Friday, October 8, 2010

राहुल की यात्रा ने आस जगाई

भोपाल। राहुल गांधी की मप्र यात्रा ने मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों की सियासत करने वाले कांग्रेस नेताओं में नई आस जगाई है। उम्मीद की जा रही है कि कांग्रेस में इस पर काम होगा और नया नेतृत्व सामने आएगा।

दरअसल कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने तीन दिन की मप्र यात्रा में जिन वर्गो के नेतृत्व की बात की, वे कांग्रेस की ताकत माने जाते रहे हैं। छत्तीसगढ़ के अलग राज्य नहीं बनने के पहले तक मप्र में कांग्रेस के पास आदिवासी नेतृत्व के नाम पर तब भी कुछ चेहरे थे मगर इस मामले में अनुसूचित जाति व मुसलमानों के बीच पार्टी तब भी गरीब थी। यही कारण है कि युवाओं को कांग्रेस से जोड़ने के अपने अभियान के तहत राहुल ने हर जगह मुसलमानों, अनुसूचित जाति और जनजाति की लीडरशिप का सवाल उठाया। भोपाल में उन्होंने मुस्लिम नेतृत्व की बात की तो उज्जैन में अनुसूचित जाति के पाँच नेताओं के नाम बताने को कहा। श्योपुर में आदिवासी लीडरशिप को लेकर सवाल हुआ। पर कहीं भी ऐसा नाम नहीं लिया गया, जिसका प्रदेश व्यापी असर हो। जाहिर है, इन वर्गो के नेतृत्व के मामले में कांग्रेस के भीतर अच्छा खासा संकट है।

राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि इस सच्चाई को भापकर ही राहुल ने नेतृत्व की बात छेड़ी है। मुसलमानों की बात करें तो बीते दो दशक से इस मोर्चे पर पार्टी लगातार कमजोर होती गई है। इस समय कांग्रेस के पास एक भी ऐसा चेहरा नहीं है, जो पूरे प्रदेश में मुसलमानों का नेता होने का दावा कर सकता हो। गिने चुने जो नाम हैं भी तो वो राजधानी भोपाल तक सीमित हैं और उनका असर भी गली-मोहल्लों में बंटा हुआ है।

इसके उलट एक जमाने में संसद में मप्र से मुस्लिम समुदाय के कम से कम तीन सदस्य तो होते ही थे। लेकिन बीते अनेक वर्षो से ऐसा नहीं है। विधायकों की संख्या भी न के बराबर हो गई है। मुसलमान नेता मानते हैं, अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह ने मुसलमानों के लिए अनेक काम किए। इन दोनों की गिनती भी मुस्लिमों के शुभचिंतकों में होती है, पर लीडरशिप के मामले में वो नहीं हुआ जो सचमुच होना था।

पुराने दिनों की याद करते हुए पूर्व सांसद अजीज कुरेशी कहते हैं,'मप्र में मुसलमानों की लीडरशिप को जानबूझकर खत्म किया गया। स्वर्गीय द्वारिका प्रसाद मिश्र और प्रकाश चंद्र सेठी ने नेतृत्व पैदा करने की ईमानदार कोशिश की। पर बाद में इसे खत्म करने में ऊर्जा लगाई गई। अब तो हालत यह है कि संगठन में भी नुमाइंदगी का संकट है।'

केन्द्र सरकार में मंत्री रह चुके असलम शेर खान के मुताबिक राहुल के पिता स्वर्गीय राजीव गंाधी ने भी ऐसी कोशिश की थी। दुर्भाग्य से वह रहे नहीं। पर अब राहुल गांधी जो विश्वास पैदा करके गए हैं उससे नया नेतृत्व जरूर सामने आएगा। यह बात सच है कि मुसलमानों को हमेशा फॉलोअर समझा गया। वोट बैंक बनाकर रखा गया और यह कहकर डराते रहे कि यदि हमें वोट नहीं दोगे तो भाजपा आ जाएगी। 'मुझे लगता है, राहुल ने मुसलमानों को अपनी लीडरशिप विकसित करने का खुला अवसर दिया है। उन्हें यह अवसर छोड़ना नहीं चाहिए। इसको तुरंत लपकने की जरूरत है'- पूर्व ओलम्पियन ने अंत में जोड़ा।

यही हाल आदिवासियों का है। ले देकर श्रीमती जमुना देवी का एक ऐसा बड़ा नाम था, जो प्रदेश भर में जाना जाता था। पर उनके निधन से खाली हुआ स्थान हाल फिलहाल भरता दिखाई नहीं पड़ता। केन्द्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया हैं तो वह ज्यादा सक्रिय नहीं हैं।

अनुसूचित जाति वर्ग से जरूर सांसद सज्जन सिंह वर्मा, पूर्व मंत्री एनपी प्रजापति और सांसद प्रेमचंद गुड्डू जैसे कुछ
नाम हैं, पर लीडरशिप इस बात पर निर्भर करेगी कि आगे पार्टी इनको कितना मौका देती है।

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