरियल अस्पताल में भर्ती कराया गया।

सिंह का इलाज कर रहे चिकित्सकों ने बताया कि भर्ती कराने के बाद कल ही उनकी एंजियोप्लास्टी कर दी गई। उनकी हालत स्थिर बनी हुई है लेकिन उन्हें अभी भी इंटेंसिव केयर यूनिट में रखा गया है। डा। स्कंद त्रिवेदी ने उनकी एंजियोप्लास्टी की।

इंदौर में स्वाइन फ्लू से हुई चौथी मौत

इंदौर।। मध्य प्रदेश के इंदौर में स्वाइन फ्लू से मौतों का सिलसिला जारी है। इस बीमारी से 22 साल की महिला
की मौत की पुष्टि के बाद इस मॉनसून में शहर में एच1एन1 वायरस से मरने वालों की संख्या बढ़कर चार हो गई।

स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त संचालक डॉ. शरद पंडित ने शुक्रवार को बताया कि इस महिला ने शहर के एक प्राइवेट अस्पताल में 18 अगस्त को दम तोड़ा था। वह प्रदेश के खंडवा जिले की रहने वाली थी। उन्होंने बताया कि स्वाइन फ्लू के संदिग्ध लक्षणों के चलते उसके स्वाब नमूने जांच के लिए जबलपुर स्थित प्रयोगशाला भेजे गए थे। जांच रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि वह एच1एन1 वायरस से संक्रमित थी।

bhopal 20AUG 2010

तीन गुनी बढ़ी सैलरी, सांसद मांगें मोर


नई दिल्ली।। कैबिनेट ने सांसदों की
सैलरी में तीन गुना बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है , लेकिन कई सांसद इससे खुश नहीं हैं। आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव और समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव समेत कई सदस्यों ने इस पर संसद में जमकर हंगामा किया। इससे लोकसभा की कार्यवाही दोपहर तक स्थगित करनी पड़ी। इसके बाद लालू - मुलायम दोबारा सैलरी में बढ़ोतरी को लेकर संसद में धरने पर बैठ गए।

इससे पहले कैबिनेट ने न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल को भी अपनी मंजूरी दे दी थी। बीजेपी की आपत्ति पर न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल में कुछ संशोधन किया गया। इसके साथ ही कैबिनेट ने सांसदों की सैलरी में बढ़ोतरी को भी मंजूरी दे दी है। सांसदों की सैलरी में 300% की बढ़ोतरी हुई है। अभी सांसदों का वेतन 16 हजार रुपये है। बढ़ोतरी के बाद यह 50 हजार रुपये हो जा


वेतन में इतनी बढ़ोतरी से भी सांसद खुश नहीं हैं। आरजेडी के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने इसे उम्मीद से कम बताया है। वेतन बढ़ोतरी के मुद्दे पर सांसदों ने जमकर हंगामा किया। इससे संसद की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।

गौरतलब है कि इस मुद्दे पर मंत्रियों के बीच मतभेदों को लेकर ऐसी अटकलें लगाई जा रही थीं कि सांसदों के वेतन में वृद्धि संबंधी फैसला आने में देर होगी। लेकिन शुक्रवार को कैबिनेट ने सांसदों की बेसिक सैलरी 16 हजार से बढ़ाकर 50 हजार रुपये करने को अपनी मंजूरी दे दी। हालांकि यह बढ़ोतरी संसदीय समिति की सिफारिशों से काफी कम है जिसने कहा था कि सांसदों को सरकारी सचिवों से अधिक वेतन मिलना चाहिए क्योंकि वे वरीयता क्रम में उनसे ऊपर हैं।

देखें विडियोः सैलरी में सिर्फ तिगुना बढ़ोतरी से नाखुश सांसद, लोकसभा का कामकाज रोका

समिति ने इसे बढ़ाकर 80, 001 रुपये करने की सिफारिश की थी।

ऑफिस खर्च की सीमा भी बढ़ी
सरकारी सूत्रों ने बताया कि सांसदों को प्रति माह मिलने वाले कार्यालय खर्च की सीमा को भी बढ़ाकर 20 हजार रुपये से 40 हजार रुपये कर दिया है। निर्वाचन क्षेत्र भत्ते को भी 20 हजार रुपये से बढ़ाकर 40 हजार रुपये कर दिया गया है।

बिना ब्याज के लोन की लिमिट भी बढ़ी
निजी वाहन खरीदने के लिए सांसदों को मिलने वाले ब्याज मुक्त कर्ज की सीमा को भी चार गुना बढ़ाते हुए एक लाख रुपये से चार लाख रुपये कर दिया गया है। सांसदों के वाहनों का रोड माइलेज रेट भी 13 रुपये प्रति किलोमीटर से बढ़ाकर 16 रुपये प्रति किलोमीटर कर दिया गया है

बीवियों की भी बल्ले - बल्ले
इसका फायदा सांसदों की पत्नियों को भी मिलेगा। सांसदों की पत्नियां अब चाहे जितनी बार फर्स्ट क्लास या इग्जेक्युटिव क्लास में सफर कर सकेंगी। पेंशन लाभ को भी मौजूदा आठ हजार रुपये प्रति माह से बढ़ाकर 20 हजार रुपये प्रति माह किया गया है।

जब लालू बन गए प्रधानमंत्री
हंगामे की वजह से लोकसभा की कार्यवाही स्थगित होने के बाद विरोध कर रहे करीब 70 सांसदों ने लोकसभा के अंदर ही ‘ मॉक सेशन ’ शुरू किया। इस मॉक सेशन के दौरान आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव प्रधानमंत्री बने, सदन में बीजेपी के उपनेता गोपीनाथ मुंडे स्पीकर की भूमिका में थे। मुलायम सिंह के ऊपर सदन का सुचारू ढंग से चलना सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी डाली गई थी। इस मॉक सेशन के दौरान बोलने वालों में बीजेपी सांसद मेनका गांधी भी थीं। बतौर प्रधानमंत्री लालू ने कहा, ‘ मैंने सदन की राय सुन ली है। हम देखेंगे कि कल क्या किया जाना है। ’ बाद में संवाददाताओं से बातचीत करते हुए लालू ने कहा, इस मॉक सेशन में कोई विपक्ष नहीं था क्योंकि यह राष्ट्रीय सरकार थी।

'कुआंरी मां ने पांच हजार में बेचा बच्चा'

तिरुवनंतपुरम. लाज के आगे एक कुआंरी मां की ममता बिक गई। लेकिन बाद में जब ममता जागी तो विवाद हुआ और मां को ही हवालात पहुंचना पड़ा। केरल के तिरुवनंतपुरम में एक 40 वर्षीय अविवाहिता ने पांच हजार रुपए में अपने जिगर के टुकड़े को एक निसंतान दंपति को बेच दिया।

लेकिन मामले की खबर पुलिस को लग गई और आरोपी महिला अंबिका कुमार के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है।

पुलिस के मुताबिक मामले का केरल के प्रतिष्ठित एसएटी अस्पताल की डॉक्टर प्रिया ने अंबिका को कुछ दिन पहले अस्पताल परिसर में दंपति से विवाद करते देखा था। डॉक्टर प्रिया के मुताबिक अंबिका ने एक महीना पहले एक लड़कों को जन्म दिया था लेकिन अविवाहित होने के कारण वो बच्चे को घर नहीं ले जा पा रही थी।

बाद में अस्पताल के एक कर्मचारी की मदद से उसने अपने बच्चों को पांच हजार में बेच दिया। लेकिन बाद में वो अपना बच्चा वापस पाना चाहती थी और इसी बात को लेकर विवाद हो गया।

बाद में पुलिस ने अंबिका के खिलाफ नवजात को बेचने का मामला दर्ज कर लिया। फिलहाल वो जमानत पर रिहा है और नवजात का पालन-पोषण एक अनाथाश्रम में हो रहा है।

आतंकियों का नया एजेंडा, कश्‍मीर को 'मुस्लिम राज्य' बनाना?


नई दिल्ली. कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देने के बाद अब राज्य को 'मुस्लिम सूबा' बनाए जाने की साजिश रची जा रही है। इसके लिए आतंकी संगठन अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए कश्मीर को 'मुस्लिम राज्य' बनाने की कोशिशों में जुट गए हैं। अपने मकसद में कामयाब होने के लिए आतंकी संगठन अल्पसंख्यकों खासकर सिखों को धमकी भरी चिट्ठियां लिख रहे हैं। आतंकियों के निशाने पर घाटी के अल्पसंख्यक समुदाय के सिख हैं। सिख समुदाय के कई सदस्यों को इन दिनों बेनामी चिट्ठियां मिल रही हैं, जिसमें उन्हें धमकी दी जा रही है कि वे 'इस्लाम' कबूल करके कश्मीर में हो रहे विरोध आंदोलन में शामिल हों।

इन चिट्ठियों में कहा गया है कि अगर वे इस्लाम नहीं मंजूर करते हैं और विरोधी आंदोलन में हिस्सा नहीं लेते हैं तो वे घाटी को तुरंत छोड़ दें। इन चिट्ठियों से अल्पसंख्यक सिख समुदाय खौफजदा है, जिनकी घाटी में करीब 60 हजार आबादी है। कश्‍मीर में सिख सबसे बड़ी अल्‍पसंख्‍यक कौम है।
घाटी में सिखों की सुरक्षा का मसला शुक्रवार को संसद में भी उठा। सांसदों ने इसे गंभीर मसला बताते हुए सरकार से हस्‍तक्षेप और सिखों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।

ऑल पार्टी सिख कोऑर्डिनेशन कमेटी के को-ऑर्डिनेटर जगमोहन सिंह रैना के हवाले से मीडिया में आई खबरों में कहा गया है कि सिख आतंकियों के इस मंसूबे को पूरा नहीं होने देंगे। उन्होंने बताया कि एक मीटिंग में इस साजिश के खिलाफ एकजुट रह कर लड़ाई लड़ने का फैसला किया गया है। सिख समुदाय को मिली इन चिट्ठियों में कहा गया है, 'जब तुम यहां सुख भोग रहे हो तो फिर तुम कश्मीरियों की तकलीफ में साथ क्यों नहीं दे रहे हो? हमें पता है कि तुम गोलियों से डरते हो। गुरुद्वारों के बाहर प्रदर्शन करो या फिर कश्मीर को छोड़ दो।' रैना के मुताबिक कुछ चिट्ठियों में इस्लाम को कबूलने की धमकी भी दी गई है।

कश्‍मीरी पंडितों जैसा होगा हाल

जानकार मानते हैं कि ऐसे में कश्‍मीरी पंडितों के बाद अब घाटी से सिखों का पलायन भी शुरू हो सकता है। घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन पिछले बीस सालों में बड़ी संख्या में हुआ है। एक अनुमान के मुताबिक 1990 से अब तक करीब तीन लाख कश्मीर पंडित घाटी छोड़ चुके हैं। इससे साफ है कि कश्मीर में अल्पसंख्यों के लिए हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। हालांकि, अब तक यह साफ नहीं हो पाया है कि ये चिट्ठियां किस आतंकी संगठन की ओर से जारी हुई हैं और उनकी वैधता क्या है।
डरेंगे नहीं

