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पवित्र गुरू ग्रंथ साहिब के शब्दों 'पवन गुरू, पानी पिता, माता धरत महत्त' को जनमानस में बिठाने वाले धरती मां के सच्चे लाल हैं बाबा बलबीर सिंह सीचेवाल। पंजाब के कपूरथला जिले में सीचेवाल गांव से समाजसेवा शुरू करने वाले बाबा ने अनेक गांवों का कायाकल्प तो किया ही, वह भी कर दिखाया जिसे राज्य सरकार नामुमकिन घोषित कर चुकी थी। और यह था प्रदूषण की बलि चढ़ चुकी 160 किमी0 लम्बी नंदी 'काली बेईं' को जीवनदान।
मान्यता है कि व्यास नदी की सहायक काली बेईं के तट पर गुरू नानक देव जी ने 14 साल 09 महीने 13 दिन बिताए थे। लेकिन समय के साथ-साथ काली बेईं में फैक्ट्रियों के कचरे और सीवरेज वेस्ट की मात्रा इतनी बढ़ गयी कि नदी गंदे नाले में तब्दील हो गयी। ठहरे हुए पानी में हायसिंथ नामक वनस्पति फैलने लगी। आखिरकार नदी सूख गई। करीब 93 गांवों की 50 हजार एकड़ जमीन पर सूखे की स्थिति रहने लगी।
जुलाई 2000 में बाबा ने काली बेईं दोबारा जीवित करने का प्रण लेते हुए जनचेतना यात्रा आरम्भ की। श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। बाबा ने स्वयं हाथों से हाससिंथ उखाड़ फेंकने का काम शुरू किया और पीछे-पीछे जुट गया अपार जनसमुदाय। सीवरेज को रोकने के लिए बाबा के सेवादारों ने बिना किसी सरकारी मदद के गांव-गांव में भूमिगत सीवर लाइन बिछाने का कार्य किया। श्रद्धालुओं ने इस नेक काम के लिए खुलकार दान दिया। गंदे पानी को एक बड़े तालाब में इकटठा किया जाने लगा। तालाब में जाने से पहली पानी को तीन अलग-अलग गहराई के गडढ़ों से गुजारा जाता, जिसमें लगे अवरोध फिल्टर का काम करते। 8 दिन की इस प्रक्रिया के बाद इसे नजदीकी खेतों की सिंचाई के लिए प्रयोग किया जाता।
इस प्रयोग से बंजर हो चुकी जमीन पर हरियाली लहराने लगी। आज काली बेईं के किनारे बसे कई गांव खुशहाली के गीत गा रहे हैं। अक्टूबर 2008 में प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका 'टाइम्स' ने बाबा सीचेवाल को विश्व के प्रमुख पर्यावरण प्रहरियों की सूची में शामिल किया। बाबा का प्रसाद भी अनूठा है और यह होता है एक पौधा। वे कहते हैं 'गुरू के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रमाण देना हो तो हर व्यक्ति को पौधे लगा कर पर्यावरण संरक्षण करना चाहिए।' (साभार
बाबा बलबीर सिंह सीचेवाल जी का भागीरथ प्रयास उन तमाम NGO और तथाकथित समाज सेवको के मुह पर करार तमाचा है. जो सरकारों से मोटी रकम लेकर समाज सेवा के नाम पर डकार जाते है. बाबा ने बिना किसी तथाकथित सहयोग के जो कर दिखाया है ( अपने भक्तो,अनुयायियों के सहयोग के साथ) वह प्रसंशा से परे है. ऐसी बिभूति को कोटीशः नमन.
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