अकाली दल (बादल) की राज्य ईकाई के अध्यक्ष अजीत सिंह मस्ताना ने इन धमकियों को असामाजिक तत्वों की हरकत बताया है। उन्होंने अपने बयान में कहा है कि ऐसी धमकियां हमें न तो तोड़ सकती हैं और न ही मातृभूमि के लिए हमारे प्यार को कम कर सकती हैं। सिख नेताओं ने हुर्रियत के दोनों धड़ों- जेकेएलएफ और पीओके में सक्रिय यूनाइटेड जिहाद काउंसिल से इस मामले को गंभीरता से लेने को कहा है ताकि घाटी में भाईचारे और अमन का माहौल कायम रहे। कट्टर अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने सिख समुदाय को भरोसा दिया है कि वे डरें नहीं और ऐसी 'फर्जी चिट्ठियों' की परवाह न करें।

केंद्र कमान संभाले, तभी होगा कश्‍मीर समस्‍या का हल

dainikbhaskar.com के सर्वे में शामिल आधे पाठकों ने कश्‍मीर में शुक्रवार को पाकिस्‍तानी झंडे लहराने और हिंसा में चार लोगों की मौत के बीच राय दी कि राज्‍य की कमान केंद्र को अपने हाथ में ले लेनी चाहिए।

नई दिल्‍ली. कश्‍मीर में बिगड़े हालात का हल क्‍या है? dainikbhaskar.com के सर्वे में शामिल होने वाले आधे पाठकों के मुताबिक इस सवाल का जवाब यही है कि केंद्र सरकार कश्‍मीर की कमान अपने हाथों में ले। इसका मतलब यह भी निकल सकता है कि राज्‍य सरकार में लोगों का भरोसा नहीं रह गया है। कश्‍मीर में शुक्रवार को एक बार फिर हालात बिगड़ जाने के बीच आए इस सर्वे रिपोर्ट में राज्‍य के लिए स्‍वायत्‍तता का प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का प्रस्‍ताव एकदम खारिज कर दिया गया है।

शुक्रवार को श्रीनगर में अलवावादी नेता मीरवाइज उमर फारूक के नेतृत्‍व में हजारों लोगों ने प्रदर्शन किया। कई प्रदर्शनकारी पाकिस्‍तान का झंडा भी लहरा रहे थे। राज्‍य में दो जगह पुलिस की गोलीबारी में चार लोगों की मौत भी हो गई। जून से अभी तक कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों की फायरिंग में मरने वालों की संख्या 54 हो गई है। मुख्‍यमंत्री उमर अब्‍दुल्‍ला हालात संभाल नहीं पा रहे हैं। शायद इसीलिए dainikbhaskar.com के सर्वे में शामिल 51.80 प्रतिशत पाठकों ने राय दी कि कश्मीर की कमान केंद्र को अपने हाथों में ले लेनी चाहिए। उनके सामने सीधा सवाल रखा गया था कि कश्मीर समस्या का सही हल क्या हो सकता है? हालांकि 33.12 फीसदी पाठक मिला-जुला रास्‍ता अपनाने के हामी दिखे। उनके मुताबिक कश्मीर में विकास कार्य करवाए जाएं और साथ ही गडबड़ी करने वालों से सख्ती से निपटा जाए तो समस्या का हल निकल सकता है।

कश्मीर को स्वायतत्ता देने संबंधी प्रधानमंत्री के प्रस्ताव को तो पाठकों ने एक तरह से खारिज ही कर दिया। प्रधानमंत्री ने इसी सप्‍ताह कश्‍मीर मसले पर सर्वदलीय बैठक की थी और कहा था कि सभी पार्टियों की राय बने तो कश्‍मीर को स्‍वायत्‍तता दी जा सकती है। उनके इस प्रस्‍ताव को ज्‍यादातर राजनीतिक दलों और अलगाववादियों ने तो तत्‍काल खारिज कर दिया था, हमारे पाठकों ने भी नकार दिया। केवल 10.61 फीसदी पाठकों ने कहा कि कश्‍मीर को प्रधानमंत्री के कहे अनुसार स्‍वायत्‍तता दी जानी चाहिए, जबकि स्‍वायत्‍तता दिए बिना ज्‍यादा अधिकार देकर राज्‍य सरकार के हाथ मजबूत करने का विकल्‍प केवल 4.45 फीसदी पाठकों ने स्‍वीकार किया।

कश्मीर में सिखों को मुसलमान बनाने की आतंकी मुहिम


नई दिल्ली. कश्मीर में सिखों पर आफत आ गई है। उन्हें आतंकवादी-अलगाववादियों की ओर से गुमनाम खत मिल रहे हैं। इनमें उनसे इस्लाम कुबूल कर विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने या फिर कश्मीर छोड़ कर चले जाने के लिए कहा जा रहा है। गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने सदन में भरोसा दिलाया है कि कश्मीर के सिखों को डरने की जरूरत नहीं है। वित्ती मंत्री प्रणव मुखर्जी ने भी यही भरोसा दिलाया है। पर सिख सांसद सवाल कर रहे हैं कि सिखों की शहादत क्या इसी दिन के लिए थी? कश्मीर के सिख आतंकियों के इस मंसूबे से लड़ने के लिए एकजुट हो रहे हैं।

आतंकियों ने बदली रणनीति?



कश्मीर में सक्रिय आतंकवादियों और अलगाववादियों ने पहली बार इस तरह सिख समुदाय को निशाना बनाया है। कश्मीर में सिखों की आबादी करीब 60 हजार है। यह राज्य में सबसे बड़ी अल्पसंख्यक कौम है। आतंकियों के खौफ से कश्मी‍री हिंदू पहले से घाटी छोड़ कर भाग चुके हैं। अब आतंकियों की नई करतूत से सिख भी खौफजदा हैं। अगर सिख भी राज्य‍ से पलायन कर गए तो कश्मीर की बहुरंगी सांस्कृ तिक पचचान खत्म हो जाएगी। आगे चल कर अलगाववादी इसका राजनीतिक फायदा भी उठा सकते हैं।सिखों को धमकीऑल पार्टी सिख कोऑर्डिनेशन कमेटी के को-ऑर्डिनेटर जगमोहन सिंह रैना के हवाले से मीडिया में आई खबरों के मुताबिक सिख समुदाय के कई लोगों को बेनामी चिट्ठियां भेजी जा रही हैं। इनमें कहा जा रहा है, 'जब तुम यहां सुख भोग रहे हो तो फिर तुम कश्मीरियों की तकलीफ में साथ क्यों नहीं दे रहे हो? हमें पता है कि तुम गोलियों से डरते हो। गुरुद्वारों के बाहर प्रदर्शन करो या फिर कश्मीर को छोड़ दो।' रैना के मुताबिक कुछ चिट्ठियों में इस्लाम को कबूलने की धमकी भी दी गई है। रैना ने कहा कि सिख समुदाय ने इस मसले पर बैठक की है और एकजुट होकर ऐसी धमकियों का मुकाबला करने का फैसला किया है।

संसद में उठा मसला घाटी में सिखों की सुरक्षा का मसला शुक्रवार को संसद में भी उठा। सांसदों ने इसे गंभीर मसला बताते हुए सरकार से हस्त क्षेप और सिखों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा कि केंद्र सरकार कश्मीआर के मुख्य‍मंत्री उमर अब्दुनल्लां से संपर्क में है। उन्होंने सिखों को पूरी सुरक्षा दिलाने का भरोसा दिलाया है। चिदंबरम बोले कि घाटी के एक सिख संगठन ने उनसे मुलाकात की अर्जी दी है और वह जल्द ही यह मुलाकात करने वाले हैं। भाजपा नेता एसएस अहलूवालिया ने कहा कि ऐसे आश्वासन पहले भी दिए गए हैं, लेकिन कुछ नहीं हुआ।

कश्मीरी पंडितों जैसा होगा हाल

जानकार मानते हैं कि ऐसे में कश्मीरी पंडितों के बाद अब घाटी से सिखों का पलायन भी शुरू हो सकता है। घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन पिछले बीस सालों में बड़ी संख्या में हुआ है। एक अनुमान के मुताबिक 1990 से अब तक करीब तीन लाख कश्मीर पंडित घाटी छोड़ चुके हैं। इससे साफ है कि कश्मीर में अल्पसंख्यों के लिए हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं।

डरेंगे नहीं अकाली दल (बादल) की राज्य ईकाई के अध्यक्ष अजीत सिंह मस्ताना ने इन धमकियों को असामाजिक तत्वों की हरकत बताया है। उन्होंने अपने बयान में कहा है कि ऐसी धमकियां हमें न तो तोड़ सकती हैं और न ही मातृभूमि के लिए हमारे प्यार को कम कर सकती हैं। सिख नेताओं ने हुर्रियत के दोनों धड़ों- जेकेएलएफ और पीओके में सक्रिय यूनाइटेड जिहाद काउंसिल से इस मामले को गंभीरता से लेने को कहा है ताकि घाटी में भाईचारे और अमन का माहौल कायम रहे। कट्टर अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने सिख समुदाय को भरोसा दिया है कि वे डरें नहीं और ऐसी 'फर्जी चिट्ठियों' की परवाह न करें।

फोटो कैप्‍शन: शुक्रवार को श्रीनगर में अपने घर की टूटी खिड़की से झांक कर सरकार विरोधी नारे लगाते प्रदर्शनकारियों को देखता एक शख्‍स। घाटी में पिछले कई दिनों से सुरक्षा बलों की गोली में नागरिकों की मौत के विरोध में प्रदर्शन चल रहा है। सुरक्षा बलों की गोली से शुक्रवार को भी एक मौत हुई। दो महीने के दौरान इस तरह 62 लोगों की जान जा चुकी है।

Wednesday, August 18, 2010

भूख के पेट में भारत के बच्चे



मासक्मयुनिकेशन में डिग्री लेने के बाद चार साल डाक्यूमेंट्री फिल्म आरगेनाइजेशन में शोध और लेखन.उसके बाद दो साल "नर्मदा बचाओ आन्दोलन, बडवानी" से जुड़े रहे. सामाजिक मुद्दों को सीखने और जीने का सिलसिला जारी है. फिलहाल ''चाइल्ड राईट्स एंड यू, मुंबई'' के ''संचार विभाग'' में से जुड़कर सामाजिक मुद्दों को समझने की कोशिश कर रहे हैं. 16 August, 2010 15:34;00 शिरीष खरे
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यह बीते साल नंबवर के आखिरी हफ्ते की बात है जब ग्राम-अगासिया, विकासखण्ड-मेघनगर, जिला-झाबुआ, मध्यप्रदेश के अर्जुन ने एक सर्द रात में कुपोषण के सामने दम तोड़ दिया था। उस सर्द समय में इसी आदिवासी इलाके के दर्जनों बच्चे भी मारे गए थे। अर्जुन सबसे कम उम्र के उन बच्चों में से एक ऐसा नाम था जो अपने हमउम्र साथियों के साथ फाइल की सूची में क्रमानुसार दर्ज हो चुका था। इस तरह एक और नाम भूखे भारत की सांख्यिकी में एक बड़े गुणनफल के बीचोंबीच कहीं दूर गुम हो चुका था।

यकीनन वित्त मन्त्री प्रणव मुखर्जी ने अपना तीर चिड़िया की उस आंख पर ही साधा हुआ है जिसके निशाने पर पड़ते ही सकल घरेलू उत्पाद की दर 9% तक सरक सकती है। मगर कुपोषण और भूख का विकराल रुप देश के एक बड़े हिस्से को जिस ढंग से खा अरह है उससे भी आंख नहीं चुराई जा सकती है।

अक्टूबर 2009 से दिसम्बर 2009 के बीच, मध्यप्रदेश के इसी हिस्से के 4 गांवों से- भूख की चपेट में 70 आदमी मारे गए थे जिसमें 43 बच्चे थे। बीते दो सालों में अखबारों की कतरनों को ही जोड़ों तो मध्यप्रदेश के खण्डवा, सतना, रीवा, झाबुआ, शियोपुरी और सीधी जैसे जिलों से 456 आदमियों की मौतों का पता चलता है। मध्यप्रदेश में 5 साल के नीचे वाले बच्चों का मृत्यु-दर 1000/70 तक पहुंच गया है।

ऐसा ही हाल उड़ीसा और उत्तरप्रदेश का भी है। यहां से भी बाल-मृत्यु दर के अनुमान चौंकाते हैं। 5 साल के नीचे मरने वाले प्रति हजार बच्चों के मद्देनज़र उड़ीसा की हालत भी बहुत नाजुक है। इस तटीय प्रदेश के 29 जिलों में बाल-मृत्यु की दर कम से कम 1000/66 है। कंधमाल जिले की बाल-मृत्यु दर 1000/136 है जबकि मलकानगिरि और गजपति जिलों की बाल-मृत्यु दर 1000/127 है। उत्तरप्रदेश में बाल-मृत्यु दर है 1000/58। यहां के कौशांबी, भदौही, प्रतापगढ़, जौनपुर, इलाहाबाद और बनारस सबसे बुरी तरह से प्रभावित जिलों के तौर पर पहचाने गए हैं। आकड़े बताते है कि मध्यप्रदेश में 5 साल के नीचे के 60% बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इसके बाद उड़ीसा में 5 साल के नीचे के 50: बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। कुल मिलाकर कुपोषण के मामले में भारत के मध्यप्रदेश और उड़ीसा सबसे बुरी तरह से प्रभावित प्रदेशों के तौर पर पहचाने गए हैं। मगर कर्नाटक (44%), गुजरात (47%) और महाराष्ट्र (51%) भी बहुत ज्यादा पीछे नज़र नहीं आते।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 (एनएफएचएस-3) बताता है कि देशभर में 6 साल से नीचे के 8 करोड़ बच्चे कुपोषण की स्थिति (फूले पेट, अविकसित कदकाठी, झरते बाल और फीके रंग) में जी रहे हैं। 1 साल के बच्चे का वजन औसतन 10 किलोग्राम होता है और उसके वजन में सलाना 2 किलोग्राम के हिसाब से बढ़ोतरी होना जरूरी है। मगर जब बच्चे का वजन सामान्य से कम होने लगता है तो यह कुपोषण की स्थिति में आ जाता है। तब उसमें बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। ऐसे बच्चों को अधिक से अधिक प्रोट्रीन, कार्बोहाइड्रेड, आइरन, विटामिन बी, कैल्शियम आदि मिलना चाहिए। यहां गरीब तबके के नवजात शिशुओं में उचित पालन-पोषण का अभाव और उनके लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की गिरती स्थितियों को कुपोषण के पीछे के प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है। उनके आसपास के माहौल में साफ-सफाई और पीने का स्वच्छ पानी न होने से यह संकट और अधिक गहराता जा रहा है।

यह एक कटु सत्य है कि देश में एक सेकेण्ड के भीतर 5 साल के नीचे का एक बच्चा कुपोषण के कब्जे में आ जाता है। मगर इतना सबकुछ होने के बावजूद सरकारी तन्त्र बच्चों के लिए एक जवाबदेह स्वास्थ्य नीति और योजना बनाने के बारे में सोच तक नहीं रहा है।

हिन्दुस्तानियों के सीने पर सेना की गोलियां



आईआईएम लखनऊ से स्नातक डी. पी. मिश्र वन्यजीव प्रेमी और पत्रकार हैं. वे कहते हैं कि जब वे अपने आस पास की घटनाओं से परेशान होते हैं तो कलम का सहारा लेते हैं. सामाजिक सक्रियता, वन्यजीवन पर कार्य के अलावा सक्रिय लेखन और पत्रकारिता.उत्तर प्रदेश तथा उत्तरांचल की भारत-नेपाल सीमा पर होने वाली तस्करी, वन कटान, अवैध वन्यजीव शिकार, आईएसआई की सक्रियता तथा आतंकवादी एवं विदेशी घुसपैठ आदि को रोकने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा पैरा मिलिट्री फोर्स सीमा सशस्त्र बल को तैनात किया गया है। सीमा सशस्त्र बल यानी एसएसबी के जवान अपने मूल उद्देश्यों व कार्यों से भटक कर भौतिक सुखों की खातिर आमजनता का बेवजह उत्पीड़न एवं आर्थिक शोषण करने से परहेज नहीं करते हैं और सीधे बंदूक की भाषा में बात करने लगे हैं।

इसी का परिणाम है खीरी जिले के ग्राम त्रिकोलिया में जवानों द्वारा किया गया हिंसक तांडव एवं हत्याकांड, जिसमें दो निरीह बेगुनाह ग्रामीण मारे गए। निरंकुश जवानों के द्वारा आम जनता के साथ किये जाने वाले अनेक तरह के अत्याचारों और शोषण के विरोध में सीमावर्ती गांवों में उनके बीच बढ़ते तनाव से युवाओं के मन में विरोध की आग सुलगने लगी है, जिसकी परिणीत नक्सलवाद या आतंकवाद अथवा हथियारबंद बिरोध के रूप में कभी भी हो सकती है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। यद्यपि त्रिकोलिया काण्ड के मद्देनजर यूपी की सरकार ने सीमावर्ती क्षेत्रों में दिनोंदिन जवानों और ग्रामीणों के बीच बढ़ रहे तनावों और संघर्षों की रोकथाम के लिए भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत मिले एस0एस0बी0 के पुलिस अधिकारों में कटौती किये जाने का प्रस्ताव पुनः केन्द्र सरकार को भेजा है।

2 अगस्त 2010 को एसएसबी की वर्दी तब शर्मसार हो गई जब जवानों ने मामूली विवाद से रोष में आकर दो बेगुनाह ग्रामीणों की गोली मारकर हत्या कर दी। घटना खीरी जिले के ग्राम त्रिकोलिया की है, विवाद सिर्फ इतना था कि सड़क पर साइड न मिलने से एक गाड़ी का पीछा करते हुए एसएसबी के जवान अपने डिप्टी कंमाडेंट के निर्देश पर पूर्व विधायक निरवेन्द्र कुमार ‘मुन्ना‘ के आवास पर पहुंच गए। जहां पर जवानों ने जनप्रतितिनिधि रहे पूर्व विधायक के साथ अभद्रता ही नहीं की वरन् उनको डंडा भी मार दिया। इससे आक्रोशित ग्रामीणों ने जवानों को रोक लिया। इनकी सूचना पर त्रिकोलिया पहुंचे दर्जनों बेलगाम जवानों ने बिना किसी से बात किए लाठीचार्ज का तांडव शुरू कर दिया। उनके द्वारा नियम-कायदों को ताक पर रखकर ग्रामीणों पर बरसाई गई गोलियों से तमाशबीन रहे बेगुनाह गरीब युवक पाइया और बदरूद्दीन की मौत हो गई। इस पूरे घटनाक्रम में भी यह बात उभर कर आई कि यदि एसएसबी के अधिकारी संयम बरत कर समझदारी से परिस्थितियों का आंकलन करते और सिविल पुलिस के सहयोग से कानूनी कार्यवाही करते तो शायद बेवजह हुई दो युवकों की अकाल मौत को टाला जा सकता था।

निरंकुश जवानों द्वारा किया जाने वाला यह हिंसक तांडव कोई पहली घटना नहीं है। सन् 2001 से ही इस फोर्स ने अपनी तैनाती के बाद से भारत-नेपाल सीमावर्ती क्षेत्रों के आदिवासियों तथा अन्य निवासियों पर अत्याचार शुरू कर दिया था। हिंसक घटनाओं के अलावा भारत-नेपाल सीमावर्ती ग्रामीणों के साथ किए जाने वाले बेवजह उत्पीड़न, अत्याचार, आर्थिक शोषण और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ एवं यौन शोषण आदि के विरोध में जवानों तथा ग्रामीणों के बीच टकराव की अनगिनत घटनाएं हो चुकी हैं। जिनमें पुलिस एवं जिला प्रशासन को कानून व्यवस्था को बनाए रखने में काफी मसक्कत करनी पड़ी। यहां तक मामले को रफा-दफा करने के लिए एसएसबी अधिकारियों को सार्वजनिक माफी तक मांगकर शर्मिदंगी भी झेलनी पड़ी। एसएसबी के जवानों द्वारा अपने ही हिंदुस्तनी भाईयों के सीनों पर ही चलाई जा रही गोलियां अगर तस्करों, आतंकवादी, विदेशी घुसपैठियों अथवा भारतीय वन संपदा को बचाने के लिए चलाई जातीं तो आमजनता के बीच विलेन बन रहे एसएसबी के जवानों का रूप हीरो का होता और वाह-वाही तथा सम्मान मिलता अलग से ।

भारत-नेपाल की खुली सीमा दुधवा नेशनल पार्क के जंगल से सटी है, इसलिए सीमाई इलाकों से वन कटान तथा वन्यजीवों के अंगों का अवैध कारोबार एवं तस्करी का गैर कानूनी कार्य एसएसबी एवं बन विभाग और तस्करों की हुई जुगलबंदी के बीच निर्वाध रूप से चल रहा है। यह अवैध गोरखधंधा उजागर न हो जाए इसलिए भी आतंक फैलाकर ग्रामीणों को भयभीत किया जा रहा है, ताकि वह उनके खिलाफ अपना मुंह न खेल सकें। जबकि राष्टृीय सुरक्षा से जुड़ी इस फोर्स का यह आचरण कतई शोभनीय नहीं है। एसएसबी के जवानों के कुकृत्यों से केंद्र सरकार की भूमिका पर भी प्रश्नचिन्ह लगता है। फोर्स कोई भी हो उसका काम यह नहीं है कि वह आम जनता को तंग और परेशान करे। जनता की सुरक्षा के लिए सीमापर लगाई गई फोर्स आज उनकी सुरक्षा के लिए ही सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। खीरी जिले के ही नहीं वरन यूपी के अन्य सीमावर्ती ग्रामीणांचल समेत उत्तरांचल के सीमाई इलाकों की जनता भी इनके अशोभनीय व्यवहार और कुकृत्यों से त्रस्त हैं। इसके चलते भारत-नेपाल सीमा पर एसएसबी की मौजूदगी पर प्रश्नचिन्ह लग गया है।

भारत-नेपाल सीमा पर एसएसबी के लगभग दस साल के क्षेत्रीय इतिहास में कोई अहम व उल्लेखनीय उपलब्धि तो उसके खाते में दर्ज नहीं हो सकी है। जिसमें जवानों को वाहवाही मिली हो, जबकि वर्दी पर बदनुमा दाग तमाम लग चुके हैं। यद्यपि एसएसबी द्वारा जनता का सहयोग पाने तथा परस्पर प्रेम बढ़ाकर सीमा पर शांति कायम रखने के उद्देश्य से सीमावर्ती गांवों में सद्भावना जागरूकता अभियान समय-समय पर चलाए जाते हैं। बावजूद इसके उनके तथा जनता के बीच दूरियां लगातार बढ़ ही रही हैं और जो थोड़ी बहुत शान्ति थी वह भी पूरी तरह से भंग हो चुकी है। आजाद भारत में अंग्रेजी शासन वाले फोर्स की तरह एसएसबी के जवान सीमा पर हुकूमत कर रहें हैं। जबकि फोर्स कोई भी हो उसका उद्देश्य होता है कि संयम से काम लेते हुए बिपरीत परिस्थितियों का आंकलन करके समस्या का निराकरण करना। इसके बजाय जवान अमानवीय व हिंसक तरीका अपनाते हैं जिससे संघर्ष और टकराव बढ़ने लगा है। जबकि कैसी भी विषम एवं विपरीत परिस्थितियां हों उसमें हलका-फुलका बल प्रयोग तो जायज हो सकता है, परंतु गोली चला देना कम से कम अंतिम निर्णय तो कतई नहीं होना चाहिए। क्योंकि आक्रोशित जनता ने भी अगर अत्याचार और शोषण का जवाब हथियारबंद टकराव से देना शुरू कर दिया तो स्थिति और भयावह हो सकती है।

इतिहास गवाह है कि फोर्स कोई भी हो अथवा सरकारी तन्त्र, जिसने जब भी गरीब आम जनता पर अकारण अत्याचार किया तो उसके विरोध में पैदा हुआ है आतंकवाद एवं नक्सलवाद। झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार, पश्चिम बंगाल या जम्मू-कश्मीर आदि प्रान्त हों उनमें सरकारी तंत्र की अन्यायपूर्ण व्यवस्था और सुरक्षा बलों द्वारा किए जाने वाले बेवजह अत्याचार के बिरोध में जड़ जमा चुका नक्सलवाद या फिर आतंकवाद इसी का परिणाम है। यूपी के बिहार से सटे कुछ जिलों में नक्सलवाद अपना सिर उठाने भी लगा है। यह विकट समस्या इस शांतिपूर्ण तराई क्षेत्र में भी पनप सकती है क्योंकि यहां भी एसएसबी के जवान अपने ही हिन्दुस्तानी भाईयों के सीनो पर बेवजह गोलियां दाग रहे हैं। इससे क्षेत्रीय युवाओं के मन में अत्याचार और शोषण के खिलाफ सुलग रही बिरोध की आग को पहचान कर अगर नक्सली नेताओं ने यहां आकर हवा दे दी तो यह शांत इलाका भी नक्सलवाद की चपेट में आकर आतंकवाद को पैदा कर सकता है। क्योंकि यह तराई इलाका पूर्व में 80-90 के दशक में नेक्सलाइट मूवमेंट और सिक्ख आतंकवाद का प्रमुख पनाहगाह रह चुका है। ऐसी बन रही पस्थितियों से निपटने के लिए आवश्यक हो गया है कि फोर्स कोई भी हो उसके जवानों को विपरीत परिस्थितियों में भी संयम बरतने का प्रशिक्षण दिए जाने के साथ ही उनको मानवाधिकारों का भी पाठ पढ़ाया जाए। इसके अतिरिक्त घटनाओं में दोषी पाए जाने वाले जवानों को सख्ती से दण्डित किया जाए, जिससे अन्य जवान भी उससे सबक हासिल करें और वह बेवजह किसी निर्दोश नागरिक पर गोली चलाने की हिम्मत न जुटा सकें। तभी सीमा पर सुरक्षा बलों एवं जनता के बीच बढ़ रही अविश्वास की खाइयों को पाटा जा सकता है और पूरी तरह से शांति कायम हो सकती है।

नवभारत टाइम्स की पोर्न पत्रकारिता


अगर आप विस्फोट.कॉम नियमित पढ़ते हैं तो हो सकता है आपने तुलसी सिंह बिष्ट का कमेन्ट देखा हो. एक दिन तुलसी सिंह मेरे पास आये कहने लगे कि, संजय जी अब मैं आपकी साइट उतना नहीं पढ़ता हूं. मैं नवभारत टाइम्स पढ़ता हूं और खूब कमेन्ट करता हूं. तुलसी की हिम्मत और इमानदारी कि उसने साफ साफ मुझे बता दिया, लेकिन अब मुझे लगता है कि तुलसी सही करते है. नवभारत टाइम्स जो कुछ दे रहा है वह सब लिखने-छापने की समझ अपने अंदर नहीं है इसलिए तुलसी तो नवभारत टाइम्स ही पढ़ेगा.

नवभारत टाइम्स ने एक नयी विधा विकसित की है. उस नयी विधा का नाम है- पोर्न पत्रकारिता. पोर्न पत्रकारिता के लिए नवभारत टाइम्स ने कई प्रकार के विभाजन कर रखे हैं जिसमें फटाफट सेक्स करने से लेकर सेक्स के दौरान हुए हादसों तक की रिपोर्टिंग की जाती है. इसके अलावा ऐसे उत्पादों, घटनाओं, व्यक्तियों, कथाओं को प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया जाता है जो पोर्न पत्रकारिता को बढ़ावा देते हैं. ऐसे चित्रों को प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता है जिसमें स्त्री देह के ऐसे अंग दिखाई देते हों या फिर दिखाई देने का आभास देते हों ताकि लोग चोरी छिपे उसके साथ चिपके रहने की कल्पना कर सके.

टाइम्स समूह प्रगितिशील समूह है इसमें कोई शक नहीं है. वे समय के साथ अपने आप को नहीं बदलते, बल्कि अपने आप को बदल लेते हैं और कहना शुरू करते हैं कि समय बदल रहा है इसलिए वे क्या कर सकते हैं. फिर भी उस समूह की प्रगतिशीलता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. उस समूह ने जब नवभारत टाइम्स की साइट शुरू की तो शायद हिन्दी की सबसे बेहतरीन साइटों में एक बनाकर उसकी शुरूआत की. ज्यादा पुरानी बात नहीं है लेकिन अपनी शुरुआत के छोटे से ही अंतराल में नवभारत टाइम्स ने टाइम्स ग्रुप के कुल ट्रैफिक का 3.5 प्रतिशत हिस्सा बंटाना शुरू कर दिया है. नवभारत टाइम्स इंडिया टाइम्स का हिस्सा है और इंडिया टाइम्स दुनिया की दो सौ वेबसाइटों में से एक है तो देश की टाप टेन वेबसाइटों में भी शामिल है. इसलिए 3.5 प्रतिशत ट्रैफिक नवभारत टाइम्स से आता है तो इसे कम नहीं कहा जा सकता.

लेकिन अगर आपको यह गलतफहमी हो कि नवभारत टाइम्स को यह ट्रैफिक पत्रकारिता करके या सूचना लेने देने का काम करके मिल रहा है तो एक बार दोबारा विचार करिए. इतना ट्रैफिक जुगाड़ने के लिए नवभारत टाइम्स बाकायदा पोर्न पत्रकारिता कर रहा है. किसी के लिए भी नवभारत टाइम्स को गाली देना आसान होगा लेकिन नवभारत टाइम्स को ऐसी आलोचनाओं और गालियों से फर्क नहीं पड़ता. नवभारत टाइम्स के रणनीतिकार (मैनेजमेन्ट) जानते हैं कि हिन्दी का ट्रैफिक कैसे अपनी ओर मोड़ा जा सकता है. हमें आपको पता हो न हो, इण्डिया टाइम्स समूह के रणनीतिकारों को मालूम है कि इंटरनेट पर क्या देने से लोग छुप छुपाकर नभाटा की ओर खिंचे चले आयेंगे. इसलिए नवभारत टाइम्स ने वेब पत्रकारिता में अपना पैर जमाने के लिए जमकर पोर्न पत्रकारिता कर रहा है और अच्छे खासे लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है.

नवभारत टाइम्स की ही तर्ज पर दैनिक भास्कर ने भी अपने पोर्टल पर सेक्स ज्ञान बांटना शुरू किया था लेकिन न जाने उन्हें कैसा महसूस हुआ कि एकदम से अपने कदम पीछे खींच लिये. लेकिन नवभारत टाइम्स की पोर्न पत्रकारिता का अभियान जारी है. हो सकता है नवभारत टाइम्स के मैनेजमेन्ट वाले तर्क दें जनता जो पढ़ना चाहती है वह हम उस उसे पढ़ा रहे हैं. लेकिन मैनेजमेन्ट के इरादे भी नेक लगते नहीं है. थोड़ा सा भी तकनीकि जानकार समझ जाएगा कि नवभारत टाइम्स की वेबसाइट में जानबूझकर वे पक्ष उभारकर सामने रखे गये हैं जो पोर्न पत्रकारिता की पाठशाला खोलकर बैठे हैं. लेकिन एक दूसरी हकीकत यह भी है कि इंटरनेट की तरफ आ रहे लोग सबसे पहले सेक्स ज्ञान पर भी हाथ साफ करना चाहते हैं. ऐसे में अब नवभारत टाइम्स लगभग पूर्ण पोर्न साइट का स्वरूप न धारण करे तो जनता की सेवा कैसे करेगी? प्रगतिशील घराना है, समय बदलता है सब कुछ बदल जाता है. किसी दौर में नवभारत टाइम्स ने साहित्य की पत्रकारिता की थी, अब वह सेक्स की पत्रकारिता कर रहा है.

इसे गलत सही ठहराने की बजाय एक निजी सुझाव देना चाहता हूं. भोपाल में पत्रकारिता पढ़ानेवाले देश के सबसे प्रतिष्ठित माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय की योजना है कि वह पर्यावरण पत्रकारिता पर एक नया कैंपस शुरू करे. अब नवभारत टाइम्स के वेब संस्करण को देखकर एक और विचार मन में जागता है कि हमारे देश के मीडिया संस्थानों को पोर्न पत्रकारिता पढ़ाने की दिशा में सोचना चाहिए. अगर इंटरनेट पर हिन्दी पोर्न की ही भाषा होकर बचेगी तो निश्चित रूप से इसे बढ़ावा दिया जाना चाहिए. नवभारत टाइम्स पत्रकारों और पत्रकार संस्थानों को एक रास्ता दिखा रहा है जो कि वर्तमान इंटरनेट की हकीकत भी है. इसलिए माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से भी मेरा विनम्र निवेदन है कि इस बारे में सोचें और सोच कम पड़ जाए तो टाइम्स समूह के प्रबंधकों से मिलकर अपना ज्ञानवर्धन करें, तथा ऐसे किसी कोर्स को डिजाइन करें. नवभारत टाइम्स जैसे पोर्टल और तुलसी सिंह जैसे पाठक हमें भविष्य की पत्रकारिता का रास्ता दिखा रहे हैं.

सूख गये संघर्ष के आंसू


इंडियन एक्सप्रेस में कृषि रिपोर्टर रहे देवेन्द्र शर्मा अब कृषि और खाद्य मामलों में भारत के जाने-माने नाम हैं. दुनिया में जहां कहीं भी खेती-किसानी से जुड़ी नीतियों की बात चल09 July, 2010 10:53;00 देवेन्द्र शर्मा
नर्मदा पर बांधों की श्रृंखला की शुरुआत को 25 साल बीत गए हैं। इसके कारण 1.5 लाख से अधिक विस्थापित (जिनमें अधिसंख्य आदिवासी हैं) अब भी पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं। अब तक की तमाम सरकारों ने इन लोगों के साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया है। दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एपी शाह की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय स्वतंत्र पीपुल्स ट्रिब्युनल के सदस्य के तौर पर जब मैंने मध्य प्रदेश के निमद क्षेत्र का दौरा किया तो इन गरीब और असहाय लोगों को देखकर सिर घूम गया था। 25 साल से वे अहिंसक संघर्ष कर रहे हैं और फिर भी उन्हें न्याय नहीं मिल पाया है।

यह देखकर मुझे संदेह होता है कि क्या वास्तव में गांधीगीरी की सार्थकता है भी? जलसिंधी गांव के बावा महारिया भी उन लोगों में से हैं, जिनका मकान सन 2000 में बांध में समा गया था। तब से मध्य प्रदेश सरकार ने एक इंच जमीन भी विस्थापितों को देने की राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई, जबकि सेज, औद्योगिक घरानों और मजहबी संस्थानों को देने के लिए उसके पास हजारों एकड़ जमीन है। जब जून के शुरू में हम बदवानी क्षेत्र में पहुंचे तो लोगों ने इस तरह की सैकड़ों अर्जियां हमारे सामने रख दीं। उनकी दुर्दशा देखकर और भविष्य में न्याय न मिलने की आशंका के मद्देनजर मुझे हैरत हुई कि इन लोगों ने हथियार क्यों नहीं उठाए हैं? ऐसे समय जब संप्रग सरकार छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश में नक्सलियों से हथियार डालकर बातचीत में शामिल होने को कह रही है तब यह समझ से परे है कि सरकार उन लोगों से बात क्यों नहीं कर रही है जिन्होंने अब तक हथियार नहीं उठाए हैं? वहां जो कुछ मैंने देखा और सुना उससे बहुत दुख पहुंचा।

मैं महिलाओं की आंखों में छलकेदर्द को कभी भूल नहीं सकता। चौथाई सदी से संघर्ष करते-करते उनकी आंखों के आंसू सूख गए हैं। चिकाल्दा गांव की शन्नो भाभी कहती हैं, आप मुझे भिखारी बनाने पर क्यों तुले हो? हमारे साथ अन्याय क्यों हो रहा है? हमारा वैधानिक हक क्यों मारा जा रहा है? वह उन सैकड़ों लोगों में शामिल थीं, जिन्होंने ट्रिब्यूनल के सामने अपनी गुहार लगाई थी। जैसे ही भोपाल में हमने 84 पेज की रिपोर्ट जमा की, एक अखबार में खबर छपी कि योजना आयोग ने नक्सलवाद से सर्वाधिक प्रभावित नौ राज्यों के 35 जिलों के लिए 13,742 करोड़ रुपये की विकास योजना तैयार की है। इसके विपरीत हमें बताया गया कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय नर्मदा विस्थापितों के लिए एक और विशेषज्ञ समिति का गठन कर रहा है। पहले ही रिपोर्र्टो के भारी-भरकम पुलिंदे, नीतियां, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के फैसलों का हवाला, अनेक विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्ट, संबद्ध अंतरराष्ट्रीय फैसले और बांधों पर विश्व आयोग की रिपोर्ट मौजूद हैं। इन सब रिपोर्र्टो के बीच जो एकमात्र पहलू गैरहाजिर है वह यह कि विस्थापितों के पुनर्वास की राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं है। नर्मदा बांध से प्रभावित क्षेत्रों के दौरे में हमने जो देखा-समझा वह चौंकाने वाला था।

सर्वप्रथम तो नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण और नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण का दावा हैरान करने वाला है कि अब एक भी परिवार का पुनर्वास शेष नहीं है, जबकि वस्तुस्थिति यह है कि प्रत्येक गांव में सैकड़ों लोगों ने वहां की हकीकत से हमारा परिचय कराया। उन्होंने हमें बांध प्रभावित लोगों के विभिन्न मोहल्लों में बने मकानों, स्कूलों, पंचायत भवनों, मंदिरों, मस्जिदों और खेती की जमीन दिखाई। दूसरे, नर्मदा प्राधिकरणों के मिथ्या दावे ऐसे समय किए गए जब सुप्रीम कोर्ट ने 15 मार्च, 2005 के फैसले में रेखांकित किया था कि जिन परियोजनाओं से लोग जमीन और घर से बेदखल होते हैं, उन्हें शुरू करने से एक साल पहले ही प्रभावित लोगों के पुनर्वास और तमाम सुविधाओं से युक्त मकान उपलब्ध करा दिए जाने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार जिन परिवारों की जमीन परियोजना के दायरे में आती है उनके प्रत्येक बालिग बेटे और अविवाहित बेटी को कम से कम दो हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि दी जानी अनिवार्य है। महाराष्ट्र और गुजरात में जिन 10,500 आदिवासी परिवारों की जमीन परियोजनाओं में शामिल की गई थी, उन्हें लंबे संघर्ष के परिणामस्वरूप जमीन दे दी गई, किंतु अब तक मध्य प्रदेश में एक भी परिवार को जमीन नहीं दी गई। मध्य प्रदेश सरकार ने जमीन के बदले में जमीन देने में असमर्थता जता दी है। उसका कहना है कि उसके पास बेदखलों को देने के लिए कोई अतिरिक्त जमीन नहीं है, क्योंकि हाल के दिनों में जमीन की कीमत काफी बढ़ गई है। हालांकि उसने इंदौर के स्पेशल इकोनॉमिक जोन के लिए 4050 हेक्टेयर जमीन देने पर सैद्धांतिक रजामंदी जता दी है। इस एक सेज को जितनी जमीन दी जा रही है, करीब इतनी ही जमीन सरदार सरोवर परियोजना के बेदखलों के लिए चाहिए। निमद क्षेत्र में, जो कृषि उपजों जैसे गेहूं, मक्का, अरहर, मिर्च, गन्ना और फल के लिए बहुत उर्वर है, नहरों का जाल बिछाया जा रहा है। हमें पता चला कि ये नहरें न केवल ठेकेदारों द्वारा बनाई जा रही हैं, बल्कि इनके द्वारा ही इनकी योजना भी बनाई जा रही है।

कोई यह सवाल नहीं पूछ रहा है कि ऐसे क्षेत्र में नहरों की क्या आवश्यकता है, जो पहले ही सिंचित है? मुझे इंदिरा सागर और ओमकरेश्वर परियोजनाओं के तहत बनाई जा रही नहरों से 1.23 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को मिलने वाले संभावित लाभ के लिए एक लाख हेक्टेयर भूमि को नहरों में खपाने में कोई तुक नजर नहीं आता। पिछले अनुभवों को देखते हुए इन नहरों से केवल 34 प्रतिशत संभावित लक्ष्य की पूर्ति ही संभावित है। नर्मदा पुनर्वास की कहानी छल-कपट, भ्रष्टाचार, दबाव, उत्पीड़न, उदासीनता और घोर लापरवाही की कहानी है। यह इस बात का भी उदाहरण है कि सरकार किस तरह ऐसी स्थितियां पैदा करती है, जिनमें गरीब आदिवासियों के पास हथियार उठाने के अलावा कोई अन्य चारा नहीं बचता। नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण और नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के अध्यक्षों को गरीबों को उनके जीने के अधिकार से वंचित करने का दोषी ठहराया जाना चाहिए। मध्य प्रदेश को उद्योगों के लिए भूमि का आवंटन करने में कोई दिक्कत नहीं है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसी साल जनवरी में प्रवासी भारतीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए एनआरआई उद्योगपतियों को मध्य प्रदेश में उद्योग लगाने के लिए खुले दिल से निमंत्रण दिया। इस मौके पर उन्होंने कहा, मध्य प्रदेश में कानून एवं व्यवस्था की कोई समस्या नहीं है, भूमि की बहुतायत है और औद्योगिक प्रक्रिया तीव्र गति से संपन्न की जाती है। इससे तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाती है। उद्योगपतियों और सेज के लिए जमीन की उपलब्धता की कोई सीमा नहीं है, किंतु विस्थापितों को जमीन देने की कोई मंशा नहीं है, चाहे इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना भी करनी पड़े। बदवानी में जन सुनवाई में एक विस्थापित ने पूछा था, क्या सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का कानून राज्यों पर भी लागू होता है या फिर यह हम जैसे कमजोरों के लिए ही है? आखिर इस सवाल का जवाब कौन द

आधी आबादी के इन्साफ की लड़ाई और शबाना आजमी


आज़ादी के 63 साल बाद भी देश में आज़ादी पूरी तरह से नहीं आई है. शायद इसीलिये आज़ादी का जो सपना हमारे महानायकों ने देखा था वह पूरा नहीं हो रहा है. सबसे मुश्किल बात यह है कि राज-काज के फैसलों से देश की आधी आबादी को बाहर रखा जा रहा है. अपने देश में आज भी महिलायें मुख्य धारा से बाहर हैं. असंवेदनशीलता की हद तो यह है कि जनगणना में गृहिणी को अनुत्पादक काम में शामिल माना गया है और उन्हें भिखारियों की श्रेणी में रखने की कोशिश की गयी. लेकिन हल्ला गुल्ला होने के बाद शायद यह मसला तो दब गया लेकिन महिलाओं को सत्ता से बाहर रखने में अभी तक मर्दवादी राजनीति के पैरोकार सफल हैं और उन्हें संसद और विधानमंडलों में बराबर का हक नहीं दे रहे हैं.

महिलाओं के ३३ प्रतिशत आरक्षण के लिए जो बिल राज्यसभा में पास किया गया था, उसे मानसून सत्र में पेश करने की मंशा सरकारी तौर पर जतायी गयी है. यानी इस सत्र में जो काम होना है उसमें महिला आरक्षण बिल भी है. लेकिन राज्य सभा में बिल को पास करवाने के लिए कांग्रेस ने जो उत्साह दिखाया था वह ढीला पड़ चुका है. कांग्रेस और बीजेपी में ऐसे सांसदों की संख्या खासी बड़ी है जो मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद की तरह सोचते हैं. अजीब बात है कि मुलायम सिंह और लालू प्रसाद जिन डॉ राम मनोहर लोहिया को अपना आदर्श मानते हैं, वही डॉ लोहिया महिलाओं को आरक्षण के पक्षधर थे इसलिए बिल को पास करवाना आसान नहीं है लेकिन उसे इतिहास के डस्टबिन में भी नहीं डाला जा सकता है क्योंकि देश में जागरूक नागरिकों का एक बड़ा वर्ग चाहता है कि संसद और विधान सभाओं में महिलाओं को एक तिहाई सीटें दे दी जाएँ. इसके फायदे बहुत हैं लेकिन उन फायदों का यहाँ ज़िक्र करना बार बार कही गयी बातों को फिर से दोहराना माना जाएगा. यहाँ तो बस दीवाल पर लिखी इबारत को एक बार फिर से दोहरा देना है कि अब महिलाओं के लिए विधानमंडलों और संसद में आरक्षण को रोक पाना राजनीतिक पार्टियों के लिए बहुत मुश्किल होगा. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि लोक सभा और राज्य सभा में ऐसी पार्टियां बहुमत में हैं जो घोषित रूप से महिलाओं के आरक्षण के पक्ष में हैं. उनको उनकी बात पूरी करने के लिए मजबूर करने के लिए बड़े पैमाने पर आन्दोलन चल रहा है.

इसी आन्दोलन की एक कड़ी के रूप में मानसून सत्र शुरू होने के बाद नयी दिल्ली के जंतर मंतर पर बहुत बड़ी संख्या में महिलाओं का हुजूम आया और उसने साफ़ कह दिया कि सरकार और विपक्षी दलों को अब महिला आरक्षण बिल पास कर देना चाहिए वरना बहुत देर हो जायेगी. मानवधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे संगठन ,अनहद की ओर से आयोजित जंतर मंतर की रैली से जो सन्देश निकला वह दूर तक जाएगा. इसी रैली में सिने कलाकार और सामाजिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली नेता, शबाना आजमी भी मौजूद थीं. उन्होंने ऐलान किया कि अब इस लड़ाई को तब तक जारी रखा जाएगा जब तक कि महिलायें बराबरी के अपने मकसद को हासिल नहीं कर लेतीं. शबाना इस रैली की मुख्य आकर्षण थीं. उन्होंने कहा कि यह लड़ाई केवल औरतों के बारे में नहीं है, यह इन्साफ की लड़ाई है लेकिन यह समझ लेना ज़रूरी है कि ३३ फीसदी आरक्षण कोई जादू की छडी नहीं है कि यह हो जाने के बाद सारी समस्याओं का हल मिल जाएगा. यह तो औरतों का वह हक है जो उन्हें बहुत पहले मिल जाना चाहिए था. यह सच है कि जब महात्मा गांधी ने आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी तो आवाहन किया था कि महिलाओं को उनका अधिकार दिया जाना चाहिए. लेकिन हुआ ठीक उसका उल्टा. आज आज़ादी के ६३ साल बाद भी संसद में केवल ८ फीसदी महिलायें हैं ज़रुरत इस बात की है कि महिलाओं को उनका वाजिब हक दिया जाए .अगर ऐसा हुआ तो हमारा समाज एक बेहतर समाज होगा क्योंकि महिलायें समाज की बेहतरी के लिए हमेशा काम करती हैं. उनको मालूम है कि यह लड़ाई मामूली नहीं है और तब तक चलती रहेगी जब तक कि लोकसभा में ३३ फीसदी आरक्षण के लिए बिल पास नहीं हो जाता .

शबाना आज़मी का यह बयान कोरा भाषण नहीं है क्योंकि अब तक का उनका रिकार्ड ऐसा रहा है कि वे जो कहती हैं वही करती भी हैं. कान फिल्म समारोह में जाने के पहले जब उन्हें पता लगा कि मुंबई के एक इलाके के लोगों की झोपड़ियां उजाड़ी जा रही हैं तो शबाना आज़मी ने कान को टाल दिया और मुंबई में जाकर भूख हड़ताल पर बैठ गयीं. भयानक गर्मी और ज़मीन पर बैठ कर हड़ताल करती शबाना आज़मी का बी पी बढ़ गया. बीमार हो गयीं. सारे रिश्तेदार परेशान हो गए. लोगों ने सोचा कि उनके अब्बा से कहा जाए तो वे शायद इस जिद्दी लड़की को समझा दें. उनके अब्बा, कैफ़ी आजमी बहुत बड़े शायर थे, अपनी बेटी से बेपनाह मुहब्बत करते थे और शबाना के सबसे अच्छे दोस्त थे. लेकिन कैफ़ी आज़मी कम्युनिस्ट भी थे और उनका टेलीग्राम आया. लिखा था," बेस्ट ऑफ़ लक कॉमरेड." शबाना की बुलंदी में उनके अति प्रगतिशील पिता की सोच का बहुत ज्यादा योगदान है. हालांकि शबाना का दावा है कि उन्हें बचपन में राजनीति में कोई रूचि नहीं थी, वे अखबार भी नहीं पढ़ती थी. लेकिन सच्चाई यह है कि वे राजनीति में रहती थी. उनका बचपन मुंबई के रेड फ्लैग हाल में बीता था. रेड फ्लैग हाल किसी एक इमारत का नाम नहीं है. वह गरीब आदमी के लिए लड़ी गयी बाएं बाजू की लड़ाई का एक अहम मरकज़ है. आठ कमरों और एक बाथरूम वाले इस मकान में आठ परिवार रहते थे. हर परिवार के पास एक एक कमरा था और परिवार भी क्या थे. इतिहास की दिशा को तय किया है इन कमरों में रहने वाले परिवारों ने. शौकत कैफ़ी ने अपनी उस दौर की ज़िन्दगी को अपनी किताब में याद किया है. लिखती हैं,' रेड फ्लैग हाल एक गुलदस्ते की तरह था जिसमें गुजरात से आये मणिबेन और अम्बू भाई, मराठवाडा से सावंत और शशि, यू पी से कैफ़ी, सुल्ताना आपा ,सरदार भाई ,उनकी दो बहनें रबाब और सितारा ,मध्य प्रदेश से सुधीर जोशी, शोभा भाभी और हैदराबाद से मैं. रेड फ्लैग हाल में सब एक एक कमरे के घर में रहते थे. सबका बावर्चीखाना बालकनी में होता था. वहां सिर्फ एक बाथरूम था और एक ही लैट्रीन लेकिन मैंने कभी किसी को बाथ रूम के लिए झगड़ते नहीं देखा."

इस तरह के माहौल से शबाना आजमी आई हैं. उनके बचपन की भी अजीब यादें हैं. संघर्ष करने में उनको मज़ा आता है. शायद ऐसा इसलिए कि रेड फ्लैग हाल के उनके बचपन में जब मजदूर संघर्ष करते थे तो शबाना के माता पिता भी जुलूस में शामिल होते थे. बेटी साथ जाती थी. इसलिए बचपन से ही वे नारे लगा रहे मजदूरों के कन्धों पर बैठी होती थी. चारों तरफ लाल झंडे और उसके बीच में एक अबोध बच्ची. यह बच्ची जब बड़ी हुई तो उसे इन्साफ के खिलाफ खड़े होने की ट्रेनिंग नहीं लेनी पड़ी. क्योंकि वह तो उन्हें घुट्टी में ही पिलाया गया था. शबाना आजमी ने एक बार मुझे बताया था कि लाला झंडे देख कर उनको लगता था कि उन्हें उसी के बीच होना चाहिए था क्योंकि वे तो बचपन से ही वहीं होती थीं. उन्हने दूर दूर तक फहर रहे लाल झंडों को देख कर लगता था जैसे कोई जश्न का माहौल हो.

ऐसे बहुत सारे मामले हैं जहां शबाना ने अपनी बात को मनवाया है. तो इस बार तो उनके साथ महिलाओं की बहुत बड़ी संख्या है और देश की राजनीतिक आबादी के बहुत सारे लोग महिला आरक्षण के पक्ष में हैं. शबाना आज़मी एक ऐसी महिला कार्यकर्ता हैं जिन्हें पुरुषों से बेपनाह प्यार मिला है. उनका आन्दोलन पुरुष विरोधी नहीं है. उनके अब्बा, कैफ़ी आजमी उन्हें जान से बढ़ कर मुहब्बत करते थे. शबाना को आम बहुत पसंद हैं. उनके बचपन में जब बहुत गरीबी थी तो कैफ़ी अपनी बेटी को आम बहुत मुश्किल से दे पाते थे. लेकिन जब उन्हें अपने गाँव में फिर से रहने का मौक़ा मिला तो उन्होंने शबाना के लिए आम का पूरा एक बाग़ लगवा दिया. इसलिए शबाना का महिला अआरक्षण आन्दोलन में शामिल होना न तो इत्तिफाक है और नहीं किसी तरह की पुरुष विरोधी मानसिकता. वे इन्साफ की लड़ाई लड़ रही हैं. लगता है कि अब लड़ाई एक निर्णायक मुकाम तक पंहुच चुकी है. इस संघर्ष की एक अच्छाई यह भी है कि इसमें अगुवाई उन महिलाओं के हाथ में है जो अपने क्षेत्र में बुलंदियां हासिल कर चुकी हैं, किसी नेता की बेटी या बहू नहीं हैं. उम्मीद है कि इसी सत्र में लोकसभा महिला आरक्षण को मंजूरी दे देगी और हम एक देश के रूप में गर्व से सिर ऊंचा कर सकेगें.

Saturday, August 14, 2010

'Peepli Live' will change nothing: Anusha Rizvi


If the issue is universal, why did she shoot the film in Madhya Pradesh?

'It could be anywhere in India. We had to shoot it somewhere and wherever we would have shot it, it would have looked like that. But if you see the film, it says it is Mukhya Pradesh. That means it's a completely fictitious state and Peepli is a fictitious village in it. Even for the police uniform, we have not used it from any state of India,' said Anusha.

She maintains that around 900 people from across the country were auditioned to select each character.

'The audition was done in a very detailed manner. It was very, very important for the film. It took us a long time and actually the casting department did most of the work. They auditioned 900 people to choose the characters,' said Anusha.

Asked if the association with Aamir helped in the film having a wider reach, she said: 'Of course, Aamir is the brand ambassador of the film if you want to call it that way. He already has a big fan following, he has friends and he could take the film to those people with less effort than any one else could have.'

She clarifies that before making the film, she was involved with documentaries and it was not a direct transition from journalism to filmmaking.

'It was not like leaving journalism to come into filmmaking. I left journalism in 2002 as I had done enough of it. I was doing documentary and looking out for funding when I got the idea for this film. So it was not a direct transition from journalism to filmmaking.'
Continued on next page...

'Peepli Live' was well received in the international film circuit too like the Sundance Film Festival, where it was the first Indian film to be selected for the competition section and the Berlin Film Festival.

The director is overwhelmed after receiving the Best First Feature Film award at the 31st Durban International Film Festival.

'I was completely numb. I think my reactions have all gone haywire. It was so difficult to react to something like that. It was very overwhelming because apart from Aamir and me, there were 150 people who worked day in-day out in on the film. For all of us, it's a great achievement,' said Anusha.

'Peepli Live' strikes gold at box office on opening day


Mumbai, Aug 13 (IANS) Debutant director Anusha Rizvi's 'Peepli Live' has opened to rave reviews, but the former journalist doesn't believe her satire on farmer suicides will change anything. 'Nothing can happen until people stand up and regulate the system,' she says.

'Absolutely nothing will happen, the whole state is doing nothing, how can you think that some people will see it and feel the pinch on what they are doing themselves?' Anusha told IANS in an interview here.

'Nothing can happen until people stand up and regulate it. How many of us in the metros even want to think about it?'

Though the script talks about the serious problems, it makes audiences laugh.

'The content of the film has not been made comical by effort. Nothing is comedy. It's an extremely serious movie. You will laugh because of the way it has been presented, but the laugh will not go easy on you - you will also feel the pinch,' she said.

Released Friday, the film has been produced by Bollywood superstar Aamir Khan and it takes pot shots at the media, politicians and bureaucrats.

'Being in the media I have seen it very closely. In some instances, you can say that it is a sarcastic take on my personal experience of how media deals with an issue.'

'But on the other hand, even if I had not been a journalist and if I had been reading newspapers and watching news channels on a daily basis, I would have come up with the same impression that the observations of the media are not (always) right.'

Asked if her journalistic experience helped her write the script, she said: 'No. There have been a number of articles in newspapers and magazines and above all it was more from general awareness. All those things made the script come into being, you know.'
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If the issue is universal, why did she shoot the film in Madhya Pradesh?

'It could be anywhere in India. We had to shoot it somewhere and wherever we would have shot it, it would have looked like that. But if you see the film, it says it is Mukhya Pradesh. That means it's a completely fictitious state and Peepli is a fictitious village in it. Even for the police uniform, we have not used it from any state of India,' said Anusha.

She maintains that around 900 people from across the country were auditioned to select each character.

'The audition was done in a very detailed manner. It was very, very important for the film. It took us a long time and actually the casting department did most of the work. They auditioned 900 people to choose the characters,' said Anusha.

Asked if the association with Aamir helped in the film having a wider reach, she said: 'Of course, Aamir is the brand ambassador of the film if you want to call it that way. He already has a big fan following, he has friends and he could take the film to those people with less effort than any one else could have.'

She clarifies that before making the film, she was involved with documentaries and it was not a direct transition from journalism to filmmaking.

'It was not like leaving journalism to come into filmmaking. I left journalism in 2002 as I had done enough of it. I was doing documentary and looking out for funding when I got the idea for this film. So it was not a direct transition from journalism to filmmaking.'
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'Peepli Live' was well received in the international film circuit too like the Sundance Film Festival, where it was the first Indian film to be selected for the competition section and the Berlin Film Festival.

The director is overwhelmed after receiving the Best First Feature Film award at the 31st Durban International Film Festival.

'I was completely numb. I think my reactions have all gone haywire. It was so difficult to react to something like that. It was very overwhelming because apart from Aamir and me, there were 150 people who worked day in-day out in on the film. For all of us, it's a great achievement,' said Anusha.

'Peepli Live' strikes gold at box office on opening day

'Peepli Live' strikes gold at box office on opening day



Mumbai, Aug 13 (IANS) Aamir Khan's Midas touch continues with his production venture 'Peepli Live', a non commercial film about farmer suicides, doing well on its opening day, taking the actor pleasantly by surprise, and raking up about Rs.70 million and still counting.

'Initially, we had planned to open with 200 screens. But the reaction to the promos and trailers has been most encouraging. We are trying to react to the perceived demand to the film,' said Aamir in a statement.

Journalist-turned-director Anusha Rizvi's direcotrial debut, 'Peepli Live' was made on a budget of approximately Rs.100 million (including marketing costs) and recovered its investment even before its release by selling its satellite rights for Rs.100 million and music rights for Rs.40 million.

''Peepli Live' has opened extremely well. What is surprising is the reaction from single screens - it opened to almost 90 to 95 percent in single screens,' said a source close to Aamir.

'As a non-star cast film with A-certificate, trade expected the film to do modest business. However, the film has done bigger business than small films by three times,' added the source.

The cast of the film didn't have any big names except Naseeruddin Shah. Many actors are tribals from Bhadwai village in Madhya Pradesh, while other cast members are from late playwright Habib Tanvir's theatre troupe Naya Theatre, including the main lead Omkar Das Manikpuri, who plays Natha.

Other names in the cast are Malaika Shenoy, Nawazuddin Siddiqui, Shalini Vatsa, Farrukh Jaffer, Vishal O. Sharma, Aamir Bashir, Sitaram Panchal and Yugal Kishore.

'Peepli Live' had the widest film release ever for a non star cast Hindi film. It hit 600 screens in India and 100 in overseas markets, except Britain Friday.
Continued on next page...

This is the fourth film from Aamir Khan Productions Ltd. after 'Lagaan: Once Upon A Time In India' (2001), 'Taare Zameen Par' (2007) and 'Jaane Tu...Ya Jaane Na' (2008).

Friday, August 13, 2010

Madhya Pradesh’s works in renewable energy sector laudable: Dr. Farooq Abdullah


Bhopal, August 12 (Pervez Bari): Full cooperation and encouragement will be extended to the states doing excellent work in the sector of new and renewable energy. Awarding the states doing excellent work in this sector is also being considered.
These views were expressed by Union Minister for New and Renewable Energy Dr. Farooq Abdullah while addressing a meeting here at Bhopal on Thursday. He said that laudable works have been undertaken in Madhya Pradesh in new and renewable energy sector.
Dr. Abdullah said that the Central Government essays the role of providing cooperation and encouragement to the states in the sector of new and renewable energy sector. For this, continuous dialogue is necessary between the governments. He has come to Madhya Pradesh with this in mind. He said that he is highly impressed by the hospitability extended to him by Chief Minister Shivraj Singh Chouhan. Many good works are being undertaken in the state in which the Union government will extend its utmost cooperation.
He stressed the need for making consumers aware of the quality of the appliances using new and renewable energy. He asked the officers of his ministry to undertake efforts to provide quality mark in the form of stars on such appliances. They should also provide information to consumers as to how they can save on energy through the use of these appliances.

Madhya Pradesh does not surplus tigers: Forest Minister

Madhya Pradesh does not surplus tigers: Forest Minister


Bhopal, July 15, 2010, Indicating that Madhya Pradesh might not give big cats to Sariska, Forest Minister Sartaj Singh on Thrusday said there are no surplus tigers in the state. "We do not have 'surplus' tiger," Singh told reporters. The Minister's statement assumes significance given that Union Environment and Forest Minister, Jairam Ramesh
has written to Chief Ministers of Madhya Pradesh and Maharashtra, requesting them to 'provide' a few tigers for Sariska.
However, Sartaj Singh hurriedly added that the government has not yet received any letter from Ramesh in this connection.
Ramesh has sought tigers from the two states, including Madhya Pradesh with the highest big cat population, to bring "genetic vigour" in the new big cat population being raised in Sariska.
Singh said the Centre has asked the Madhya Pradesh government to form Special Tiger Protection Force, adding that under this three companies of 112 personnel each will be constituted and stationed at Kanha, Bandhavgarh and Pench Tiger reserves.

Maharashtra hog limelight on first day of National West Zone Jr. Athletics

Maharashtra hog limelight on first day of National West Zone Jr. Athletics

Bhopal, August 12 (Pervez Bari): Maharashtra athletes steamrolled their opposition as they garnered total 58 medals out of 96 which included 29 golds, 20 silvers and 9 bronzes to hog the limelight on the opening day of the three-day 22nd National Athletics Championship which commenced here at the Taya Tope Stadium o Wednesday.
Hosts Madhya Pradesh were placed second in the medal tally with two golds, five silvers and 11 bronze medals. While Goa were third with 1 gold, 3 silvers and six bronze medals to their credit. In all the owners of 32 golds, silver and bronze medals were decided on the first day.
Earlier, the championship was declared open by local BJP MLA Dhruv Narain Singh, who is also the chairman of the Madhya Pradesh Tourism Development Corporation.
NS Parmar, president Madhya Pradesh Athletics Association, (MPAA), welcomed he guests while secretary Mumtaz Khan presented the report.
Meanwhile, the official website of MPAA was also inaugurated by Dhruv Narain on the occasion. The MPAA has become the first sports body in Madhya Pradesh to launch its website.
It may be mentioned here that about 600 athletes from the states of Chhattisgarh, Goa, Gujarat, Maharashtra, Rajasthan and hosts Madhya Pradesh are participating in the championship. They will vie for 169 golds, silvers and bronze medals that are at stake. The Athletics Federation of India has given the responsibility to MPAA to organize the championship at Bhopal. The competitions are being held in the age groups of 20, 18, 16 and 14 years separately for boys and girls. (pervezbari@eth.net)

Arjun makes rare appearance in RS during Bhopal gas debate


Delhi 11 Aug. 2010, Arjun Singh made a rare appearance in the Rajya Sabha today when the House took up a short duration discussion on the recent developments relating to the Bhopal gas tragedy.
The septuagenarian leader, who was the Chief Minister of Madhya Pradesh when the Bhopal gas tragedy took place, arrived in a wheel chair soon after BJP leader Ravi Shankar Prasad initiated the discussion on the issue.
BJP has alleged that Singh played a role in the exit of the then Union Carbide chief Warren Anderson from the country as he was provided a state government aircraft from Bhopal to Delhi.
When Ashwani Kumar (Congress) said unnecessary inference should not be drawn now and innuendos made as regards who allowed Anderson to go out of the country then, BJP members pointed out that Arjun Singh was present in the House and he should respond to the charges.

Fairs for poor

Gwalior, Aug 13:
Madhya Pradesh Chief Minister Shivraj Singh Chouhan today announced that special fairs will be organised at various places after the monsoon to ensure that the impoverished benefit from schemes targeted at their welfare.
''A Town Development Scheme will be prepared by this year's end,'' he said while addressing a welfare schemes' convention -- at the Phoolbagh Maidan here -- that coincided with the foundation stone-laying of development schemes amounting to Rs 40 crore.
Among those present were state Parliamentary Affairs Minister Narottam Mishra, Minister of State for Home Narayan Singh Kushwah, Bharatiya Janata Party General Secretary Narendra Singh Tomar, state unit President Prabhat Jha and MP Yashodhara Raje Scindia.

Muslim Manch discussion
Gwalior, Aug 13:
The Rashtriya Swayamsevak Sangh's ex-sarsanghchalak K S Sudarshan will be Chief Speaker tomorrow during the Muslim Rashtriya Manch's discussion titled 'Madre Watan Hindustan se Mohabbat Musalmano ka Dili Jazba' (Affection for motherland India is Muslims' heartfelt desire) at Madhav College here.
Manch Convenor P R Qureshi and Haji Ashfaq Qureshi told media that other Manch convenors Mohammad Afzal and Giri Jual will also speak. Awards and certificates will be distributed to children who win a competition on Islam. Besides, ulema, maulvis and imams will be honoured.

This ancient temple town has a shrine that opens its doors to devotees only for 24 hours in a year -- on Nag Panchami

Ujjain, Aug 13:
This ancient temple town has a shrine that opens its doors to devotees only for 24 hours in a year -- on Nag Panchami.
The temple, devoted to Nagchandreshwar, will witness a puja performed by the Collector and the Mahanirvani Akhara's Mahant Prakashpuri prior to opening of doors at midnight tonight.
In the immense premises of the world-renowned Mahakaleshwar shrine, one of the India's 12 jyotirlingas, the lowest section houses Mahakaleshwar while the second houses Omkareshwar and the third Nagchandreshwar. Several pilgrims from various parts of the country throng the premises on Nag Panchami.
Like every year, the Shree Mahakaleshwar Temple Management Committee and the district administration have made comprehensive arrangements to ensure security and facilities for devotees.
''In the Nagchandreshwar shrine's north is a rare and attractive idol of Nagdev. Mughal, Maratha and Rajput history speak of the importance of the Trikal Puja performed there. The Committee will offer worship at 2000 hrs tomorrow. Every devotee will be charged Rs 151,'' said Committee Administrator Anandilal Joshi. The temple has a throne comprising seven serpents and on it are seated Shiva and his consort Parvati. A Ganesh idol is placed nearby.

Governor for awakening of people to human rights

Bhopal, Aug 12:
The Governor Shri Rameshwar Thakur has said that violation of human rights can be effectively prevented only when people are awakened to their rights and make joint efforts. He was speaking at function organized by the National Law University Bhopal here today.
The Governor dedicated to people a report prepared by the University on the functioning of the Madhya Pradesh Human Rights Commission. He also released a book Manav Adhikar - Kyon Aur Kaise authored by chairman of the MPHRC Justice Dr. M. Dharmadhikari.
Listing the initiatives for human rights protection across the world, the Governor said that the India has always been sensitive about the human rights. Protection of human rights is a prime requisite for good governance. The state government should ensure effective action on the recommendations of human rights commission. Appreciating the commitment of Justice Shri Dharmadhikari, he said that the human rights commission has addressed social concerns in the state wining people's confidence and faith.
The Chief Minister Shri Shivraj Singh Chouhan observed that process of development and protection of human rights should go together. He said that India's rich culture traditions honour and recognise the rights of humans and even animals. India's culture has given noble principles to respect every human being regardless of geographical boundaries. India has regarded the world as a family. The very concept of human rights thus finds its origin in India's cultural heritage. He said that western nations have however advocated and re-defined human rights but they have also been violators of human rights.
Shri Chouhan said that the Madhya Pradesh is the first state to have created human rights commission. Justice Shri Dharmadhikari has enhanced its glory.
Justice Dharmadhikari said that said that the human rights commission is working as a court. The Madhya Pradesh Human Rights Commission has evolved a process of disposing cases of human rights violation with the appreciable cooperation of state government. He said that the human rights commission has initiated counselling for the violators while keeping a strict vigil on the possible violation of human rights.
Shri Kailash Chandra Pant of Rashtra Bhasha Prachar Samiti said that the book gives justifications that the concept of human rights originally belongs to India. He threw light on the book saying that the book will enlighten readers about the importance of human rights.
Director National Law University Professor S. S. Singh gave welcome speech. Dr. U. P. Singh-chairman of Human Rights Centre of the University informed about the chapters of the report on working of human rights commission. Lokayukta Shri P. P. Navlekar, members of the Human Rights Commission Sarvashri Vijay Shukla, Justice Shri Narayan Singh Azad, principal secretary higher education Shri Jaydeep Govind, faculty members and students were present.

Bhopal Gas Tragedy in House

Discussions on the Bhopal Gas Tragedy, in both Houses of Parliament, for nearly eight hours, remained only discussions! Nothing as such came out of the discussions which could bring relief to the aggrieved victims.
Initiating the discussion, Leader of the Opposition in the Lok Sabha, Sushma Swaraj, dubbed as "paltry" the relief announced recently for Bhopal disaster victims and demanded a substantial increase in it and asked the government to become a party to a petition filed in a US court to extract compensation from American firm Dow Chemicals. She wanted India to take a cue from the Rs 90,000 crore compensation secured by the US from British Petroleum due to the recent oil spill in Gulf of Mexico to strengthen the case in a US court for more relief to the Bhopal victims. It may be noted that only 13 people have lost their lives due to the Gulf of Mexico oil spill. Besides, the BP company has taken responsibility of gathering the oil spilt and other cleaning up works.
India should become a party in the suit filed by some NGOs from Bhopal in the New York South court to get "thousands of crore as compensation" for the victims from Dow Chemicals, which now owns the assets of the Union Carbide, she contended.
Similarly, the Union home minister, in his address, repeated the decisions of the Group of Ministers that the compensation had been enhanced in 10-5-2-1 lakh rupees category. However, only 42 to 43 thousand people would get this benefit; what will happen to the rest of the victims is not known. However, today the minister admitted that injustice had been meted out to the victims of the Bhopal gas tragedy and successive governments and the judiciary were responsible for it.
The revelation of former MP CM Arjun Singh revolved around politics. Admitting his responsibility for the tragedy, Singh said that the ex-PM late Rajiv Gandhi had no role to play in the escape of Anderson and pointed fingers at the ex-home minister late PV Narasimha Rao and his ministry.

जमीनों पर कब्जा करने में लगा संघ परिवार : दिग्विजय सिंह

bhopal13aust2010भोपाल. अखिल कांग्रेस महासचिव एवं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर तीखे हमले करते हुए कहा कि संघ परिवार मप्र में जमीनों पर कब्जा करने और बिल्डर लॉबी के जरिए चंदा एकत्र करने में लगा है।



खुलकर बोले दिग्गी: श्री सिंह शुक्रवार को चार दिवसीय प्रदेश यात्रा पर सुबह भोपाल एक्सप्रेस से राजधानी पहुंचे। श्यामला हिल्स स्थित बंगले पर कांग्रेस नेताओं एवं कार्यकर्ताओं से मुलाकात की। इससे पहले दोपहर में काफी हाउस में पत्रकारों से अनौपचारिक चर्चा में श्री सिंह ने संघ परिवार,मुख्यमंत्री की कार्यशैली, कांग्रेस संगठन चुनाव सहित मुद्दों पर खुलकर बोले। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पीछे से हमला करना बंद करें। उन्होंने फिर दोहराया कि उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय इंदौर का सबसे बड़ा भूमाफिया है। उसके बिना इंदौर में कोई एक इंच जमीन नहीं खरीद सकता। कैलाश के सारे दांव पेंच जानता हूं। विजयवर्गीय ने ही विधायक रमेश मेंदोला को जमीन मामले में फंसा दिया हैं।



मंदिर के चंदे का हिसाब दें : विहिप नेता अशोक सिंघल द्वारा सोनिया गांधी को आतंकवाद का पोषक कहे जाने पर श्री सिंह ने कहा कि सिंहल ऐसे व्यक्ति है जिन्होंने आज तक राममंदिर आंदोलन के दौरान एकत्र चंदे का हिसाब तक नहीं दिया हैं। इन्होंने देश में एक भी रचनात्मक कार्य किया हो तो बताए। सिंहल की जबान को कांग्रेस तरजीह नहीं देती और न ही गंभीरता से लेती हैं। संघ परिवार के पूर्व प्रमुख श्री सुदर्शन द्वारा प्रधानमंत्री डॉ. सिंह को मानसिक रोगी कहे जाने पर उन्होंने कहा कि श्री सुदर्शन इकलौते संघ प्रमुख है जिन्हें पद से इसलिए हटाया गया कि वे कभी गंभीर बातें नहीं करते हैं।


bhopal 13=8=2010

बड़वाई में हुई है फिल्म ‘पीपली लाइव’ की शूटिंग


भोपाल. न्यू मार्केट, बिट्टन मार्केट, लेक व्यू, भारत भवन आदि को लांघ फिल्म ‘पीपली लाइव’ की शूटिंग के लिए डाइरेक्टर अनुषा रिजवी बड़वाई गांव पर रीझीं। आजकल इस फिल्म का गीत ‘सखी, साजन तो खूब कमात है, महंगाई डायन खाए जात है,हर महीना उछले पेट्रौल, डीजल का उछला है रोल, शक्कर बाई केका बोल, ऊसा बासमती धान मरी जात है’ खूब चर्चा में है।



फिल्म की शूटिंग की शुरुआत इसी साल जनवरी में हुई थी। अब यहां के रहवासी इस गांव को कुछ ऐसे ही देख रहे हैं जैसे एक जमाने में शोले की शूटिंग के बाद रामगढ़ को देखा गया था। करीब 1000 की जनसंख्या वाले इस गांव में शूटिंग की बात छेड़ने भर की देर होती है उसके बाद तो किस्सों के काफिले निकल पड़ते हैं।



कुछ यूं हुई थी शुरुआत : यहां के निवासी राजकुमार प्रजापति बाताते हैं, बात पिछले जनवरी महीने की है। यहां कुछ बाहरी लोगों की अवाजाही बढ़ रही थी। रोज बड़ी-बड़ी गाड़ियां आती थीं। पूछने पर पता चला कि शूटिंग होनी है। इसके बाद पूरे गांव में खुशी छा गई। गांव के ही नेमिचंद पाटोनिया ने बताया कि अनुषा मैडम ने कहा कि इस गांव का प्रकृतिक सौन्दर्य लाजवाब है। धीरे-धीरे उनकी पूरी टीम यहां आई।







-आमिर खान यहां केवल एक दिन के लिए आए थे। रात में 9 बजे आकर वह सुबह सात बजे चले गए थे। - यहां के निवासी शहादत के जिस घर में अमिर खान रुके, नत्था रहा और जिस घर में पूरी शूटिंग हुई उसे लोग अब ‘नत्था हाउस’ के नाम से बुलाते हैं। - कलाकार अक्सर गांव के लोगों से ही कपड़े लेकर उन्हें पहनकर शूटिंग करते थे और उसके बदले नए कपड़े देते थे। गांव को पीपली दिखाने के लिए यहां के स्कूल के नाम के नीचे लिखे बड़वाई को पीपली कर दिया गया था।



‘नत्था मरेगा, जरूर मेरेगा’यह वह डायलॉग है जो गांव की ही तुलसा कुमारी विश्वकर्मा ने बोला था। यहां के पुजारी और फिल्म में भी पूजा का सीन देने वाले लक्ष्मी नारायण शर्मा बताते हैं फिल्म के आखिरी सीन यहीं फिल्माए गए हैं। वह कहते हैं कि गांव में हर साल बैसाख की दूज को मेला लगता है।